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प्रायश्चित का रास्ता

भावना प्रकाश

5th July 2017

समाज में आए दिन होने वाली दरिंदगी की खबरें क्यों पंखुड़ी को मीता की याद के साथ-साथ अपराधबोध से भर जाती थीं। क्यों पंखुड़ी अपनी बचपन की सखी मीता से मिलने से पहले असहज महसूस कर रही थी।

प्रायश्चित का रास्ता

हम ट्रेन में बैठ गए थे लेकिन मैं अभी तक असमंजस में थी। क्या मेरा निर्णय ठीक है? क्या मुझे वाकई मीता के यहां जाना चाहिए? मेरे विनोदप्रिय पति को अभी भी अठखेली सूझ रही थी। मेरी दुविधा भांप कर बोले, 'अभी दो मिनट हैं ट्रेन चलने में। अगर चाहो तो उतर सकते हैं। हीरो-हीरोइन चलती ट्रेन में चढ़ते हैं, हम उतर जाएंगे। मेरी नजर का उलाहना भरा प्रत्युत्तर देखकर हंस पड़े वे। धीरे-धीरे जब ट्रेन ने गति पकड़ ली तब मैं अपनी दुविधा को यकीन दिला पाई कि मैं सचमुच अपनी बिछड़ी सखी मीता के घर जा रही हूं। जाने क्या प्रतिक्रिया होगी उसकी मुझे देखकर। ठीक है! जो होगा, देखा जाएगा। वो धिक्कारेगी, ज्यादा से ज्यादा अपशब्द कह लेगी और क्या। उसका हक बनता है। क्या पता मुझे धिक्कार कर उसकी थोड़ी काउंसलिंग हो जाए। माफी मांगने ही तो जा रही हूं मैं। दिल का बोझ तो उतर जाएगा।

अभी एक हफ्ते पहले की ही तो बात है, सुबह-सुबह समाचार में फिर से एक दरिंदगी देखकर मूड ऑफ था कि सोसायटी की सेक्रेटरी लीना की ओर से कैंडल मार्च का आमंत्रण आया। कुछ साल पहले ऐसा ही एक हादसा समाचारों की सुर्खियां बना था तो कैंडल मार्च किया था सोसायटी की महिलाओं ने। उसके बाद से तो ये जैसे दिल की भड़ास निकालने और चुप बैठने से बेहतर कुछ करने का साधन बन गया था। मार्च के बाद सब मिलकर बहस करते कि हम अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं। नतीजा तो निकल नहीं पाता कोई लेकिन मेरे दिल पर रखी शिला और भारी हो जाती। जाने कितने सालों से अपराधबोध की इस शिला के साथ जी रही थी मैं। अब असहनीय हो गया था वो दर्द। वो दर्द जो उसकी आवाज में उस दिन सुना था, 'तू कल अदालत में गवाही देने आएगी न? देख, आना जरूर।' मगर मैं नहीं गई थी। नहीं... नहीं जा पाई थी। नहीं, नहीं जाने दी गई थी। उस एक दिन एक कटघरे से जी क्या चुराया सारी जिंदगी के लिए जमीर ने मुझे कटघरे में खड़ा कर दिया।

उस दिन कैंडल मार्च से लौटने के बाद फेस-बुक खोला तो हाथों ने आप ही मीता का नाम टाइप कर दिया। अरे यह क्या! तुरंत मिल गई वो। उसका अपना पेज था। कुछ सौ फालोअर्स थे। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कब फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी, कब उत्तर आया कि इस रविवार को आ जा, पता ही नहीं चला। मीता के और हमारे शहर में इस सुपर-फास्ट ट्रेन से केवल दो घंटे का रास्ता था। मैंने आराम से पीठ टिका ली। बाहर पीछे भागते दृश्यों की तरह मन भी अतीत की ओर भागने लगा। जब हर समय हंसते रहते थे हम लोग। सहेलियो के साथ मस्ती और हुल्लड़, बस यही था जिंदगी का मतलब।

घर से स्कूल केवल दो किलोमीटर था। मम्मी कार से छोडऩे-लेने जाती थीं। कॉलोनी से निकल कर मुख्य सड़क पर आते ही दिखता था हंसती चहकती लड़कियों का साइकिल पर सवार झुंड। मेरे ही स्कूल की यूनिफार्म में। अपनी धुन में मगन चहकती लड़कियों को देखकर मैं भी जिद पकड़ लेती साइकिल से स्कूल जाने के लिए। और एक दिन सच में एक चमचमाती हुई रंग-बिरंगी साइकिल आ गई थी। 'मैं समझता था कि मेरी पंखुड़ी बहुत नाज़ुक है मगर वो तो मजबूत हो गई है। अब से तुम भी साइकिल से स्कूल जाओगी। खुश।' पापा प्यार से बोले थे।

