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कांटों का उपहार - पार्ट 46

रानू

9th September 2017

रानू का मशहूर और लोकप्रिय उपन्यास कांटों का उपहार अब ऑनलाइन पढ़ें, सिर्फ गृहलक्ष्मी डॉट कॉम पर....

...........‘बेटी‒' ठाकुर धीरेंद्र सिंह अपने किए पर बहुत अधिक लज्जित थे, अपना मुंह फेरकर भर्राई आवाज़ में बोले‒ ‘तुझे ढूंढ निकालने के लिए यदि हमें आकाश- धरती भी एक करना पड़ता तो कभी नहीं सकुचाते। सभी मां-बाप को अपनी संतानों से प्रेम होता है, फिर तू तो हमारी एकमात्र संतान है। तुझे नहीं मालूम तेरे अचानक ही चले जाने के बाद मारे शर्म के हम तो डूब मरना चाहते थे। वह तो कृपाल सिंह ने सबसे कह दिया कि तेरी तबीयत अचानक ख़राब हो गई है इसीलिए बात बन गई। फिर उसने जो भी राय हमें दी, हम उससे कृतज्ञ होकर सहमत होते चले गए। हमें क्या मालूम था कि यह सब वह अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है।'

सरोज की आंख छलक आईं परंतु वह कुछ बोली नहीं। वह यह भी नहीं समझ सकी कि जो कुछ उसने किया था वह उचित था या नहीं, परंतु इस समय जो परिणाम उसे मिल रहा था वह अवश्य उसके लिए लाभदायक था। उसका जीवन तो नष्ट होने से बच गया।

‘मैंने रूपमती का ट्रंककॉल पाते ही यहां के डी.एम. को फोन किया।' कुछ देर बाद ठाकुर साहब ने फिर कहा‒ ‘उन्होंने वहां तहकीकात की, पता चला कि पुलिस हैडक्वार्टर्स में लखनऊ पुलिस द्वारा इसकी सूचना आ चुकी है। कृपाल सिंह के यहां उन्होंने अचानक ही सुबह पांच बजे धावा किया तो बरामदे में राधा देवी ही नहीं मिलीं बल्कि शहर के छंटे हुए बदमाशों की खोह भी प्राप्त हो गई। स्मगलिंग की वस्तुएं तो इतनी मिली हैं कि बस देखते ही बनता था। कभी कोई सोच भी नहीं सकता था कि कृपाल सिंह इतने बड़े बदमाशों का सरदार है।' ठाकुर साहब एक पल को फिर रुके और बोले‒ ‘मैंने पुलिस हैडक्वार्टर्स फोन कर दिया है। बयान लेकर राधा देवी को छोड़ दिया जाएगा। मैं सोच रहा था कि किस प्रकार उन्हें लेने जाऊं, किस मुंह से उनके सामने खड़ा हो सकूंगा कि तुम आ गईं। अब बेटी! तुम ही पुलिस हैटक्वार्टर्स चली जाओ और उन्हें किसी प्रकार मनाकर यहां ले आओ तो मैं स्वयं उनसे क्षमा मांग लूंगा। तुम्हारे साथ आने में उन्हें अधिक आपत्ति भी नहीं होगी।'

 ठाकुर धीरेंद्र सिंह चुप हो गए। सरोज एक पल सोचती रही। कमरे में सन्नाटा छाया रहा। फिर कुछ देर बाद जब वह चलने को तैयारी हुई तो अचानक ही फोन की घंटी बजी। ठाकुर साहब ने लपककर रिसीवर उठा लिया। लखनऊ से ट्रंककॉल था।

 ‘हैलो!' उन्होंने तेज आवाज़ में कहा।

 ‘....' जाने क्या उधर से आवाज़ आई जिसे सरोज समझ न सकी।

 फिर ठाकुर साहब ने कुछ ज़वाब दिया‒कुछ सुना‒और भी कुछ सुना। चेहरे पर परेशानी के भाव बढ़ते ही जा रहे थे। फिर कुछ निराश से होकर उन्होंने कहा‒ ‘अच्छा-अच्छा हम लोग शाम तक पहुंच जाएंगे।'

 ‘....'

 

 

 

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