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कांटों का उपहार - पार्ट 14

रानू

8th August 2017

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...............‘लेकिन महाराज!' प्रताप सिंह ने फिर कहना चाहा।

 ‘मैंने कहा न, अब यह मंगनी कभी नहीं होगी।'

‘लेकिन महाराज! अब तो बहुत देर हो चुकी है। वे लोग तो राजमहल के लिए निकल भी पड़े होंगे। इसके अतिरिक्त शहर के कलेक्टर, कमिश्नर तथा उन सबका क्या होगा, जिन्हें निमंत्रण भी भेजे जा चुके हैं।'

‘प्रताप सिंह!' राजा विजयभान सिंह जोर से चीखे‒ ‘तुमने यह सूचना देने में हमें बहुत देर कर दी। क्या इसके पीछे स्वार्थ का हमें ज्ञान हो सकता है?'

‘महाराज! आपने हमारे जीवन की धारा बदल दी है, इसलिए हम चाहते हैं कि आपके जीवन का यह सूनापन भी दूर हो जाए। इस महल में कोई महारानी बनकर आए, ताकि यहां की दासियों को सेवा करने का अवसर प्राप्त होता रहे। जबसे आपने खामोशी धारण की है, किसी के पास कोई काम नहीं रह गया। आपका महल बस जाए तो हमें ही नहीं, सारी प्रजा को भी दिली संतोष प्राप्त होगा। हम जानते थे, यदि यह बात आपको याद दिलाई गई तो आप मंगनी से इनकार कर देंगे, इसलिए हमने ऐसा अवसर नहीं आने दिया।'

‘उफ ओह!' राजा विजयभान सिंह ने खिसियाकर चलते हुए अपना हाथ झटका, ‘तुमने मुझे एक मुसीबत में डाल दिया। यदि तुम्हारी जगह कोई और होता तो मैं उसे गोली मार देता।'

प्रताप सिंह दबे होंठ हल्के से मुस्कराया। उसको आशा की किरण दिखाई पड़ी। यदि महाराज की मंगनी हो गई तो राधा का विचार इन्हें अधिक नहीं सता सकेगा। महाराज जैसे सुंदर, लंबे-चौड़े, गोरे-चिट्टे आदमी के लिए किसी राजकुमारी की ही आवश्यकता है, गांव की गंदी युवती की नहीं। राजा विजयभान सिंह को परेशान अवस्था में छोड़कर वह महल के अंदर प्रविष्ट हो गया, तुरंत ही उसे मेहमानों की गिनती के अनुसार खाने-पीने का प्रबंध करना था।

उस सारी रात विजयभान सिंह बहुत परेशान रहे। एक पल भी चैन नहीं मिला। राधा का वही रूप, लुटी हुई अवस्था, भीगी हुई पलकें उनके दिल और दिमाग पर चुभते रहे। कानों में उसकी बद्दुआ पिघले शीशे के समान उतरती रही, परंतु बेलापुर की राजकुमारी के साथ मंगनी से इनकार करने का उन्हें कोई भी बहाना नहीं मिला।

शादी-विवाह तो एक अपनी ही पसंद होती है, जिस पर किसी का अधिकार नहीं होना चाहिए, परंतु उसके पिता ने जाने क्यों चौधरी कपाल सिंह से अपनी दोस्ती की गांठ मजबूत करने के लिए उसको सहारा बना लिया था। यदि राधा की ओर से कोई आशा होती तो इस मंगनी से इनकार करने मेें उन्हें आसानी होती, परंतु वह भी तो चली गई, उन्हें कोसती हुई, उनको बददुआएं देती हुई।..........