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कांटों का उपहार - पार्ट 34

रानू

28th August 2017

रानू का मशहूर और लोकप्रिय उपन्यास कांटों का उपहार अब ऑनलाइन पढ़ें, सिर्फ गृहलक्ष्मी डॉट कॉम पर....

कांटों का उपहार - पार्ट 34

................ राजेश ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर हाथ पोंछा, मानो किसी गंदे पशु को उसके हाथ छू गए हों। फिर उसने राधा को देखा, राधा उसी प्रकार भयभीत-सी खड़ी उसे देख रही थी, उसकी दृष्टि की चुभन उसने अचानक ही अपने मुखड़े पर प्रतीत की तो मानो सपने से जागी।

 ‘यह अच्छा नहीं हुआ।' वह कांपकर बोली‒ ‘वह बहुत भयानक व्यक्ति है। अब वह हमारा जीना कठिन कर देगा।'

 ‘तो फिर आप लोग यह जगह क्यों नहीं छोड़ देते?' राजेश ने अपने मन की बात कही‒ ‘मैं आप लोगों को बहुत अच्छा घर सस्ते में दिला दूंगा।'

 ‘नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।' राधा बोली‒‘यह जगह छोड़ना हमारे बस की बात नहीं। यहां कोई अधिक पूछताछ नहीं करता कि कमल का पिता कौन है? यहां तो केवल एक बृजभूषण ही बदमाश है, परंतु दूसरी जगहों पर तो अगणित ऐसे गुंडे मिलेंगे, जिन्हें मेरी उपस्थिति रात-रातभर सोने नहीं देगी। मैं यहीं रह लूंगी। अब दोनों ही ओर से ताला लगाकर रखूंगी, बाहर झांकूंगी भी नहीं।' राधा ने कांपते-कांपते एक ही सांस में कह दिया।

 ‘आप निश्चिंत रहिए।' राजेश के होंठों पर एक निराश मुस्कान उभरी और गुम हो गई। ‘अब वह यहां कभी नहीं आएगा, इस मोहल्ले में तो क्या इस शहर में भी दिखाई नहीं पड़ेगा।'

 राधा ने उसे गौर से देखा।

 ‘मैं ठीक कह रहा हूं।' राजेश बोला‒ ‘आपकी रक्षा करने में मुझे एक विचित्र-सी प्रसन्नता का आभास हो रहा है।'

 राधा तब भी कुछ नहीं बोली, उसकी बातों पर उसने गौर किया। कितना सज्जन पुरुष है यह! कितना अच्छा! देवता समान। यदि यह नहीं होता तो उसको जाने कितनी और भी कठिनाई का सामना करना पड़ता।

 राजेश ने आगे बढ़कर आंगन का दरवाज़ा बंद किया। ‘अंदर जाने वालों को आज्ञा लेनी पड़ेगी।' फिर वह अंदर की ओर पलटा, कुर्सी पर बैठते हुए स्वयं ही बोला‒‘क्या एक कप चाय आप मुझे नहीं पिलाएंगी?'

 राधा लज्जा से ज़मीन में गड़ गई। चाय तो वह उसे स्वयं भी पिलाना चाहती थी, परंतु उसके समक्ष अपनी स्थिति का ज्ञान करके वह ऐसा साहस नहीं कर पाती थी। उसके कहते ही वह झट रसोई में पहुंच गई। राजेश ने बढ़कर बच्चे को गोद में उठा लिया, प्यार से उसे चूमा। फिर पहले कमरे में उछालता हुआ ले आया। दरवाजे के समीप कुर्सी पर बैठकर उसने बच्चे को फिर चूमा। राधा उसे कनखियों से देख रही थी, वह झट उठी। एक मोटा कपड़ा दूसरे कमरे से उठा लाई और राजेश की गोद में बच्चे के नीचे बिछा दिया।

 राजेश मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।

 दिन-पर-दिन और सप्ताह-पर-सप्ताह बीते‒लगभग एक वर्ष बीतने को आया। राधा का बेटा बैठते-बैठते अपने छोटे-छोटे पंजों पर चलना सीख गया। चाऊं-चाऊं करते-करते मां-मां करने लगा, मुस्कराता तो कमल के समान ही उसका मुखड़ा खिल उठता। आंखों की पलकें अपने पिता के समान लंबी और घनी थीं, परंतु मां के समान तीखी और अनोखी चमक से भरपूर, बच्चे को कोई भी देखता तो मन करता गोद में उठा ले। बच्चे के रूप में शाही बड़प्पन की झलक थी, जिसे राधा देखती और देखती रह जाती।

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