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पीआईडी भी हो सकती है गर्भधारण न कर पाने की वजह

ऋचा कुलश्रेष्ठ

2nd March 2017

पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिसीज यानी पीआईडी गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और अंडाशय में होने वाला इंफेक्शन होता है। कई बार यह इंफेक्शन पेल्विक पेरिटोनियम तक पहुंच जाता है। पीआईडी का उचित इलाज कराना जरूरी है, क्योंकि इसके कारण महिलाओं में एक्टॉपिक प्रेगनेंसी या गर्भाशय के बाहर प्रेगनेंसी, निःसंतानता और पेल्विक में लगातार दर्द की शिकायत हो सकती है।

 

आमतौर पर पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिसीज बैक्टीरियल इंफेक्शन होती है, जिसके लक्षणों में पेट के निचले हिस्से में दर्द, बुखार, वजाइनल डिसचार्ज, असामान्य ब्लीडिंग, यौन संबंधों या यूरीनेशन के दौरान तेज दर्द महसूस होना शामिल हैं। पीआईडी के लक्षणों को कई बार नजरअंदाज कर दिया जाता है और ऐसे में कई बार इसका उपचार ही नहीं हो पाता। कई बार तो मरीज पीआईडी की आखिरी स्टेज में डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। 

पीआईडी के प्रारंभिक कारण 

जब बैक्टीरिया योनि या गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) द्वारा महिलाओं के प्रजनन अंगों तक पहुंचता है तो पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिसीज का कारण बनते हंै। पीआईडी इंफेक्शन के लिए कई प्रकार के बैक्टीरिया जिम्मेदार होते हैं। अधिकांशतः यह इंफेक्शन यौन संबंधों के दौरान होेने वाले बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण होता है- इसकी शुरुआत क्लैमाइडिया और गानरिया या प्रमेह के रूप में होती है। एक से अधिक सेक्सुअल पार्टनर होने की स्थिति में भी पीआईडी होने का खतरा बढ़ जाता है। कई मामलों में टीबी या क्षयरोग भी इसके होने का कारण बनता है। 20-40 वर्ष की महिलाओं में इसके होने की आशंका अधिक रहती है, लेकिन कई बार मेनोपॉज की अवस्था पार कर चुकी वृद्ध महिलाओं में भी यह समस्या देखी जाती है। 

ये होती है परेशानी 

पीआईडी के कारण कई बार प्रजजन अंग स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और फैलोपियन ट्यूब में भी जख्म हो सकता है। इसके कारण गर्भाशय तक अंडे पहुंचने में बाधा आती है। ऐसी स्थिति में स्पर्म अंडों तक नहीं पहुंच पाता या एग फर्टिलाइज नहीं हो पाते हंै, जिसकी वजह से भ्रूण का विकास गर्भाशय के बाहर ही होने लगता है। क्षतिग्रस्त होने और बार-बार समस्या होने पर इनफर्टिलिटी का खतरा बढ़ जाता है। वहीं जब पीआईडी की समस्या टीबी के कारण होती है तो मरीज को एंडोमेट्रियल ट्यूबरक्लोसिस होने की आशंका रहती है और यह भी इनफर्टिलिटी का कारण बनता है। यहां तक कि कई बार महिलाओं में पीआईडी के कारण मासिक स्राव के बंद होने की भी शिकायत हो जाती है। 

पहचान और उपचार 

मूल रूप से पीआईडी को रोकना संभव है। भले ही पीआईडी की समस्या के कुछ लक्षण नजर आते हैं, इसके बावजूद भी इसका पता लगाने के लिए किसी प्रकार की जांच प्रक्रिया मौजूद नहीं है। मरीज से बातचीत के जरिए और लक्षणों के आधार पर ही डॉक्टर इसकी पुष्टि करते हैं। डॉक्टर को इस बात का पता लगाने की आवश्यकता हो सकती है कि किस प्रकार के बैक्टीरिया के कारण पीआईडी की समस्या हो रही है। इसके लिए क्लैमाइडिया या गानोरिया की जांच की जाती है। फैलोपियन ट्यूब में इंफेक्शन का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड किया जा सकता है। पीआईडी का इलाज एंटीबायोटिक्स द्वारा किया जाता है और मरीज को दवाई का कोर्स पूरा करना जरूरी होता है। यदि दवा लेने के बाद किसी प्रकार के लक्षण नजर आते हैं तो मरीज को तुरंत ही डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि एंटीबायोटिक्स के साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक थैरेपी की आवश्यकता होती है। यदि समय पर इलाज शुरू कर दिया जाए तो इनफर्टिलिटी से जुड़े खतरे कम हो जाते हैं। यदि सेक्सुअल पार्टनर की वजह से इंफेक्शन हुआ है तो उसका भी इलाज कराना जरूरी हो जाता है। 

