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गैजेट्स की भीड़ में छिप गया आइस-पाइस

विजय गोयल

26th April 2018

पुराने समय की बात है जब शाम होते ही बच्चे अपने-अपने घरों से निकलकर गली-मोहल्ले में भागते दिखाई देते थे। एक पूरी टोली होती थी, जिसको सिर्फ लुका-छिपी खेलना होता था। लेकिन आज गलियों में सन्नाटा पसरा रहता है।

टेक्नोलॉजी के कदम जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे ही बच्चों के खेलने के तरीके भी बदल रहे हैं। अब बच्चे मैदान की बजाय मोबाइल, कंप्यूटर या टीवी पर खेलते हुए ज्यादा दिखाई देते हैं। आज के बच्चे कबड्डी, गुल्ली-डंडा, खो-खो खेलते नहीं दिखते हैं बल्कि गैजेट की दुनिया में ही रहना उन्हें पसंद आता है। सन 90 के पहले बच्चे अपने बचपन में जो खेल खेला करते थे, शायद उनका तो नाम भी इस जेनेरेशन ने नहीं सुना होगा। ऐसा ही एक खेल हुआ करता था आइस-पाइस या छुपन-छिपाई, जो कई सालों पहले किसी गलियारे में पीछे रह गया।

उस वक्त शाम होते ही मोहल्ले और गलियों के सभी बच्चों को इकट्ठा करके आइस-पाइस खेलना, सबसे बड़ी ख़ुशी होती थी। इस खेल में 5-6 या इससे भी ज्यादा बच्चे होते थे, फिर उनमें से एक बच्चा दूर जाकर 10 या 20 तक गिनती गिनता था। और काउंटिंग खत्म होने तक बाकी बच्चे छिप जाते थे। फिर शुरू होता था लुका-छिपी का असली खेल। वह बच्चा जो चोर बनता था, उसे छिपे हुए बच्चों को ढूँढ़ना होता था और जो भी बच्चा पहले दिखाई दे जाता उसके थप्पी मारकर आइस-पाइस कहा जाता। पहले पकड़ा गया बच्चा फिर इस प्रक्रिया को दोबारा दोहराता। और ऐसे ही यह खेल का सिलसिला तब तक चलता रहता, जब तक घर से बुलावा न आ जाता।

अब न वो गिनती गिनने की आवाज सुनाई देती है और न किसी को ढूढ़ लेने के बाद बच्चों का शोर मचाना सुनाई देता है। शाम होते ही अब न तो बच्चों की टोली दिखाई देती है और न ही वह छुपन-छिपाई का खेल। रह गई हैं तो सिर्फ यादें और तस्वीरें, जो हमें आज इंटरनेट पर देखने को मिल जाती हैं।

 

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