पापा ने बड़े अरमानों से मेरा नाम पंखुड़ी रखा था। उनका मानना था कि मैं गुलाब की पंखुड़ी की तरह नाज़ुक और ताजगी भरी थी। मगर मैं गुलाब की पंखुड़ी नहीं, एक जीती जागती लड़की थी, ये उन्हें याद दिलाना पड़ता था। दूसरे दिन साइकिल लेकर अपने समूह से मिली तो सबसे ज्यादा खुश मीता हुई थी। मेरी सबसे अच्छी सहेली जो थी। करीब आठ लड़कियों का समूह मिलकर साइकिल से स्कूल जाता था। मैं ऐसे चल रही थी जैसे मेरे हाथ में साइकिल नहीं हवाई घोड़ा हो, साइकिल के नीचे सड़क नहीं बादल हों। तभी मेरा ध्यान गया कि कुछ आवारा लड़के भी हमारे साथ-साथ चल रहे थे। उनकी फब्तियां सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मगर क्योंकि कोई लड़की जवाब नहीं दे रही थी इसलिए मैंने भी नहीं कहा।

'तुम लोग इनकी हरकतों से इरिटेट नहीं होतीं?' स्कूल पहुंच कर मीता से पूछा था मैंने। 'इरिटेट होकर क्या स्कूल छुड़वाना है' 'मतलब?' 'मतलब ये मेरी भोली रानी कि मेरे लम्बे चौड़े परिवार में अगर मम्मी हर लड़की को कार से स्कूल छोडऩे जाएंगी तो घर का काम कौन करेगा? वैसे इसके लिए कार भी होनी चाहिए।' कहकर वो हंस पड़ी थी। मीता जितनी मेधावी थी मैं उतनी ही साधारण, वो जितनी जुझारू थी मैं उतनी ही भगेड़ू। वो तन और मन से दृढ़ और सशक्त और मैं दोनों से ही नाज़ुक।

अक्सर मैं उससे इसका राज़ पूछती तो वो कहती, 'जिंदगी सबसे बड़ी किताब है। वही सिखाती है। मैं अपने पापा की पंखुड़ी नहीं, घर के चिराग की प्रतीक्षा में किया गया एक निष्फल प्रयत्न हूं। गुलाब को तराशना पड़ता है, झाडिय़ां अपने-आप बढ़ जाती हैं। मुझे अपनी जिंदगी खुद ही संवारनी है। सरकारी स्कूल में आठवीं में टॉप किया तो यहां मुफ्त में प्रवेश मिला। यहां बारहवीं में टॉप करूंगी तभी कोई स्कॉलरशिप मिलेगी ताकि इंजीनियरिंग पढ़ पाऊं। तू खुशकिस्मत है कि शिक्षित परिवार में जन्मी है। सुख, सुविधाएं और साधन हैं मगर उन्होंने ही तुझे कमज़ोर बना दिया है। उनका उपयोग खुद को सवांरने के लिए कर पगली।

कुछ महीने तो सब कुछ ठीक चला, फिर एक दिन एक हादसा हो गया। मेरी उन आवारा लड़कों से झड़प हो गई। एक ने मेरा हाथ पकड़ लिया। मैं तो डर के मारे पीली पड़ गई थी। पैर कांपने लगे और साइकिल गिर पड़ी। सब लड़कियां मुझे छोड़कर चली जातीं, अगर मीता उन्हें अपनी ओजस्वी वाणी से न रोकती। उसने सबको रोककर आगे बढ़कर उस लड़के से मेरा हाथ छोडऩे को कहा। न मानने पर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया और एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। 'हमें कमजोर मत समझना' वो बोली। भीड़ देखकर वे लड़के भाग गए।

मैं वहीं खड़े-खड़े रोनी लगी। उसने मुझे चुप कराया और अपनी साइकिल पर बिठा कर घर छोडऩे आई। मेरे पैर इतने कांप रहे थे कि साइकिल चलाने की हिम्मत ही नहीं थी। घर में बात पता चली तो मम्मी के गुस्से का ठिकाना नहीं रहा 'इतने दिनों से कुछ बताने की जरूरत नहीं समझी तुमने?' और मेरा साइकिल से जाना बंद हो गया। मम्मी पहले की तरह कार से छोडऩे लगी। तभी सुना उस हादसे के बारे में जो आज तक मेरे दिल पर किसी भारी शिला की तरह रखा है। इसे हटाने के सारे प्रयत्न विफल रहे हैं।