टीबी के कारण पीआईडी की समस्या होने पर एंटी टीबी ट्रीटमेंट किया जाता है। वैसे टीबी के इलाज के बाद पीआईडी का उपचार किया जा सकता है, यह लंबी प्रक्रिया होती है। इसमें मरीज को लगातार जांच कराते रहने की जरूरत होती है। यदि इलाज के बाद भी मरीज की स्थिति में सुधार नहीं होता तो सर्जरी की सलाह दी जाती है। 

पीआईडी के बाद प्रेगनेंसी 

जिन महिलाओं में पीआईडी के बाद प्रजनन अंग क्षतिग्रस्त हुए हैं, उन्हें फर्टिलिटी विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, ताकि सेहतमंद गर्भावस्था को बनाए रखा जा सके। पेल्विक इंफेक्शन के कारण गर्भाशय के बाहर प्रेगनेंसी होने का खतरा 6-7 गुना तक बढ़ जाता है। इस खतरे को दूर करने और फैलोपियन ट्यूब में समस्या होने पर आईवीएफ थैरेपी कराने की सलाह दी जाती है। क्योंकि आईवीएफ के जरिए ट्यूब को पूरी तरह से पार किया जा सकता है। फैलोपियन ट्यूब में किसी प्रकार का अवरोध होने की स्थिति में रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी ट्रीटमेंट की सलाह दी जाती है। गर्भावस्था के दौरान यदि पीआईडी की समस्या फिर से हो जाती है तो मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा रहता है। इस स्थिति में तत्काल डॉक्टरी सलाह की जरूरत होती है, ताकि आईवी द्वारा एंटीबायोटिक्स दिया जा सके। 

इनके लिए रहता है खतरा 

कई ऐसे कारण होते हैं जो महिलाओं में पीआईडी होने के खतरे को बढ़ाते हैं। कई बार महिलाओं को बिना सैक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन या एसटीआई के बिना भी पीआईडी की समस्या हो जाती है। इसके अलावा कुछ अन्य खतरे भी शामिल हैंः -

  • 25 की उम्र के पहले यौन संबंध बनाने पर 
  • एक से अधिक सेक्स पार्टनर होने पर 
  • बिना सुरक्षा अपनाए यौन संबंध बनाने पर 
  • प्रेगनेंसी को रोकने के लिए इंट्रायूटेराइन डिवाइस या आईयूडी का प्रयोग करने पर 
  • पूर्व में कभी पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज हुई हो। 

 

इस तरह कर सकते हैं बचाव 

चूंकि हर बार पीआईडी होने का कारण एसटीआई नहीं होता है, इसलिए हर बार इससे बचाव संभव नहीं, लेकिन कुछ बातों को ध्यान में रखकर इसके होने के खतरे को कम जरूर किया जा सकता हैः 

  • गर्भनिरोध के लिए कंडोम जैसे उपाय अपनाएं। 
  • मरीज के साथ सेक्सुअल पार्टनर की भी जांच कराएं।
  • एक से अधिक व्यक्ति से यौन संबंध बनाने से बचें। 
  • अल्कोहल या ड्रग्स लेने से बचें। इससे जबरन यौन संबंध बनाने के खतरे से बचने में मदद मिलेगी। 

(डॉ. सागरिका अग्रवाल, आईवीएफ एक्सपर्ट, इंदिरा हॉस्पिटल्स, नई दिल्ली से बातचीत पर आधारित)