GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

पाप का ताप

शकुन्तला वर्मा

29th April 2015

शिवानी के प्रति गजेन्द्र सिन्हा का व्यवहार जरूरत से ज्यादा उदार रहता था। वह न सिर्फ शिवानी की हर बात मान लेता था अपितु उसकी तरफदारी भी करता था। यह बात बाकी महिला-स्टाफ को बड़ी नागवार गुजरती थी। गजेन्द्र उनके साथ काफी सख्ती से पेश आता था।

पाप का ताप

 सुबह लगभग साढ़े नौ बजे शिवानी आफिस पहुँची। उसने अपना हैंडबैग टेबल पर रखा ही था कि:-
 मैडम, आपको मैनेजर साहब ने बुलाया है, अभी ''चपरासी ने शिवानी को आकर संदेश दिया।
 ठीक है तुम जाओ ''कह कर शिवानी कम्पनी के मैनेजर ‘गजेन्द्र सिन्हा' के केबिन में दाखिल हुई।
 अरे आओ शिवानी क्या बात है? आज तो लाल डेªस में गजब ढा रही हो। आई मिन बहुत अच्छी लग रही हो'' गजेन्द्र ने शरारत भरे अंदाज में कहा
 कुछ काम था सर? आपने बुलाया था।'' शिवानी ने संयत स्वर में कहा।
 ‘‘लो ये कुछ पत्र हैं इनका जवाब आज ही भेजना है। बहुत अरजैन्ट हैं।'' गजेन्द्र ने पत्रों को शिवानी की ओर सरकाते हुये कहा।
 ठीक है सर, मैं अभी कर देती हूँ। लेकिन सर, मुझे आज घर कुछ जल्दी जाना है। बहुत जरूरी काम है।'' शिवानी ने पत्रों को उठाकर झिझकते हुये कहा।''
 शिवानी भई तुम भी हद करती हो। मैंने तुम्हें आज तक कभी रोका है। इसमें कौन सी बड़ी बात है? बस, जाने से पहले बाकी का काम रेखा मैडम को हैण्ड ओवर करके जाना। वह सब संभाल लेगी।'' गजेन्द्र ने कहा।
 शिवानी के प्रति गजेन्द्र सिन्हा का व्यवहार जरूरत से ज्यादा उदार रहता था। वह न सिर्फ शिवानी की हर बात मान लेता था अपितु उसकी तरफदारी भी करता था। यह बात बाकी महिला-स्टाफ को बड़ी नागवार गुजरती थी। गजेन्द्र उनके साथ काफी सख्ती से पेश आता था। अभी कुछ देर पहले कमला गुप्ता ने सिर्फ एक घण्टे की छुट्टी अपने तीन साल के बेटे को इंजैक्शन लगावाने ले जाने के लिये मांगी थी। गजेन्द्र ने यह कह कर मना कर दिया कि घर के काम करने हैं तो अपनी छुट्टी कटवाओ और जाओ। अपनी तरफ़ गजेन्द्र का झुकाव शिवानी को बहुत खटकता था। गजेन्द्र के ऐसे व्यवहार के कारण वह स्वयं को दोषी महसूस करने लगी थी। शिवानी सुन्दर थी, समझदार थी, वह बहुत ही सौम्य और अन्र्तमुखी लड़की थी। गजेन्द्र सिन्हा लगभग उसके पिता की उम्र का था। अपने प्रति उसके गलत व्यवहार का विरोध करने की हिम्मत वह कमी जुटा पाती थी।
 शाम के लगभग साढ़े चार बजे शिवानी ने अपना बैग कन्धे पर लटकाते हुए रेखा से कहा ‘‘रेखा! यार मैं निकलती हूँ। अगर सर किसी काम से बुलाये तो ज़रा संभाल लेना'' रेखा उसके साथ वाले टेबल पर ही बैठा करती थी।
 ‘‘ओह‘‘ मैडम जी! आपकी आज्ञा का पूरी तरह से पालन किया जायेगा। जब आपकी बात सर नहीं टाल सकते तो हम किस खेत की मूली हैं? पर मैं आपकी नॉलेज के लिये बता दूँ कि सर लंच के बाद से ही कहीं निकल गये हैं। आप तो केवल नाम की सैक्रेटरी हैं, असली ताजा खबरे तो हमसे पूछा करो'' रेखा ने मज़ाकिया अंदाज में खिलखिलाते हुए कहा। शिवानी भी हँसते हुये अपना बैग उठाकर आफिस से निकल गयी।