एक सुनसान जगह पर मीता को दबोच लिया था उन लड़कों ने और उसके होंठो की सारी हंसी बेरहमी से नोच कर फेंक दी थी। चार दिन बाद खबर मिली तो हम हॉस्पिटल दौड़े। मेरी हालत तो उसे देखकर ही खराब हो गई। उसकी आंखें शून्य में गढ़ी थीं। मुझे देखा तो मुझसे लिपट कर फूट-फूट कर रो पड़ी। तभी पुलिस इन्स्पेक्टर आ पहुंचे। 'आप फोटो लाए हैं न?' वो उन्हें देखते ही चीखी। 'हां बेटा' 'इसे दिखाइए, ये भी पहचानती है। ये बड़े घर की बेटी है। इसकी बात पर तो यकीन करेंगे न आप?' मुझे तुम्हारी बात पर भी यकीन है बेटा? मगर बात अदालत को यकीन दिलाने की है।' कहकर उन्होंने फोटो मेरे आगे कर दीं।

'आपने पकड़ लिया इन्हें? मैं खुशी से उछल पड़ी। हां तीनों वही हैं। इसी ने हाथ पकड़ा था मेरा। मैं पहचानती हूँ। फिर मैंने अच्छी तरह से सारी बातें विस्तार से कह सुनाईं। इंस्पेक्टर के बगल में एक आदमी सब लिख रहा था और रिकार्ड भी कर रहा था। मैंने हस्ताक्षर किए तो मीता के क्षुब्ध चेहरे पर एक हल्की सी किरण आई। 'अब तो उन्हें सजा मिल जाएगी न अंकल? उन्हें छोडि़एगा नहीं।' इंस्पेक्टर ने मीता के सिर पर हाथ रखकर कहा 'मैं पूरी कोशिश करूंगा। तुम अदालत में भी ये सब बोल पाओगी न बेटा? इंस्पेक्टर ने मुझसे पूछा तो मैंने हां में सर हिला दिया।

डाक्टर और नर्स उसका आत्मबल देखकर हैरान थे और वो थी कि मुझसे कह रही थी, 'देख, एक दिन भी स्कूल का नागा नहीं करना और ध्यान से काम पूरा करना। मैं ठीक होकर आऊंगी तो तुझसे ही सारा काम पूरा करूंगी। उसे स्पेस इंजीनियर जो बनना था। एक सपने ही तो उसकी पूंजी थे। एक ओर मीता थी जो भयानक शारीरिक और मानसिक कष्ट से जूझ रही थी। दूसरी ओर मैं थी जो उसे देखकर ही इतना डर गई थी कि मुझे चलते-फिरते, उठते-बैठते केवल वे लड़के ही दिखाई देते थे।

रोज मेरे दिल में सखी के स्नेह और डर के बीच मल्लयुद्ध होता। स्नेह कहता उसके पास जाऊं, उसकी चोट पर मरहम लगाऊं। लेकिन डर मना कर देता। और जब एक दिन उसका फोन आने पर स्नेह जीता तो मम्मी ने मना कर दिया। 'क्यों?' पूछने पर मम्मी ने कहा तुम अपनी बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी करो। दूसरे दिन फिर फोन आया। वो कक्षा की पढ़ाई के बारे में विस्तार से पूछती और मैं जो कुछ बता पाती बता देती। मम्मी वहीं बैठी रहतीं। एक दिन वो रोने लगी। 'नोटबुक्स देखूं तो शायद समझ पाऊं, अब सुनकर समझ में नहीं आता।'

मैं सोच ही रही थी कि क्या करुं कि वो बोली 'जरा आंटी को फोन देना।' मैंने फोन स्पीकर पर डाल कर मम्मी को दिया। 'आंटी उसे स्कूल बैग लेकर मेरे घर भेज दिया करिए प्लीज! मैं उससे कोई ऐसी बात नहीं करुंगी, जिससे उसका डर बढ़े। मैं केवल अपना काम पूरा रखना चाहती हूं। अभी मैं साइकिल चलाने योग्य नहीं हुई हूं इसलिए मैं नहीं आ सकती।' कहते हुए उसका स्वर भीग गया। लेकिन मम्मी ने कहा, पहले स्कूल में पूछो कि अब तुम परीक्षा दे भी पाओगी? उसके पूछने पर शिक्षिका ने बताया कि उसकी अटेंडेंस शार्ट हो चुकी हैं। मैंने सुना तो बड़ा धक्का लगा। तो क्या मीता स्पेस इंजीनियर नहीं बन पाएगी?

