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नाचते-नाचते कहीं गुम हो गया लट्टू और आ गया बेवलेट

विजय गोयल

23rd April 2018

इस आधुनिकता के दौर में बचपन इलेक्ट्रॉनिक गेम्स की दुनिया में कैद हो गया है। पुराने खेल खेलते बच्चे आज किसी भी गली व मोहल्ले में दिखाई तक नहीं देते हैं।

नाचते-नाचते कहीं गुम हो गया लट्टू और आ गया बेवलेट

बचपन यह शब्द सुनते ही होठों पर अपने आप ही मुस्कान आ जाती है। रूठना, मनाना, शरारत, जिद पर अड़ जाना, पापा की डांट तो मम्मी का दुलार और दादा के कंधों की सवारी ये सब बचपन की पहचान होती है। और जब बात बचपन की हो तो वे खेल भी याद आ जाते हैं, जो हम खेला करते थे। कंचे, गिल्ली-डंडा, खो-खो, आइस-पाइस, पकड़म-पकड़ाई जैसे खेलों को आज भी याद करके आँखे नम-सी हो जाती है। घर से बाहर खेलने जाने के लिए मम्मी-पापा से कितनी रिकवेस्ट करनी पड़ती थी। आज जब वह सब याद आता है तो दिल भर सा जाता है। ऐसा फील होता है जैसे यह सब कल की ही बात हो। कैसे हम मिटटी में इन खेलों को खूब एन्जॉय करते थे और आज के टाइम में ये खेल ढूंढने पर भी दिखाई नहीं देते है।

ऐसा ही एक खेल था लट्टू नचाना। याद है वो लकड़ी का गोला जिस पर सीढ़ीनुमा धारियाँ बनी होती थी और उसके आगे एक नुकीली लोहे की कील होती थी। जिसमे रस्सी फसाकर ऐसे फेंका जाता था कि लट्टू उस कील की नोक पर नाचने लगता था। कभी कोई उसे हाथ पर उठाकर कलाबाजियां दिखाता तो कोई लट्टू को पापा, बाबा के पेट पर नचाकर खुश होता। तब लट्टू 25 पैसे से लेकर 2 रुपए तक में मिल जाता था। लट्टू जितना तेज नाचता था, चेहरे पर वैसे-वैसे ही मुस्कान बढ़ती थी। लेकिन आज के वक्त में तो लट्टू देखने को ही नहीं मिलता है खेलने की बात तो दूर। आज का बचपन मोबाइल और वीडिओ गेम में कैद हो गया है। अब बच्चे लट्टू की जगह बेवलेट खेलते नजर आते हैं।

 

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