 उस दिन शिवानी ने राहुल तथा उसके घरवालों को शाम की चाय पर अपने घर बुलाया था। शिवानी ने अपने तथा राहुल के बारे में अपनी मम्मी तथा भाई को पहले से ही सब कुछ बता दिया था। शिवानी और राहुल कालेज के जमाने से ही एक दूसरे से प्यार करते थे। आफिस से निकलकर पूरे रास्ते उन दिनों की यादें एक फिल्म की रील की तरह उसकी आँखों से होकर गुज़रने लगी थी।
 कालेज में उस दिन वार्षिक-उत्सव का दिन था। पूरे कॉलेज में शादी जैसा माहौल था। चपरासी से प्रिंसिपल तक सभी व्यस्त नजर आ रहे थे। खेल के मैदान के बीचो बीच एक भव्य मंच बनवाया गया था। अन्दर हाल में लड़के-लड़कियां सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिहर्सल करते नजर आ रहे थे। शिवानी भी उनके साथ एक नाटक पेश करने की तैयारी में जुटी थी? बीच-बीच में सभी हंसी मजाक करते, गपशप मारते। कभी चाय की चुस्कियाँ भरते, माहौल को एक नवीन उर्जा से भर रहे थे। ठीक बारह बजे मुख्य अतिथि माननीय मंत्री महोदय का आगमन हुआ। प्रवेश द्वार से मंच तक मंत्री जी का भव्य स्वागत किया गया। कालेज के बैण्ड की धुन शिवानी को हाल में साफ सुनाई दे रही थी। तभी मंच से एक सधे हुये स्वर में सुरीला गीत शिवानी के कानों में पड़ा। गाने वाले के स्वर में ऐसी कशिश थी कि वह मंच की ओर बरबस दौड़ पड़ी। पंडाल में सभी मंत्र-मुग्ध हो कर गाना सुन रहे थे। जैसे ही गाना खत्म हुआ तालियों की ध्वनि मानो आसमान छूने लगी। उस दिन शिवानी ने पहली बार राहुल को मंच पर देखा था।
 अगले दिन शिवानी ने राहुल को कैंटीन में देखा तो स्वयं को रोक नहीं पाई और उसके पास चली गई।
 हैलो! आई एम शिवानी। मैं फस्र्ट इयर की स्टूडैन्ट हूँ। शिवानी ने अपना परिचय देते हुए कहा।
 ओह हेलो! आई एम राहुल। मैं भी फस्र्ट इयर का ही स्टूडैन्ट हूँ। राहुल ने विनम्रता से जवाब दिया।
 ‘‘मि. राहुल आप वाकई बहुत अच्छा गाते हैं। आपके गीत के मधुर स्वर अभी तक मेरे कानो में गूंज रहे है। क्या आपने कहीं से सीखा है'' शिवानी ने मुस्कुराते हुये कहा।
 ‘‘नहीं-नहीं! शिवानी जी, ऐसा कुछ नहीं है। बस बचपन से ही गाने में रूचि रही है। सो यूँ ही कभी कभी गुनगुना लिया करता हूँ।'' राहुल ने कहा'
 उस दिन शिवानी राहुल के सरल-सौम्य व्यवहार से बहुत प्रभावित हुई थी। उस दिन के बाद वजह-बेवजह दोनो की मुलाकातें अक्सर होने लगी थी। आकर्षण और एक अजीब सी कशिश दोनो को कुछ ही दिनों में इतना करीब ले आई कि उनकी औपचारिक मुलाकातें कब प्यार में बदल गई इसका अहसास तक नहीं हुआ। दोनों प्यार की कश्ती में सवार मचलती लहरों पर आगे बढ़ते रहे समय बीतता रहा और जब कालेज में अंतिम वर्ष की परीक्षायें हुई तो दोनों ही अच्छे अंको से पास हो गये। उस दिन दोनों बहुत खुश थे।