उन लड़कों ने उसके सारे सपने भी नोच कर फेंक दिये? मेरी वजह से मोल लिया था उसने ये दर्द! और मम्मी मुझे ही उसके पास जाने नहीं देती? मैं अक्सर रोती। आज समझ सकती हूं कि समय ने उसे कितना समझदार बना दिया था। वो जानती थी कि मम्मी नहीं चाहती थी कि वो अपने अनुभव मेरे साथ बांट कर मुझे समय से पहले बड़ा करे या मेरे मन में डर भर दे। इसीलिए मुझे उसके पास नहीं भेजती थीं।

'हेलो, उतरना नहीं है क्या? मेरे पति ने झिंझोड़ा तो तंद्रा भंग हुई मेरी। उसके घर का पता बताकर टैक्सी की पति ने और मैं मन में अपराध बोध लिए चुपचाप बैठ गई। जैसे कोई मुजरिम कोर्ट में पेशी के लिए जा रहा हो।' वेलकम ' मीता ने उसी उल्लास के साथ दरवाजा खोलते ही अपनी बाहें फैला दीं जिस उल्लास के साथ वो कैशोर्य के दिनों में मेरा स्वागत किया करती थी। उससे लिपट कर मेरी आंखों में आंसू आ गए। बाहर बच्चों को क्रिकेट खेलते देखकर पति को हमें अकेला छोडऩे का बहाना मिल गया।

नेहपूर्ण सत्कार की उष्णता पाकर मेरे अपराधबोध का ज्वालामुखी फट पड़ा। मेरे आंसू लावे के रूप में बह चले। 'मुझे माफ कर दो मीता, मैं तुम्हारे लिए कुछ न कर सकी, मैं तुम्हारी अपराधिनी हूं।' चल पगली, मैं तो कबका भूल चुकी सब। बल्कि मैंने तो तुझे बुलाया ही इसीलिए है कि तेरे मन का ये गुबार निकल जाए। मैं चौंक पड़ी। मैं इसकी काउंसलिंग करने की सोच रही थी और ये मेरी। मुझे नाश्ता कराने और सामान्य करने के बाद उसने बोलना शुरू किया। मैंने उस घटना से बहुत कुछ सीखा। मुझे हमेशा तेरी जिंदगी देखकर बड़ा लालच आता था। मुझे लगता था कि मेरे माता-पिता मुझे प्यार नहीं करते लेकिन ऐसा नहीं था। वे अपनी पांच बेटियों के लिए वो सब करते थे जो उनकी परिभाषा के अनुसार प्यार था।

उन्होंने परवरिश का जो ढंग सीखा था उसी ढंग से पाल रहे थे हमें। शायद उसी परवरिश ने मुझे उन लड़कों की दी हुई शारीरिक और मानसिक चोटों से लड़ कर जीतने में सक्षम बनाया। जब मुझे सेवा की जरूरत पड़ी तो मुझे मम्मी से पूरी सेवा मिली। पापा ने न्याय के लिए संघर्ष में पूरा साथ दिया। तेरे परिवार की बेरुखी से मैंने सीखा कि जो आत्मकेंद्रित और डरपोक बना दे, ऐसी शिक्षा से क्या फायदा? मुझे अफसोस नहीं है कि मैं आगे पढ़ नहीं पाई। स्पेस इंजीनियर बनकर क्या करना है, जब धरती पर करने को इतना कुछ है।

तभी एक कामवाली सी दिखने वाली औरत आई और हम लोगों की बातचीत रुक गई। 'दीदी, वो इतना बोलने के बाद शरमाते हुए रुक गई। 'बोल क्या है?मीता ने उसका उत्साह बढ़ाया। वो न मेरा घरवाला परिवार-नियोजन के लिए मान गया है।' 'वेरी गुड! कल हास्पिटल चलेंगे और परसों तुम्हारे दोनों बच्चों का एडमीशन कराने। ये लो, स्कूल ये कपड़े पहन कर चलना। मीता ने अलमारी खोली और एक अच्छी सी साड़ी निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दी। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। वो मीता के पैरों पर गिर पड़ी। 'दीदी आप तो देवी हो ' 'बस बस मुझे इतना न चढ़ा।' कहकर मीता ने उसके आंसू पोंछ दिए।

