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औरत सब संभाल लेती है...

गृहलक्ष्मी टीम

28th December 2016

औरत सब संभाल लेती है...


● वो "औरत" दौड़ कर रसोई तक ,
दूध बिखरने से पहले बचा लेती है ।

● समेटने के कामयाब मामूली लम्हों में,
बिखरे "ख्वाबों" का गम भुला देती है ।

● वक्त रहते रोटी जलने से बचा लेती है,
कितनी "हसरतों" की राख उडा देती है ।

● एक कप टूटने से पहले सम्हालती है ,
टूटे "हौसलों" को मर्जी से गिरा देती है ।

● कपडों के दाग छुडा लेती सलीके से ,
ताजा "जख्मों" के हरे दाग भुला देती है ।

● कैद करती "अरमान" भूलने की खातिर",
रसोई के बंद डिब्बों में सजा लेती है ।

● नाजुक लम्हों के "अफसोस" की स्याही,
दिल की दीवार से बेबस मिटा लेती है ।

● मेज कुर्सियों से "गर्द" साफ करती ,
चंद ख्वाबों पर "धूल" चढा लेती है ।

● सबके सांचे में ढालते अपनी जिंदगी,
"हुनर" बर्तन धोते सिंक में बहा देती है ,

● कपडों की तह में लपेट कुछ "शौक",
अलमारी में खामोशी से दबा देती है ।

● अजीज चेहरों की आसानी की खातिर ,
अपने "मकसद" आले में रख भुला देती है ।

● घर भर को उन्मुक्त गगन में उडता देखने ,
अपने सपनों के पंख काट लेती है ।

● हां... हर घर में एक "औरत" है ,
जो बिखरने से पहले ही सब सम्हाल लेती है..!!

 

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