 कैंटीन में बैठे राहुल ने शिवानी के दोनों हाथो को अपने हाथों में लेते हुये कुछ चिंतित स्वर में कहा ‘‘शिवानी मुझे दो साल के लिये ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ेगा। पापा भेज रहे हैं।''
 ‘‘ये अचानक वहाँ क्यों जा रहे हो। ऐसा तो तुमने कभी बताया नहीं'' शिवानी ने घबरा कर कहा
 ‘‘अरे सारी गलती मेरी ही है। मैं ही हमेशा उन्हें कहा करता था कि मुझे एम.बी.ए. बाहर से करनी है। बस पापा ने सारा इंतजाम कर दिया। अब मना कैसे करूँ। सोच रहा हूँ पढ़ाई पूरी कर ही लूँ। लौटने पर पापा को तुम्हारे बारे में सब-कुछ बता दूँगा। मुझे पूरा यकीन है पापा मेरी बात कभी नहीं टालेंगे'' राहुल ने उस दिन बड़े विश्वास के साथ कहा था।
 इस मुलाकात के एक सप्ताह बाद राहुल आस्ट्रेलिया चला गया। इधर शिवानी पर मानो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। अचानक उसके पिताजी की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। वे किसी जानी-मानी कम्पनी में मैनेजर थे। उन्हीं की कमाई से घर चलता था। ऐसे समय में पिता की पुरानी जान-पहचान काम आई और शिवानी को अच्छी कम्पनी में नौकरी मिल गई थी। छोटा भाई नवीन बी-टैक कर रहा था इसलिय शिवानी की माँ ने अपने मकान का ऊपर का हिस्सा किराये पर उठा दिया। इसी तरह जीवन के दिन कटते रहे और आखिर दो वर्ष बीत गये। राहुल आस्ट्रे से लौट आया था। आते ही वह शिवानी से मिला। शिवानी की खुशी का कोई ठिकाना न था। राहुल के आते ही शिवानी ने राहुल के घरवालों को शाम को अपने घर चाय पर बुला लिया था। आफिस से निकलने के बाद रास्ते भर अतीत के सरोवर में गोते खाती शिवानी घर पहुँची और ज्यो ही बैठक में दाखिल हुई तो सामने राहुल सोफे पर बैठा था। माँ और नवीन से बातें कर रहा था। शिवानी को देखते ही प्रसन्नता का भाव उसके चेहरे से फूटने लगा।
 ‘‘शिवानी इनसे मिलो, यह मेरे पापा हैं।'' राहुल ने पास बैठे शख्स की ओर इशारा करते हुये कहा।
 शिवानी ने मुस्कुराते हुये उस शख्स को देखा और श्रृद्धा से हाथ जोड़ दिये। किन्तु तत्क्षण शिवानी बुरी तरह सकपका गई। उसका गुलाबी चेहरा यकायक पीला पड़ गया। उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। इस शख्स ने यहां अपने ही घर में यूँ मुलाकात होगी उसने कभी सोचा नहीं था। क्षणभर के लिये उसका मस्तिष्क सुन्न पड़ गया। जैसे ही उस शख्स ने शिवानी को देखा तो घबराहट में पसीना-पसीना हो गया। कि कर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में उठ कर खड़ा हो गया। इससे पहले कि शिवानी कुछ कहती वह कमरे से बाहर निकल गया। वह शख्स कोई और नहीं शिवानी का मैनेजर गजेन्द्र सिन्हा था। तीन-चार महीने पहले ही गजेन्द्र कम्पनी में आया था। तभी से उसकी शिवानी पर नजर थी। वह उसकी मजबूरियों का फायदा उठाना चाहता था। शिवानी की सुन्दरता और गजेन्द्र की दिखावटी आत्मीयता