जाने बच्चों की संवेदनशीलता से कैसे निबटें

डॉ. समीर पारिख

5th June 2018

अक्सर बच्चे अपनी फरमाइश पूरी न होने पर रिएक्ट करते हैं, या आसपास के हालात से प्रभावित हो ऐसा करते हैं। बच्चों की इस तरह की संवेदनशीलता से पैरेंट के तौर पर निपटना कई बार मुश्किल हो सकता है।

 
पैरेंट के रूप में हम अक्सर अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, खान-पान और उनकी सेहत और उन्हें अनुशासित रखने को लेकर काफी चिंतित रहते हैं। लेकिन इस सबमें हम उनकी मानसिक और मनोवैज्ञानिक सेहत की अनदेखी कर जाते हैं, जिसका असर बच्चों के संपूर्ण व्यक्तित्व पर पड़ता है। बच्चों और किशोर आगे जीवन में संबंध बनाने में, पढ़ाई लिखाई के क्षेत्र में, व्यवहार करने में, अपने विचारों के प्रवाह पर और अपने भावनात्मक अनुभवों पर भी नियंत्रण नहीं रख पाते हैं। अक्सर अभिभावकों के सामने जो समस्या बच्चों की संवेदनशीलता को लेकर होती है, जो माता-पिता द्वारा बच्चों को कुछ हिदायत पर होने वाली उनकी प्रतिक्रिया से जुड़ी हो सकती है, कई बार वे अपनी किसी फरमाइश के पूरा नहीं होने पर रिएक्ट करते हैं, या फिर अपने आसपास के हालात से प्रभावित होकर ऐसा करते हैं। बच्चों की संवेदनशीलता से निपटते समय माता-पिता को कुछ बिंदुओं का ध्यान रखना चाहिए-
 
बच्चों की बात सुनें
पैरेंट के तौर पर, हम अक्सर बच्चों को हिदायत देते रहते हैं, कभी कुछ समझाते हैं और पड़ताल भी करते हैं। हमें उनकी बात सुनने पर भी ध्यान देना चाहिए, सिर्फ उस वक्त नहीं जबकि आप कुछ जानना चाहते हैं, बल्कि उस वक्त भी जब वे कुछ कहना चाहते हैं! भले ही आपको उनकी प्रतिक्रियाएं न जमें, लेकिन उन्हें खारिज न करें।
 
जजमेंटल न हों
पूर्वाग्रही या जजमेंटल होने से बचें। ऐसा करने की बजाय पैरेंट के तौर पर अपनी भूमिका और जिम्मेदारी को भी समझें। हमें अपने बच्चों से गैर-वास्तविक अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए, पैरेंटल रोल में उनकी और अपनी सीमाओं को समझें।
 
व्यवहार में रहें कन्सिस्टेंट
हमें अपने लक्ष्यों की पहचान करनी चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा व्यवहार हमेशा एक समान हो। इस तरह की स्थिरता हमारे बच्चों में भी मूल्यों को भरने में सहायक होती है। ऐसा करना खासतौर से संवेदनशील बच्चों के मामले में महत्वपूर्ण होता है।

 

पैरेंट चाइल्ड संबंध को न भूलें
पैरेेंटिंग के प्रति आपका रवैया चाहे जैसा हो, आपके बच्चे के साथ बतौर पैरेंट अपने संबंधों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। इस संबंध को दांव पर नहीं लगाना चाहिए, हमेशा ख्याल रखें कि अपने बच्चे की उपस्थिति में न तो झुंझलाएं और न ही तनाव में आएं।
 
खुद बनें उदाहरण
युवा मस्तिष्क पर कुछ भी आसानी से दर्ज होता है और वे आसपास घटने वाली घटनाओं से प्रभावित होते हैं। अगर आपका बच्चा आपको समस्याओं और संकटों से बखूबी निपटते हुए देखेगा तो वह खुद भी सीखेगा। अपने पति/पत्नी, बड़े-बूढ़ों, स्टाफ के साथ उचित व्यवहार करें ताकि बच्चे आपके उदाहरण से सीखें, मसलन, तेज-तर्रार होना या बात पर अड़े रहने वाला।
 
मौज-मस्ती करें
जी हां, पैरेंन्टिंग के दौरान अपने बच्चों के साथ मौज मस्ती करना मुमकिन है, इस दौरान आप उनसे भी सीखते हैं। उनकी गतिविधियों से जुडऩा अच्छी शुरूआत हो सकती है और आप उनको अपने से जुडऩे के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
 
पॉजिटिव और सपोर्टिव माहौल
बच्चों को स्थिरता दिलाने के लिए जरूरी है कि उनमें आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा हो। पैरेंट्स उन्हें पॉजिटिव और सपोर्टिव माहौल दिलाने में भूमिका निभा सकते हैं, खासतौर से उस स्थिति में जबकि बच्चे सेंसिटिव हों, ताकि वे आगे चलकर खुद को सुरक्षित और आत्मविश्वास से भरपूर व्यक्तित्व के रूप में विकसित कर सकें।
 
बच्चों को दें मजबूत बुनियाद
आखिरी, मगर सबसे जरूरी बात है कि पैरेंट्स  ही व्यक्ति के जीवन में बुनियाद का पत्थर होते हैं। सुनिश्चित करें कि बच्चा जरूरी मूल्य और विश्वास से भरा हो, जिन पर उसे यकीन हो। बच्चे अपने आसपास के वातावरण और अनुभवों से सीखते हैं। आगे चलकर इसी सीख को अपने जीवन पर लागू करते हैं। पैरेंट के तौर पर आपको उनका रोल मॉडल बनना चाहिए और वैसा व्यवहार करना चाहिए जैसा वे देखना चाहते हैं। लिहाजा, जब बच्चे खुद को सुरक्षित महसूस करेंगे, तभी वे इस दुनिया की चुनौती से निपटने के लिए आत्म-विश्वास से भरते हैं और अपनी संवेदनशीलता पर काबू पा सकते हैं। 
 
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