जानिए कैसे बदलता और बिगड़ता जा रहा है व्रतों का स्वरूप

गृहलक्ष्मी टीम

30th March 2017

 
 
क्या हमारे जीवन में कोई ऐसा व्रत है जब हम कह सकें कि हम एक दिन के लिए गुस्सा छोड़ देंगे, किसी की निंदा या चुगली नहीं करेंगे या फिर हम वाट्सअप-फेसबुक या मोबाइल के बिना खुद को एक दिन रखेंगे? शायद नहीं। खाना-छोडऩा आसान है मंदिर जाना, माथा टेकना आसान है इसलिए हम इतने भर को करके समझ लेते हैं कि वो नीली छतरी वाला खुश हो जायेगा और हमारा भाग्य बदल जायेगा, जबकि बात कुछ और है। आइए जानते हैं व्रत-उपवास का बिगड़ता स्वरूप ...
 
जब भी व्रत-उपवास का जिक्र उठता है तो मन में सबसे पहले खयाल आता है कि हमें खाना नहीं खाना है, फिर मंदिर जाना है पूजा-अर्चना करनी है, दान-पुण्य आदि करना है और शाम को भगवान को, पकवानों का भोग लगाना है और फिर स्वयं का पेट भरना है। यूं तो व्रत-उपवास का सीधा संबंध धर्म से व उससे जुड़ी श्रद्धा-आस्था से है। कुछ लोग अपने इष्ट को मनाने, प्रसन्न करने व मनो कामनाओं को पूर्ण करने के लिए व्रत रखते हैं तो कुछ लोग संबंधित धार्मिक परंपराओं के चलते चले आ रहे व्रतों को इसलिए रखते हैं कि यदि वह व्रत नहीं रखेंगे तो उनका भगवान उनसे नाराज हो जाएगा। कुछ ऐसे भी हैं जो स्वास्थ्य की दृष्टिï से भी व्रत रखते हैं यानी एक दिन का अन्न त्याग कर देते हैं ताकि पेट की पाचन क्रिया को सही किया जा सके।
 
व्रत-उपवास का वास्तविक अर्थ
 
बहरहाल यदि हम शब्दों की गहराई की बात करें तो 'व्रत' शब्द का अर्थ होता है दृढ़ता या किसी अच्छी चीज पर अडिगता, किसी अच्छे कार्य का प्रण करना। तथा 'उपवास' का अर्थ होता है हमसे जो ऊपर है यानी परमात्मा उसके पास वास करना। उसकी याद में ध्यान में इतना समा जाना, खो जाना कि खाने-पीने का भी होश न रहे। हम अपने तल से ऊपर उठकर उस परम के इतने निकट हो जाएं कि अपनी कोई मांग या इच्छा ही न बचे। ऐसी अवस्था को कहते हैं उपवास। परंतु हम खाना तो छोड़ देते हैं पर मन, वचन और विचारों के व्रत पर कोई ध्यान नहीं देते। हमारा व्रत मात्र एक धार्मिक क्रिया या कर्मकाण्ड बन कर रह जाता है। व्रत के एक दिन पहले ही हम तय करना शुरू कर देते हैं कि आज रात डट कर खा लो कल दिन भर तो हमें कुछ नहीं खाना है। कल मंदिर जाना है, पूजा करनी है, दान देना है पर एक बार भी यह नहीं सोचते या इस बात का प्रण करने की कोशिश नहीं करते कि कल हम कम से कम बोलेंगे, मौन रहेंगे, गुस्सा नहीं करेंगे, किसी की बुराई या चुगली इत्यादि नहीं करेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे आदि। क्या इस तरह का व्रत हम कभी हफ्ते में तो क्या साल में एक बार भी कभी लेते हैं? शायद नहीं! जबकि हमारे यहां सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी देवी-देवता के व्रत रखने का चलन है।
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
खाना छोड़ सकते हैं मोबाइल नहीं
 
हैरानी की बात तो यह है हम जिस देवी-देवता के लिए व्रत रखते हैं उस दिन अपना काम, दुकान, टीवी, मोबाइल, सोशल नेटवर्किंग साइट्स आदि किसी का त्याग नहीं करते। बस सुबह-शाम की पूजा करके मान बैठते हैं कि हो गया सब। मन पूरे दिन संसार में, संसार की रोजमर्रा की गतिविधियों में ज्यों का त्यों ही उलझा रहता है। सच तो यह है आज एक दिन का खाना छोड़ना आसान है पर बिना मोबाइल के रहना असंभव है। क्या व्रत के दिनों में हम कभी मूल्यांकन करते हैं कि जिस जिस चीज के हम गुलाम हैं, आदी हैं उनसे मुक्त होने का प्रण करेंगे?
 
कहने को व्रत पर पकवानों का सेवन
 
यह जो हम बार-बार कहते हैं कि व्रत्त में हम खाना छोड़ते हैं, भोजन का त्याग करते... क्या हम सच में खाना छोड़ते हैं शायद नहीं। सच तो यह है व्रत के दिनों में हम और दिनों से अधिक पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन करते हैं। आम दिन भले ही
हम फल-सलाद खाएं न खाएं, बादाम काजू खाएं न खाएं, जूस-नारियल पानी आदि पीएं न पीएं परंतु व्रत में जरूर खाते-पीते हैं सच तो यह है वैसे हम दिन में तीन बार भोजन करते हैं पर व्रत में दिन भर खाते हैं। 
 
भोजन का त्याग किसके लिए ?
 
नवरात्रों में तो लोग नौ-नौ दिनों के व्रत रखते हैं यानी कहने को वह नौ दिन खाना नहीं खाते परंतु नौ दिनों तक वह विशिष्ट भोजन खाते हैं। हां इनमें कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो प्रतिदिन मात्र लौंग के दो जोड़ो पर रहकर नौ दिनों तक व्रत रखते हैं। व्रत एक दिन का हो या नौ दिन का या फिर रोजों के रूप में महीने भर का, यदि हमदिन भर भोजन का त्याग करते हैं तो उस त्यागे हुए भोजन का क्या करते हैं? यानी जितने बार, जितने दिन हम खाना नहीं खाते हैं क्या उतने वक्त का खाना हम किसी जरूरतमंद को देते हैं? नहीं। हमें चाहिए कि जब भी हम व्रत के जरिए अपने अन्न का त्याग करें तो उतने दिनों का त्यागा हुआ अन्न किसी जरूरतमंद को अवश्य दें। जो कि हम नहीं करते हैं।
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
नवरात्र का व्रत स्त्री शक्ति को व उसके महत्त्व को पहचानने का व्रत है। जीवन में उसके योगदान को समझने का व्रत है। यदि हमारी आखों में स्त्री के प्रति सम्मान नहीं तो हमें ऐसे व्रतों को रखने का अधिकार नहीं। व्रत से ज्यादा हमें स्त्री व अन्न को महत्त्व देना होगा। इन दोनों के सम्मान के बिना व्रतों का विशेषतौर पर नवरात्रों के व्रतों का कोई महत्त्व नहीं है।
 
जिन पर्वों का शाब्दिक अर्थ तक हमें मालूम नहीं उनके गूण अर्थ को जानना तो और मुश्किल है। इसलिए हमें व्रतों के धार्मिक, आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अर्थों के साथ-साथ इनके व्यावहारिक पक्ष को भी समझने की जरूरत है, तभी इनको रखने व मनाने का कुछ महत्त्व है। असली व्रत वही है जिससे स्वयं का तो भला हो ही साथ ही दूसरे का, समाज व राष्ट्र का भी भला हो।
 
 
(साभार - शशिकांत 'सदैव')
 
 

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