उसके लिये अभिशाप बन गई थी। शिवानी को निकट लाने के लिये गजेन्द्र हमेशा मौके की तलाश में रहता था। कभी डिक्टेशन के बहाने अपने केबिन में बुलाता, कभी शाम की चाय के लिये बुलावा भेजता था तो कभी कम्पनी के हैड आफिस साथ ले जाने के बहाने बाजारों में घुमाता। महंगी-महंगी चीजे दिलवाने का प्रयास करता। होटलो में खाना खिलाता। शिवानी कैद में फँसी बुलबुल की तरह मजबूरन सहती रहती।
 उस दिन तो हद ही हो गयी जब गजेन्द्र ने छुट्टी के बाद शिवानी की डिक्टेशन के बहाने अपने केबिन में बुलाया और लपक कर अपनी बाँहों में भर लिया और बोला ‘‘तुम इतनी सुंदर हो, समझदार हो, मेरे साथ कौपरेट करोगी तो जल्दी ही तुम्हारी प्रमोशन करवा दूँगा। तुम्हारे भाई नवीन को भी अच्छी कम्पनी में लगवा दूँगा।'' शिवानी उसकी बाँहों की मजबूत गिरफ्त में कसमसा रही थी। गजेन्द्र ने अपने होठ शिवानी के होठों पर रख दिये।
 छोड़ दीजिए सर! आप मुझे गलत समझ रहे हैं। मैं ऐसी लड़की नहीं हूँ। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिये।'' शिवानी ने स्वयं को गजेन्द्र की गिरफ्त से मुक्त करते हुये कहा और केबिन से बाहर निकल गई। इस घटना से शिवानी इतनी आहत हुई कि समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? कभी सोचती घर में बता दूँ या पुलिस में चली जाऊँ। किन्तु नौकरी खो जाने का डर तथा बदनामी के डर ने उसके होंसले को तार-तार कर दिया सोचा राहुल को फोन पर सब कुछ बता दे। पर मन डरता कि आजकल के लड़कों के दिमाग का कुछ पता नहीं कहीं मेरे चरित्र पर ही संदेह न करने लगे।
 शिवानी के घर से यूँ यकायक गजेन्द्र का उठकर चले जाना तथा शिवानी की परेशान मुख-मुद्रा देखकर राहुल तथा शिवानी के घर वाले कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर यह माजरा क्या है। परिस्थितिवश शिवानी खुद को रोक नहीं पाई उसके हृदय का सारा अवसाद लावे की तरह फूट पड़ा। उसने अपनी आप-बीती का एक-एक वाक्या राहुल तथा घरवालें को बताया। राहुल का मन गहन-पीड़ा तथा शर्मिन्दगी से भर गया। पिता की करतूतों ने शिवानी और राहुल के विवाह पर सवालिया निशान लगा दिया। वह अपने पिता को अपना आदर्श समझता था। पर आज उसकी आस्था चकनाचूर हो गयी थी। अच्छा हुआ माँ यह दिन देखने से पहले ही ऊपर चली गई। अगर जिन्दा होती तो जीते जी मर जाती।
 लुटे हुए मुसाफिर की तरह बिना कुछ कहे राहुल शिवानी के घर से निकल पड़ा और देर रात तक सड़कों पर यहां-वहां भटकता रहा था शिवानी से शादी न हो सकेगी इसका राहुल को इतना गम नहीं था, जितना अपने पिता के पतन का सदमा था।
