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जानिए गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव का महत्व

गृहलक्ष्मी टीम

29th October 2016

 

दीपावली दीपोत्सव, दीपपर्व, ज्योतिपर्व आदि नामों से पुकारा जाने वाला देश का सर्वाधिक लोकप्रिय पंच दिवसीय महोत्सव ब्रज मंडल में मानो विशिष्ट बन जाता है। लक्ष्मी पूजन के दूसरे दिन अर्थात् कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को पूरे ब्रज मंडल में गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

इस वजह से लगा गोवर्धन पर्वत को तिल-तिल घटने का श्राप

 

कहते हैं कि गोवर्धन धारण के समय श्रीकृष्ण की आयु मात्र सात वर्ष की थी। तभी से अन्नकूट महोत्सव का प्रारंभ गोवर्धन पूजन के बाद प्रसाद वितरण के लिए प्रारंभ हुआ। गोवर्धन को देव स्वरूप मानकर घर-घर में पूजन की परम्परा गोबर से गोवर्धन बनाकर पूर्ण की जाती है। ब्रज मंडल में तीन प्रसिद्ध पर्वत हैं पहला बरसाना, दूसरा नंदीश्वर एवं तीसरा गोवर्धन। बरसाना पर्वत को ब्रह्मा, नंदीश्वर को शिव तथा गोवर्धन को विष्णु स्वरूप माना जाता है। इन तीनों पर्वतों में श्री गोवर्धन जी ही सर्वाधिक एवं आस्था के प्रतीक हैं।

भारतीय वाड्मय में श्री गोवर्धन पर्वत को तीन बार उठाने का उल्लेख मिलता है। पहली बार पुलस्त्य मुनि द्वारा, दूसरी बार हनुमान जी द्वारा और तीसरी बार योगिराज श्रीकृष्ण ने इसे उठाया। कहते हैं कि द्वापर में यह अति विशाल पर्वत था किंतु आज केवल प्रतीक रूप में ही रह गया है। इसके तिल-तिल घटने की भी एक कथा है। बताया जाता है कि एक बार पुलस्त्य मुनि देवभूमि उत्तराखंड पहुंचे। साधना के दौरान उन्हें यह अनुभूति हुई कि गोवर्धन की छाया में भजन करने से सिद्धि प्राप्त होती है। वे सीधे गोवर्धन के पिता द्रोण के पास पहुंचे एवं भिक्षा में उनके पुत्र गोवर्धन को मांगा। द्रोण भला कैसे इंकार कर सकते थे। किंतु गोवर्धन ने एक शर्त रखी कि मैं चलूंगा मगर यदि तुमने मुझे कहीं उतार दिया और जमीन पर रख दिया तो वहीं स्थिर हो जाऊंगा।

पुलस्त्य मुनि यह शर्त मानकर उन्हें उठाकर चल दिए। जैसे ही वह ब्रज में पहुंचे, गोवर्धन को अंत:प्रेरणा हुई कि श्रीकृष्ण लीला के कर्म में उनका यहां होना अनिवार्य है। बस वे अपना वजन बढ़ाने लगे। इधर मुनि को भी लघुशंका का अहसास हुआ। मुनि ने अपने शिष्य को गोवर्धन को साधे रहने का आदेश दिया और निवृत्त होने चले गए। शिष्य ने कुछ पलों बाद ही वजन उठाने में असमर्थता जताते हुए गोवर्धन को वहीं रख दिया वापिस लौटने पर मुनि ने गोवर्धन को उठाना चाहा किंतु गोवर्धन टस से मस नहीं हुए। उसी समय क्षुब्ध मन से मुनि ने श्राप दिया कि तिलतिल कर घटोगे। तब से गोवर्धन तिल-तिल कर घट रहे हैं।

 

इस तरह होती है पूजा

ब्रज के मंदिरों में अन्नकूट की परंपरा के अनुसार सर्वप्रथम चावल-हल्दी मिश्रित रोपन से रेखांकन किया जाता है। इसके ऊपर घास का मूठा बनाकर उसे बड़े-बड़े पत्तलों से ढक देते हैं। उसके ऊपर चावलों के कोट से गिरिराज जी की आकृति बनाते हैं। श्री विष्णु भगवान के चारों आयुधों (शंख, चक्र, गदा, पदम) के समान चार बड़े गूझे चारों भुजाओं के रूप में रख दिए जाते हैं। मध्य में बड़ा गोलाकार चांद बनाते हैं जिसे गिरिराज का शिखर माना जाता है। चावल के कोट पर लंबी तुलसी माला लगाकर केसर से सजाते हैं। एक ओर जल एवं दूसरी ओर घी की हांडी रखी जाती है। अन्नकूट के रूप में मिष्ठान, दूध, सामग्री, मेवा, भात, दाल, कढ़ी, साग, कंद, रायता, खीर, कचरिया, बड़ा, बड़ी व अचार प्रयोग किया जाता है।

गौ संरक्षण को है समर्पित ये पर्व

वैदिक चिंतन में गौ का बड़ा महत्त्व रहा है। आश्रमों में गाय की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। पंचगव्य का प्रयोग कायाकल्प करने के लिए किया जाता है। इसका उल्लेख आयुर्वेद में भी मिलता है। गाय के गोबर को सम्मान देने की दिशा में ही गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजन की परंपरा ऋषि मुनियों ने प्रारंभ की। यदि वर्तमान पीढ़ी इसके अन्तर्निहित अर्थ को समझ कर इसके व्यवस्थित उपयोग पर ध्यान केंद्रित कर सके, तो यह पर्व अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकेगा।

 

 

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