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सवालों के दायरे में जिंदगी

डॉ. नरेश शर्मा

7th February 2017

 
 
सुनयना कॉलेज से आई ही थी कि घर की हालत देखकर परेशान हो गई। अस्त-व्यस्त पड़ा सामान, नौकरानी के ना आने की चुगली कर रहा था। थकी मांदी सुनयना को गुस्सा तो बहुत आया। किचन में गई तो वॉश बेसिन में पड़े झूठे बर्तन जैसे उसे चिढ़ा रहे थे। इसका मतलब राधा आज भी नहीं आई थी। सुनयना के कॉलेज में सुबह जल्दी क्लासेज होती थी। दोपहर में घर आकर खाना बनाने का मूड ही नहीं होता था। गुस्से को शांत कर अब वह काम में जुट गई। फ्रीज से ब्रेड निकालकर नाश्ते से ही काम चला लिया। कॉलेज की सर्विस आसान थोड़े ही थी। लेक्चर तैयार करने के लिए स्टडी करने में ही वह थक जाती थी।
 
राधा को नौकरी पर रखे अभी कुछ ही दिन बीते थे। वह साधारण व्यक्तित्व की सांवली सी महिला यों तो जवान थी, काम में कुशल भी बहुत थी, लेकिन बिना बताए छुट्टी कर लेने की उसकी आदत से वह बहुत परेशान थी। सुनयना बेड पर लेटी थी, टीवी देख रही थी। अचानक राधा आ गई। राधा को इस वक्त देखकर वह गुस्से से उसे डांटने लगी। राधा चुपचाप नीचे फर्श पर बैठी, उसकी डांट सुनती रही। उसकी अश्रुधारा देख, सुनयना का दिल पसीजने लगा।
 
अब वह शांत होकर बोली, ‘क्या बात है राधा? तुम बिना बताए इस तरह गायब क्यों हो जाती हो?' राधा गंभीर होकर बताने लगी, ‘मेम साहब क्या करूं? चार दिन हो गए हैं बेटे को, बुखार से तड़प रहा है। कुछ पैसे दे देती तो...' उसने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया। सुनयना ने पूछा, ‘तुम्हारे पति भी तो होंगे?' राधा रूआंसी हो बोली, ‘मैम साहब! मरद तो है लेकिन जैसे नहीं। शादी के बाद बच्चों को गोद में डालकर ना जाने कहां गायब हो गया। दूसरी कर ली उसने। पहले साथ थी, तब भी क्या सहारा था? रोज पीटता था मुझे। शराब के लिए पैसे मांगता रहता था।' राधा ने अपनी सारी राम कहानी सुनयना को सुना दी। उसने तुरंत पर्स में से पांच सौ रुपये दे दिए। राधा चली गई।
 
अब उसे बहुत सहानुभूति हो रही थी राधा से। काफी देर तक वह राधा की जिंदगी के बारे में सोचती रही। उसकी भी पारिवारिक मजबूरियां थी। चार बच्चों की मां होकर वह अपनी गृहस्थी कैसे चला रही थी। एक औरत होकर कितना कठिन काम था, राधा के लिए। सुनयना अक्सर अब राधा की सहायता कर देती थी। उसके बच्चों को अपनी तरफ से कभी-कभार चॉकलेट, टॉफी, आइसक्रीम और मिठाई के पैसे भी दे देती थी। एक औरत होने के नाते वह उसकी हालत को अच्छी तरह समझती थी।
 
नारी जीवन पर कितना अध्ययन किया था उसने। समाजशास्त्र में पीएच.डी. की उपाधि मिली थी उसे। उसकी अपनी जिंदगी भी तो एक अनसुलझी पहेली ही थी। उसे महसूस होता कि जैसे वह भी राधा के समान ही तो है। व्यवहार में अक्सर, उच्च या निम्न वर्ग से एक औरत की जिंदगी में कोई मौलिक अंतर नहीं आता।
 
उसके पति अशोक एक सफल बिजनेसमेन थे। अति व्यस्त जीवन था उनका। दस कमरों की कोठी में उनके सेपरेट बेडरूम थे। पति देर रात लौटते। क्लब जाना उनकी रूटीन लाइफ थी, लेकिन जाते हमेशा अकेले ही थे। अपनी जिंदगी का खालीपन उसे हमेशा अखरता था। वैसा ही खालीपन जैसा राधा के जीवन में था। शादी के बाद से उसने एकाकीपन ही तो बिताया था। आर्थिक तंगी चाहे ना रही हो, किन्तु पति-पत्नियों दोनों के दिलों के बीच की दूरी कभी कम नहीं हो पाई। उसकी जिंदगी में न अपनत्व था और ना ही प्रेम, रोमांस। फर्ज, जिम्मेदारी के भाव उसने कभी समाप्त नहीं होने दिए थे। वह जब भी एक सामान्य महिला की तरह सोचती तो उसे लगता कि शायद वह दुनिया की सबसे गरीब औरत है।
 
अशोक के व्यवहार को वह कभी नहीं समझ पाई। उसके अंतरमन में उठने वाले विभिन्न सवालों ने उसके सुख चैन को छीन लिया था। उसकी जिंदगी में ऐसे बहुत से सवाल थे, जो रह रहकर उसे परेशान करते थे। लाख प्रयत्नों के बाद भी वह उनका कोई जवाब तलाश नहीं पाई थी। वो सारे सवाल जैसे अनुत्तरित ही थे। उसके मन में विचार आता कि अशोक का उपेक्षित व्यवहार, क्या उसके लिए अत्याचार नहीं है? उसने कभी भी एक जिम्मेदार पत्नी के विपरीत आचरण नहीं किया था। फिर भी वह, इतनी उपेक्षित क्यों? क्या पत्नी भी बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामान की तरह है कि जब मन भर गया तो उसे उपेक्षित जीवन जीने के लिए छोड़ दिया।
 
यदि ऐसा ही था और अशोक को एकाकी जिंदगी ही पसंद थी तो उसने उसके साथ विवाह ही क्यों किया? माना कि उनमें उसके प्रति प्रेम नहीं है, किन्तु वह तो एक औरत है, जिसमें इंसानी भावनाएं हैं जो अपने पति से जायज अपेक्षाएं रखती है। उसके दिल में बार-बार यह ख्याल आता कि क्या अशोक को यह बात समझ में नहीं आती? उनका ऐसा उपेक्षित व्यवहार अनजाने में था या जानबूझकर? उसका तिरस्कार करके वह अपने पुरुषत्व के अहं को तुष्ट कर लेना चाहता था? ऐसे कठोर व्यक्तित्व को क्या संज्ञा दी जाए? क्या उनमें मानवीय भावनाएं थी ही नहीं या उन्हें कभी सुनयना की जरूरत ही महसूस नहीं होती थी?
 

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