 उस दिन शिवानी एक जड़-मूर्ति के समान अपने कमरे में बैठी चारों ओर पसरते रात के अंधेरे में अपने दुर्भाग्य की छाया साफ देख रही थी। वक्त और हालात एक पल में बदल गये थे। उसके और राहुल के विवाह के बीच खड़ा हो गया था एक प्रश्न चिह्न। कैसे कर पायेगी ऐसे लड़के से विवाह जिसके पिता की कुदृष्टि की शिकार यदि वह जाती तो उसकी जिन्दगी तो क्या आत्मा भी तार-तार हो जाती। इस घटना से शिवानी की मां तारा को मानो तोड़ के रख दिया था। बेटी को अंधेरे में बैठा देख तारा का कलेजा टूक-टूक हो गया था। काश उसके पति उन्हें बीच सफर में यूँ अकेला छोड़ कर न चले गये होते तो शिवानी को नौकरी के लिये यह सब न सहना पड़ता। आँसुओं से लबालब भरी आँखों को अपने साड़ी के पल्लू में खाली कर तारा ने कमरे में प्रवेश किया बत्ती जलाई, और बेटी के सिर पर हाथ फेरा और उसका सिर अपनी छाती से सटा कर कहा ‘‘बेटी मन छोटा क्यों करती हो? अच्छा हुआ उनकी असलियत पहले ही सामने आ गई। अगर कहीं शादी के बाद कुछ ऊँच-नींच हो जाती तो...। भगवान जो करता है, अच्छे के लिये करता है। अच्छा चलो उठो और हाथ मुँह धो लो। मैं तुम्हारे लिये तुम्हारी पसन्द की काफी बना कर लाती हूँ।'' तारा ने बेटी के मुँह को दोनों हाथों में ले कर उसके माथे को चूम लिया और मुस्कुराते हुये रसोईघर में चली गई। उसी समय संयोगवश शिवानी के घर के सामने खाली पड़े प्लाट पर अस्थाई रूप से रह रहे एक मजदूर परिवार की बनी झुग्गी में बज रहे रेडियो से पुराने फिल्मी गाने के स्वर शिवानी के कानो में पड़े (मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता, अगर तूफाँ नहीं आता किनारा मिल गया होता) इतना सुनना था कि अचानक शिवानी फूट-फूट कर रोने लगी। शिवानी ने राहुल के साथ अपना छोटा सा घर-संसार बसाने के कैसे-कैसे सपने देखे थे। सब कपास के फूल की तरह बिखर कर रह गये। वक्त के सामने कहां किस की चली है। अगर वक्त खराब हो तो सब कुछ तिनके की तरह बिखर जाता है। इन दिनों में राहुल का कोई फोन नहीं आया न शिवानी ने कभी मिलने की कोशिश की थी। वह सोचती थी उस रास्ते पर क्या जाना जिसकी मंजिल पहले ही ध्वस्त हो चुकी हो। पर राहुल की यादों की कसक एक टूटे कांच की तरह शिवानी के हृदय में गड़ी हुई थी। अब तो शिवानी ने खुद को घर में कैद सा कर लिया था। घर के किसी कोने में घन्टों अकेले गुमसुम बैठे रहना शिवानी की दिनचर्या का अहम् हिस्सा था। उसे अकेलापन भाने लगा था। तारा यह सब देखती तो उसका दिल बैठने लगता। वह उसे बहुत समझाती कि वह दुबारा कहीं नौकरी कर ले। बाहर निकलेगी तो लोगों से मिलेगी। काम में मन लगायेगी तो पुरानी यादें खुद ब खुद धुंधली पड़ जायेगी। माँ के जोर देने तथा घर के बिगड़ते हालात को देख शिवानी ने किसी दूसरी कम्पनी में नौकरी कर ली। कहते हैं वक्त अगर घाव देता है तो वही घाव भर भी देता है। दिन-सप्ताह-महीने गुजरने लगे। जिन्दगी की रेल फिर पटरियों पर उतरने लगी थी। समय का पहिया वर्तमान को रोंदता हुआ अतीत को पीछे छोड़ता आगे बढ़ता जा रहा था।
