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मुश्किलों से जीतकर वंदना अग्रवाल ने पाया आगे बढ़ने का हौसला

गृहलक्ष्मी टीम

1st May 2019

ये सभी जानते हैं कि एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को शिक्षित बनाती है, लेकिन वंदना अग्रवाल की कहानी बताती है कि वास्तव में कैसे महिलाएं शिक्षा को सिर्फ घर तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि पूरे समाज की सेवा और उत्थान के लिए उपयोगी बनाती हैं।

मुश्किलों से जीतकर वंदना अग्रवाल ने पाया आगे बढ़ने का हौसला
नारायण सेवा की निदेशक और समाज सेविका वंदना अग्रवाल के मन में समाज सेवा का ख्याल तो उस समय ही आ गया था, जब वे पढ़ाई कर रही थीं और अपनी तैयारी के लिए पुस्तकालयों में जाती थीं। उस वक्त भी वे सोचतीं कि अगर मैं आईपीएस बन गई तो गरीब बच्चों के लिए बड़ा पुस्कालय बनाउंगी ताकी उन्हें मेरी तरह परेशानी न हो। सेवा तो उन्हें करनी ही थी, मगर और वृहत रूप में।
 
लोगों के आग्रह ने किया विवश
उन दिनों वंदना अपने पति को दोपहर में लंच पहुंचाने हॉस्पिटल जाती थीं। उस वक्त डॉक्टर से मिलने जो मरीज आते थे, उनमें से कई लोग उनसे पूछा करते थे कि आप बताइए कि डॉक्टर साहब ने क्या लिखा है। जब मैं डॉक्टर साहब से पूछने जाती तो वे मुझसे कहते कि मैं ऐसे तो आपको बता दूंगा, मगर इसे पूरी तरह से समझने के लिए आपको इसे समय देना होगा। पांच-सात दिन मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन रोज़-रोज़ लोग मुझसे पूछते और जब मैं उन्हें जवाब नहीं दे पाती तो मुझे कुछ कमी सी लगने लगी। मैं भीअसंतुष्ट महसूस करती थी कि कोई मुझसे कुछ पूछ रहा है और मैं उसका जवाब नहीं दे पा रही हूं। बस फिर क्या था, उन्होंने प्रशिक्षण लिया और सिर्फ मरीजों की परेशानियों को ही नहीं दूर किया, बल्कि पूरे हॉस्पिटल को संभालने लगी।
 
सफलता ने दिए हौसले
हॉस्पिटल में लोगों की दिक्कत, परेशानियां सुनते-सुनते वंदना ने महसूस किया कि हर कोई सिर्फ शरीर की पीड़ा से ग्रस्त नहीं है। उनके मन ज्यादा उलझे हुए हैं। उन्होंने धीरे-धीरे लोगों के रोज़गार के लिए काम किया और तरह-तरह के प्रशिक्षण शुरू करवाए। फिर ट्राइबल बेल्ट में बच्चों की शिक्षा के लिए काम करना शुरू किया। गांव की औरतों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा किए। जरूरतमंद परिवारों को उनकी जरूरत के अनुसार काम करना सिखाया।
 
सेवा का प्रताप देता है प्रेरणा
अपने स्ट्रगल के बारे में बात करते हुए वंदना कहती हैं कि मैंने एक बार जानलेवा हमला झेला है ́। एक बार ब्रेस्ट में गांठ थी। फिर शाम को वॉक करते हुए किसी ने मुझ पर हमला किया था और डॉक्टर्स ने कहा कि मुझे रिकवर होने के लिए कई दिन लगेंगे, लेकिन इनके बाद मैं मात्र पंद्रह दिनों में उठ कर खड़ी हो गई। मुझे लगता है कि अगर भगवान ने मुझे ठीक किया है तो उसका कोई न कोई उद्देश्य जरूर है। मैंने जि़ंदगी को जीत लिया है और अब मैं पीछे पलटने वाली नहीं हूं।
 
लक्ष्य के लिए जिद्दी बनें
वंदना कहती हैं, 'लेडिज़ को जिद्दी होना चाहिए। ये बात मेरे ससुर मुझे हमेशा कहा करते थे और मैं भी चाहती हूं कि सभी औरतें ये लाइन हमेशा याद रखें, वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हो ́, नाविक की धैर्य परीक्षा क्या, यदि धाराएं प्रतिकूल न हों। हर औरत में शक्ति है, लेकिन उसने खुद को पहचाना नहीं है। मैं चाहती हूं कि वह अपनी ताकत को समझे, इसलिए नहीं कि उसे किसी को दबाना है, बल्कि इसलिए कि कोई उसे दबा न सके।
 
 
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