GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

बोझिल पलकें, भाग-22

रानू

5th June 2019

एक अपराधी की जिंदगी जीने को मजबूर अजय के साथ समय हर कदम पर एक नई चुनौती रख रहा था। नाउम्मीदी से भरी इस जिंदगी में अंशु उसकी एकमात्र उम्मीद थी, लेकिन क्या आज ये उम्मीद भी कोई मोड़ लेने वाली थी?

बोझिल पलकें, भाग-22

अजय जानता था कि अब कम्मो कार अधिक तेज नहीं चला रही होगी। पुलिस उसे नहीं पकड़ सकती, क्योंकि उसके पास से अब कोई भी गलत वस्तु नहीं बरामद हो सकती थी। अजय ने सोचा सूटकेस पुलिस के हाथ लग गया तो वही पकड़ा जाएगा और यदि उसने जबान खोल दी तो गोवा में जॉर्ज पकड़ा जा सकता है, परंतु चन्दानी कभी नहीं पकड़ा जाएगा। इसके विपरीत चन्दानी उसके पिता को चीतों के आगे छोड़ देगा। यदि यह सूटकेस चन्दानी के पास वापस पहुंच गया तो उसकी कोई हानि नहीं होगी। गोवा जाने का काम भी बाद में हो जाएगा।

पुलिस की कार झाड़ी के समीप से बहुत तेजी के साथ निकली और आगे बढ़ गई। अजय ने चैन की सांस ली। वह खड़ा हो गया, परंतु तभी वह चौंक गया। पीछे पुलिस की एक जीप चली आ रही थी शायद पुलिस की दृष्टि उस पर पड़ चुकी थी। अजय ने रिस्क लेना उचित नहीं समझा। वह तुरंत सड़क के पीछे की ओर गई चढ़ाई पर तेजी के साथ भागा। पुलिस ने जीप के रुकते-रुकते गोली चलाकर उसे रुकने का संकेत भी दिया, परंतु अजय अपने जीते जी अपनी पहचान किसी भी अवस्था में देने को तैयार नहीं था। अपने से अधिक उसे अंशु का विचार था। यदि अपराधी के रूप में उसकी तस्वीर किसी अखबार में छप गई तो अंशु क्या सोचेगी? उसकी इज्जत बचाने वाला देश का डाकू निकला!

उसके भागते पगों की गति और तेज हो गई। उसने अपने पीछे जीप के पहियों के रुकने की चीख सुनी, परंतु वह भागता ही गया, ऊबड़-खाबड़ चट्टानों को फलांगते तथा गिरते-पड़ते। उसने पलटकर देखा, पुलिस उससे बहुत दूर उसका पीछा कर रही थी। उसने साहस नहीं छोड़ा। एक छोटी चट्टान की ढलान पर उतरने के बाद जब पुलिस उसकी दृष्टि से दूर हो गई तो अजय ने एक झाड़ी के समीप अपना सूटकेस नीचे रखा। तुरंत चश्मा तथा गले की माला उतारकर झाड़ी के मध्य फेंक दी। दाढ़ी, मूंछ तथा विग भी उतारकर फेंक दी। कोट उतारा और पलटकर पहन लिया। अब वह अपने असली रूप में आ चुका था, काली पैंट, परंतु कोट अब सफेद था। पुलिस को अब उसकी नहीं, उस हिप्पी की तलाश थी, जिसे उसने देखा था। फिर भी अजय ने बहुत स्फूर्ति के साथ चौकड़ियां भरते हुए ऊबड़-खाबड़ चट्टानें कुछ दूर तक और पार कीं और फिर एक ढलान के बाद उसे नीचे एक सड़क मिल गई। वह किसी भी आते-जाते ट्रक से निकल जाना चाहता था।

सहसा अजय चौंक गया। सड़क के किनारे एक विदेशी कार खड़ी हुई थी, बिल्कुल सफेद। कार का बोनट खुला हुआ था, परंतु इस समय वहां कोई भी नहीं था। अजय कार के समीप पहुंचा। उसने कार का नंबर पढ़ा तो आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। कार राय साहब की ही थी। अजय ने इधर-उधर देखा, कहीं राय साहब ही न यात्रा पर निकले हों, परंतु तभी सड़क के दूसरी ओर की लान चढ़ती हुई अंशु चली आ रही थी। उसके हाथ में टिन का एक डिब्बा था। अजय का दिल खुशी से उछल गया।

वह कई बार पुलिस को चकमा देने में सफल हुआ था। आज भी उसके भाग्य ने उसका साथ दिया। उसने तुरंत पीछे की सीट के नीचे कालीन पर अपना सूटकेस फेंक दिया। फिर बोनट के पास चला आया। अंशु ने उसे देखा तो चौंक पड़ी। उसके हाथ से टिन का डिब्बा छूटते-छूटते बचा। उसके लिए दिल की प्रसन्नता छिपाना कठिन हो गया। वह मुस्करा पड़ी, चहककर, कुछ इस प्रकार कि उसके दांतों की लड़ियां धूप में मोती समान चमक उठीं। अजय को ऐसा लगा मानो उसके जीवन में नई सुबह की चमकती हुई किरण प्रविष्ट हो चुकी है। उसने भी मुस्कराकर अंशु का स्वागत किया।

‘आप!' अंशु ने उसे देखकर आश्चर्य तथा प्रसन्नता प्रकट की। बोली, ‘आप यहां कैसे?'

‘जी मैं...मैं...' अजय ने तुरंत बुद्धि से काम लेते हुए बात बनाई। बोला, ‘टैक्सी न मिलने के कारण मैं ट्रक पर ही इधर से जा रहा था कि अचानक आपको ढलान पर उतरता देखकर चौंक गया। सोचा, कोई और होगा, परंतु जैसे ही आपकी कार देखी तो विश्वास हो गया। बस, इसीलिए ट्रक से उतर गया। सोचा, आपसे लिफ्ट मांग लूंगा मिल गई तो ठीक है, वरना ट्रक तो और भी मिल जाएंगे।'

‘वैलकम, वैलकम-' अंशु ने अपने दिल का प्यार छिपाते हुए हर्ष प्रकट किया। बोली, ‘दरअसल, मैं पानी लेने के लिए ढलान से उतरी थी।' अंशु ने बोनट का ढक्कन खोलना चाहा, परंतु तभी अजय ने उसकी सहायता कर दी। पानी भी उसने खुद ही बोनट में भर दिया। ढक्कन बंद करने के बाद बोनट गिरा दिया। तभी अंशु स्टेयरिंग पर बैठ गई। अजय भी उसकी बगल में बैठ गया। तभी अजय ने देखा, पुलिस इंस्पेक्टर एक कांस्टेबल के साथ उसकी ओर चला आ रहा था।

जारी...

 

ये भी पढ़ें-

झूठे रिश्ते का नरक

सब्जी का ठेला

क्योंकि सास भी कभी बहू थी

आप  हमें  फेसबुक,  ट्विटर,  गूगल प्लस  और  यू ट्यूब  चैनल पर भी फॉलो कर सकती हैं।