 वो एक रविवार का दिन था। शिवानी की छुट्टी थी। सुबह के आठ बजे भी शिवानी अपने बिस्तर पर चादर में लिपटी पड़ी थी। तारा ने आँगन के गेट की कुंडी में फंसा आज का अखबार निकाला और शिवानी के कमरे आ गई। अखबार शिवानी के बिस्तर पर रखते हुये कहा ‘‘बेटे मैं मन्दिर जा रही हूँ। तब तक तुम भी उठ जाओ और नहा-धो लो। नवीन को भी उठा दो। मैं आकर आलू के परांठे बनाऊँगी। आज तीनों एक साथ मिल कर नाश्ता करेंगे''
 माँ की आवाज सुन कर शिवानी उठ कर बैठ गयी। हर रोज की तरह उठते ही अखबार खोला और मुख्य खबरों पर सरसरी नजर डाली। पन्ना पलटते ही शिवानी का नजर अखबार में छपे एक चित्र पर अटक गई। वह एक मृत व्यक्ति का चित्र था जो पुलिस ने पहचान के लिये छपवाया होगा। चित्र कुछ जाना पहचाना सा लगा। असमंजस की स्थिति में शिवानी नहाने चली गई। नाश्ते के बाद वह फिर अखबार लेकर बैठ गई, सोचा आज तो अखबार इत्मिनान से पढूँगी। और दिन तो भाग दौड़ सी मची रहती है। पन्ना पलटा तो नजरे फिर उसी तस्वीर पर अटक गई। शिवानी को ऐसा क्यों लग रहा था कि यह तस्वीर राहुल के पिता गजेन्द्र सिन्हा से हूबहू मिल रही है। तुरन्त शिवानी ने तस्वीर अपनी माँ को दिखाई
 ‘‘माँ जरा देखो यह फोटो किसी जानकार की तो नहीं'' शिवानी ने कहा
 ‘‘क्या कह रही है ला दिखा'' माँ ने तस्वीर देखी और कहा ‘‘यह तस्वीर तो कल भी मैंने अखबार में छपी देखी थी, शायद लावारिश होगी''
 ‘‘माँ एक बार गौर से देखो'' यह शक्ल राहुल के पिता गजेन्द्र सिन्हा से बिल्कुल मिलती है'' शिवानी ने कहा।
 हे भगवान। क्या कह रही है बेटी? तारा ने दराज से चश्मा निकाल कर आँखों पर लगाया और ध्यान से देखा तो बोली'' अरे हाँ, बेटा लग तो वही रहे हैं। पर यह कैसे हो सकता है? उनकी तस्वीर इस तरह क्यों छपेगी? पर छोड़ बेटा हमारा इस सब से क्या लेना देना।'' तारा ने अखबार तह लगा कर एक तरफ रख दिया।
 शिवानी का आशंकित मन बार-बार कह रहा था यह गजेन्द्र सिन्हा ही हैं। उसकी शक्ल वह कैसे भूल सकती है। पर ऐसे हालात भी कैसे हो सकते हैं। गजेन्द्र तो अपने बेटे राहुल के साथ रहता है। अखबार में छपे इस चित्र ने शिवानी को महीनों पीछे खींच कर खड़ा कर दिया था। एक विचार बार-बार सिर उठा रहा था क्यों न वह राहुल को फोन करे अथवा उससे मिल ले। मन की शंका भी दूर हो जायेगी। आखिर राहुल और शिवानी के संबंधों में तो कोई मतभेद नहीं था। राहुल तो स्वयं अपने पिता के किये की सजा काट रहा था।'
 अगले दिन शिवानी ने आफिस के लंच टाईम में राहुल को फोन किया और मिलने की इच्छा जाहिर की। वह तुरन्त मान गया। तय हुआ कि आज शाम साढ़े चार बजे वह अपने कालेज के पास वाले पार्क में मिलेंगे।
 शिवानी ठीक शाम के साढ़े-चार बजे पार्क जा पहुँची। राहुल पहले ही वहां पहुँच चुका था। वह उसी बैंच पर बैठा था, जहाँ वह कालेज टाईम में घन्टों बैठ कर बातें किया करते थे। वह बहुत उदास सा लग रहा था। उसका गोरा चिट्ठा रंग मुरझा सा गया था। शिवानी को देख कर वह मुस्कुरा कर खड़ा हो गया ‘‘कैसी हो शिवानी घर में सब कैसे हैं? ये अचानक मुझे यहाँ क्यों बुला लिया?