उसके जाने के बाद वो फिर मेरी ओर मुखातिब हुई। दुनिया में बुराई जिस सीमा तक और जितनी मात्रा में है, अच्छाई भी उतनी ही है। मेरी जिंदगी बदली सरकारी वकील ने, जिन्होंने मेरा केस लड़ा। उन्होंने बिलकुल मुफ्त में चिकित्सा करने वाली मनोचिकित्सक को मेरे यहां भेजा। रोज-रोज उनके कुरेदने से एक दिन मैं खुल कर रो पड़ी। 'मुझे बड़ी चोट इस बात की थी कि वे लड़के हंस रहे थे। कह रहे थे कि क्या कहा था, कमजोर न समझना। उन्होंने मुझे कमजोर साबित कर दिया।' मैं सिसकियों के साथ कह रही थी।

उस दिन वो केवल मेरे सिर पर हाथ फेरती रहीं। दूसरे दिन उन्होंने पूछा, 'कभी बॉक्सिंग का मैच देखा है? मेरे हां कहने पर उन्होंने पूछा, क्या गिरने से खिलाड़ी हार जाता है? मैं बोली, 'नहीं रैफरी गिनती गिनता है। अगर वो गिरा रह गया तो हार जाएगा' 'मतलब किसी को गिरा देने से हार नहीं होती। हार होती है तब जब वो गिरा रह जाए। तुम समझ लो कि रैफरी की गिनती शुरू हो गई है। उठो!!!! उन्होंने बड़े प्यार से, लेकिन दृढ़ स्वर में कहा कि तुम्हारी जीत मुकदमा जीतने में उतनी नहीं है, जितनी उनको ये दिखा देने में है कि वे तुम्हारी हंसी, तुम्हारा आत्मबल, तुम्हारा जुनून कुछ भी तुमसे छीनने में कामयाब नहीं रहे। ये साबित करना तुम्हारे हाथ में है कि तुम कमजोर नहीं हो। कोई तुम्हें कुचल नहीं सकता। उनकी बातों ने मेरी खोई हुई हिम्मत लौटा दी।

बस फिर तो जिंदगी उस पहाड़ी सरिता की तरह बहने लगी जो रास्ते में आने वाली हर चट्टान का मुकाबला करते हुए केवल अपने आत्मबल और निरंतरता के बल पर उन्हें चकनाचूर करके आगे बढ़ जाती है। जुझारू तो मैं थी ही, उसी दिन तय कर लिया कि उसी संस्था के साथ जुड़ूंगी, जिसने मुझे गिर कर उठना सिखाया है। हमारी संस्था स्लॅम एरियाज़ में जाकर काम करती है। पहले हम उन्हें परिवार नियोजन के लिए प्रेरित करते हैं फिर उन्हें सुविधाएं देते हैं, उनके बच्चों की देखभाल करते हैं। मैं अक्सर मेंटल हास्पिटल में भी जाती हूं उन लड़कियों के सामने एक उदाहरण बनकर, जो उस स्थिति से गुजर रही हैं, जिनसे कभी मैं गुजरी थी। सच कहती हूं, जब किसी के होंठो पर मेरे कारण मुस्कान आती है तो इतनी खुशी मिलती है, जितनी उन लोगों को सजा सुनाए जाने पर भी नहीं मिली थी। खैर छोड़ एक ही दिन में सब बताउंगी तो बोर हो जाएगी। अब खाना खा लिया जाए। तेरी पसंद की चीजें बनाई हैं मैंने। भाई साहब को बुला ले, मेरे वो भी आते होंगे।

मीता की शादी हो गई, सुन कर मेरी पलकों में खुशी के आंसू आ गए। उन्हें देखकर वो बोली, 'हां भाई शादी हो गई है मेरी भी। वो भी मेरी तरह ही दुनिया का सताया हुआ था। अत्याचार लड़कों पर भी होते हैं। बस उनके तरीके अलग होते हैं। उसे भी इसी संस्था ने जीवनदान दिया था। हम दोनों एक-दूसरे के हमसफर, हमनवां और जाने क्या क्या हैं। अगर हर पढ़ा लिखा समृद्ध व्यक्ति, जो ये सोचकर बैठा है कि वो इस समस्या को दूर करने के लिए कुछ नहीं कर सकता, एक बच्चे को भी अपराधी बनने से रोक ले, तो बहुत फर्क पड़ जाए। मीता की बात मेरे दिल की गहराइयों में उतर गई। उससे मिलकर मुझे मेरे गुनाह के प्रायश्चित का रास्ता जो समझ में आ गया था।

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