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कांटों का उपहार - पार्ट 55

रानू

18th September 2017

रानू का मशहूर और लोकप्रिय उपन्यास कांटों का उपहार अब ऑनलाइन पढ़ें, सिर्फ गृहलक्ष्मी डॉट कॉम पर....

‘मां!' कमल ने कहा ‘पागल हो गई हो क्या?' और राधा अपनी ही स्थिति पर तड़प उठी थी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह कोई सपना देख रही थी। सपने में ही चलकर वह यहां तक चली आई थी। अंधकार में वह इधर-उधर घूरने लगी थी।

 ‘कम-से-कम हमारे लिए ही अपना ख़्याल रखो मां।' कमल ने उसे सांत्वना देते हुए कहा था‒ ‘सरोज को देखो, कई दिन से उसकी अवस्था गंभीर है, यदि उसके दिल को कोई ठेस पहुंच गई तो मेरा क्या होगा? मैं नहीं रहूंगा तो फिर तुम क्या करोगी मां, जिसके लिए तुमने अपना जीवन तक नरक बना डाला है। मां! भूल जाओ पिताजी को, वह यदि जीवित होते तो क्या तुम्हारा नाम सुनते ही चले नहीं आते? हमने उनकी तलाश में क्या कुछ नहीं किया? उनके कान में तो यदि तुम्हारी पुकार की भनक भी पड़ जाती तो वह पंख लगाए उड़कर चले आते।'

 राधा की सिसकियां मद्धिम पड़ गईं।

 सरोज ने उसे एक ओर से कमर में हाथ डालकर सहारा दिया, दूसरी ओर से कमल ने उसे पकड़ा और धीरे-धीरे चलते हुए वे हवेली में प्रविष्ट हो गए। राधा जब पलंग पर लेटी तो उसके बाद एक पल भी उसे नींद नहीं आ सकी।

 सुबह के जब छः बजे तो राधा पलंग से उठ खड़ी हुई, नहाई न मुंह धोया, नाश्ता भी नहीं किया और हवेली की सबसे ऊंची मंजिल पर जा पहुंची। सुबह का वातावरण खुला और बहुत सुहाना था। यद्यपि सूर्य उदय हो चुका था, परंतु किसी बादल की ओट लिए छिपा फिर रहा था। बदला-बदला-सा मौसम था। ठंडी नम हवाएं उसकी खुली, अर्ध सफ़ेद लटों को बिखराकर चली जाती थीं। फिर भी उसके मन को संतोष नहीं मिल रहा था। ऐसा लगता था मानो रात में उठे तूफान का शोर अब भी बाकी है, फिर भी वह दूर-दूर तक नज़र उठाकर देखती‒गिरे हुए सूखे वृक्ष के उस पार जो पिछली रात की वर्षा और तूफान का शिकार हो चुका था, उस वृक्ष से उसके जीवन की कितनी सारी यादें संबंधित थीं, फिर भी उसने इस ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। उसकी आंखें तो आशाओं से रास्तों पर बिछी हुई थीं‒शायद उसका साजन आज ही आ गया‒शायद!! जाने क्यों रात की घटना के कारण उसे विश्वास हो चला था कि आज वह अवश्य आएंगे‒वह। उसके साजन राजा विजयभान सिंह, कमल के पिता।

 सहसा हवेली के पिछले भाग से जहां कुछ ही दूर पर मज़दूरों के कैम्प के उस पार ताड़ के लंबे-लंबे वृक्ष लगे थे, वहां से उड़कर जब कुछेक बड़े-बड़े गिद्ध हवाई जहाज के समान अपने पंख फैलाए हवेली के ऊपर से गुज़रे तो इनकी सनसनाहट से राधा का ध्यान बंट गया। उसने देखा, एक ही नहीं कई-कई गिद्ध एक के बाद एक, बहुत तेजी के साथ पंख फैलाए कुछ दूर जाकर नीचे उतरते जा रहे हैं, वह कोठे पर और किनारे आई, बहुत गौर से उसने देखा...दूर, बहुत दूर, एक जगह पर गिद्धों का झुरमुट बढ़ता जा रहा है। जाने क्यों उसके दिल की धड़कनें बहुत तेज हो गईं।

 तभी नाश्ते के लिए कमल मां को लेने के लिए ऊपर पहुंचा।

 ‘मां! चलो न, नाश्ता तैयार हो गया है और तुमने अभी तक स्नान भी नहीं किया।' उसने उसे कमर से थाम लिया।

 परंतु राधा का ध्यान उसी ओर रहा। उसने पूछा, ‘बेटा! वहां इतने ढेर सारे गिद्ध क्यों एकत्र हैं?'

 ‘मां! कोई जानवर मर गया होगा...' उसने भी दूर दृष्टि दौड़ाई।

 ‘जानवर?'

 ‘हां, मां!' वह बोला, ‘शायद पिछली रात की तूफानी वर्षा के कारण उसे कहीं शरण नहीं मिल सकी होगी।'

 राधा कुछ न बोली। धड़कनों पर काबू पाने का प्रयत्न करने लगी तो जाने क्यों अपने आप ही उसकी आंखें छलक आईं, जानवर? जानवरों का इस बंजर इलाके में बिना वर्षा के भी फंस जाना बहुत साधारण बात है।