 ‘‘घर में सब ठीक हैं राहुल, तुम सुनाओ तुम्हारे घर वाले कैसे हैं?'' शिवानी ने अपने मन की शंका के चलते राहुल के मन की टोह लेते हुये पूछा।
 ‘‘मेरे घर में अब सिर्फ मैं ही हूँ और मैं तुम्हारे सामने हूँ, बिल्कुल ठीक हूँ। राहुल ने कहा।
 ‘‘क्या तुम अपने पिता के साथ नहीं रहते''? अकेले रहने लगे हो? शिवानी ने पूछा।
 शिवानी शायद तुम नहीं जानती और जानोगी भी कैसे, मैंने तुम्हें कभी कुछ बताया ही नहीं। मैं तुम्हें बताता भी क्या? और किस मुँह से बताता कि पापा घर छोड़ कर कहीं भाग गये हैं। उस दिन तुम्हारे घर से लौटने के बाद अगली सुबह चुपचाप बिना किसी को बताये पता नहीं कहाँ चले गये। मैंने पता लगाने की हर मुमकिन कोशिश की पर सब बेकार। पिछले छः-सात महीनों से पापा की कहीं से कोई खबर नहीं मिली। राहुल की बातों से शिवानी का शक यकीन में बदल गया कि यह तस्वीर गजेंद्र की ही है। पर राहुल यह सब नहीं जानता। क्या राहुल अखबार नहीं पढ़ता। शिवानी ने अपने पर्स से अखबार निकाला और उसके छपी तस्वीर दिखाते हुए कहा ‘‘देखो यह तस्वीर अखबार में छपी है। मुझे बेकार में वहम् हो रहा है'' मैंने इसलिये तुम्हें यहां बुलाया है।
 राहुल ने झपट कर अखबार शिवानी के हाथ से खींच लिया और देख कर घबरा गया ‘‘ये पापा ही लग रहे हैं, हे भगवान! इनकी फोटो ऐसा क्यों छपी है। ये मेरी कौन सी परीक्षा ले रहे हो। बेटे के होते हुये बाप इस तरह लावारिस कैसे हो सकता है?'' राहुल शिवानी को घर भेज स्वयं पुलिस स्टेशन के लिये निकल पड़ा। वहाँ उसे पता चला कि पिछले 2 दिनों से गजेन्द्र सिन्हा का मृत शरीर पुलिस कस्टडी में रखा हुआ है। गजेन्द्र सिन्हा मथुरा रोड हाईवे पर किसी गाड़ी की चपेट में आ जाने से मृत पाया गया। राहुल के दुख का ठिकाना न रहा उसने अपने सभी मित्रों, पड़ोसियों को, नातेदारों को फोन किया और आवश्यक औपचारिकताओं के बाद पिता का शव ले लिया। राहुल तथा उसके परिजनों ने शमशान भूमि में उन्हें अन्तिम विदाई दी। राहुल ने अपने हाथों अपने पिता का अन्तिम संस्कार किया। शमशान भूमि से ही सभी एक-एक करके राहुल को सांत्वना देते हुये विदा हो गये। राहुल भारी मन से शमशान भूमि से बाहर निकला तो सूर्य अस्ताचल में डूब रहा था। डूबते सूरज की सुनहरी पीली किरणों की आभा के बीच केवल दस कदम की दूरी पर शिवानी खड़ी थी। उसके कुछ ही  कदम पीछे माँ और नवीन भी खड़े थे। शिवानी की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। शिवानी को देखते ही राहुल के पैर मानो वहीं जड़ हो गये थे। शिवानी के कदम खुद-ब-खुद राहुल की ओर बढे़। राहुल के पास जाकर उसने उसके हाथ अपने हाथों में ले लिये। दोनों ने एक दूसरे के हाथ थाम लिये और फिर बढ़ा दिये कदम, एक नई दिशा, एक नये मुस्तक्बिल की ओर...