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बोझिल पलकें, भाग-24

रानू

6th June 2019

सच को सबूत की जरूरत नहीं होती और आज अंशु भी बिना कहे अजय की सारी सच्चाई के करीब पहुंच चुकी थी। ऐसे में अजय की खुद्दारी और सच्चाई ने उसे मजबूर कर दिया कि वह भी अपने प्यार के आगे कुछ भी न छिपाए। फिर क्या परिणाम रहा इस सच्चाई का?

बोझिल पलकें, भाग-24

उसने अंशु को अपने जीवन की एक-एक बात बताई, जो कुछ भी उसे याद था, वह कैसे इस धंधे में फंस गया और जब पिछले दिनों साहस करके उसने इस धंधे को छोड़ा तो किस प्रकार चन्दानी ने उसके पिता को बंदी बना लिया और अब उसे अपने पिता के जीवन की सुरक्षा के लिए यह अपराध करना पड़ रहा है। अजय ने अंशु को अपने अपराध से संबंधित सारी ही बातें बताईं, परंतु अंशु के प्रति अपने प्यार को वह छिपा गया। एक अपराधी होकर वह अंशु पर कैसे अपना प्यार प्रकट भी करता? अंशु की उसने इज्जत बचाई थी, इसलिए वह उसकी एहसानमंद है। अंशु के दिल में उसके प्रति सहानुभूति हो सकती है, परंतु प्यार नहीं। प्यार तो वह विशाल से करती है, जब ही तो उसके नाम पर वह उस दिन होटल चली गई थी।

अंशु चुपचाप कार चलाती हुई उसके जीवन को सुनती रही। अजय ने अंत में कहा, ‘परंतु अब, जब मेरी वास्तविकता आप पर प्रकट हो ही चुकी है तो मेरे लिए अपने आपको कानून के हवाले कर देना ही उचित है। चन्दानी मेरे पिता को चीतों के आगे डालता है तो डाल दे, उन्हें उनके कर्मों का दंड मिल जाएगा, मुझे मेरे कर्मों का दंड।' अजय के स्वर में दृढ़-निश्चय था।

अंशु सोच रही थी, अजय क्यों अपने पिता की चिंता न करते हुए अब अपने-आपको पुलिस के हवाले कर देना चाहता है? क्यों, क्या केवल इसीलिए कि अजय का भेद उसके आगे खुल चुका है? क्यों अजय अचानक ही इस प्रकार बदल गया है कि अब उसे अपनी भी चिंता नहीं? क्या यह सब उसी के कारण हो रहा है? शायद हां। अजय की वास्तविकता से केवल वही तो एक लड़की है, जो परिचित हुई है अभी-अभी ही तो अजय ने उसे अपने जीवन की सारी बातें बताई हैं और अभी-अभी ही तो अजय ने अपने-आपको कानून के हवाले करने का निर्णय लिया है, वरना इससे पहले तो उसका ऐसा विचार जरा भी नहीं था कि अपने पिता के जीवन की चिंता छोड़ दे।

अंशु का दिल धड़क उठा। क्या अजय भी उसे प्यार करता है? ट्रेन की यात्रा में वह उससे बातें करने के लिए कितना इच्छुक था। स्टेशन के बाहर भी अजय उसे कितनी हसरत भरी दृष्टि से देख रहा था। उसका मन हुआ, वह अजय से पूछे कि क्या उस रेलयात्रा के बाद उसने उसे कभी याद किया था क्या उसकी इज्जत बचाने के बाद उसने उसके बारे में कभी नहीं सोचा? परंतु अंशु का साहस नहीं हो सका। इसके अतिरिक्त यह अवसर इन बातों को पूछने का नहीं था।

उसके आंसू अजय की कहानी सुनते-सुनते स्वयं ही हवा के कारण सूख गए थे। फिर भी उसने अपनी उंगलियों द्वारा अपनी पलकों के कोने साफ किए। फिर बोली, ‘आपका अपने-आपको पुलिस के हवाले करना अपने पिता के साथ उन तमाम लोगों पर भी अत्याचार करना होगा, जो चन्दानी का गैंग छोड़कर एक अच्छा जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। आप उसके अड्डे का पता चलाइए। इस बारे में आप मेरे डैडी से मिल लें तो अच्छा होगा। वह पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी द्वारा आपकी पूरी सहायता करेंगे।'

अजय ने सोचा, इस समय तो निश्चय ही चन्दानी का कोई व्यक्ति उसका पीछा नहीं कर रहा है। चन्दानी के विचार में वह इस समय गोवा जा रहा है। उसने राय साहब से मिलना स्वीकार कर लिया।

शाम चार बजे थे। अंशु उसे लेकर अपने डैडी की फैक्ट्री पहुंची। अंशु फैक्ट्री में जिधर से भी निकली, उसे देखकर मील के सभी कर्मचारी खड़े हो गए, मजदूर उसे झुक-झुक कर सलाम करने लगे। अंशु अपने डैडी के दफ्तर में पहुंची। राय साहब एक एग्जीक्यूटिव कुर्सी पर बैठे, आगे को झुके अपने सामने मेज पर रखे कागजात पर हस्ताक्षर कर रहे थे। समीप ही एक क्लर्क खड़ा झुककर उनके हस्ताक्षर के लिए बार-बार कागज पलटता जा रहा था। वह अंशु को देखते ही चौंक गए। उन्होंने कागज छोड़ते हुए कहा, ‘अरे! अंशु बेटी, तुम यहां कैसे आईं?' उन्होंने अजय को भी देखा। अजय ने उन्हें हाथ जोड़कर नमस्ते की

‘डैडी,' अंशु ने उनके समीप वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहना चाहा, परंतु फिर वह झिझककर रुक गई। उसने क्लर्क को देखा। उसे अपने डैडी से एकांत में बात करने की आवश्यकता थी।

राय साहब ने अपनी बेटी के संकोच का कारण समझा तो ऐश-ट्रे से सिगार उठाया और कुर्सी पर पीछे पीठ टेकते हुए क्लर्क से कहा, ‘मैं आपको बुला लूंगा।'

‘जी सर।' क्लर्क ने कहा और चला गया।

‘डैडी, यह...' अंशु ने कहना चाहा, परंतु फिर चौंककर रुक गई। उसने आश्चर्य से अजय को देखा। बोली, ‘अरे आपका नाम पूछना तो मैं भूल ही गई।'

‘अजय।' अजय ने खड़े-खड़े उत्तर दिया।

‘डैडी,' अंशु फिर अपने डैडी से संबोधित हुई होते हुए बोली, ‘यह अजय बाबू हैं।' अजय ने फिर राय साहब को हाथ जोड़कर नमस्ते कर दी। अंशु ने बात जारी रखी। बोली, ‘इन्होंने ही उस दिन रंधीर के हाथों से मुझे बचाया था।'

‘ओह...' राय साहब ने अपने सिर को ऊपर-नीचे करके हिलाया। उन्होंने अंशु के बगल वाली कुर्सी की ओर इशारा करते हुए अजय से कहा, ‘बैठिए-बैठिए, खड़े क्यों हैं?'

‘धन्यवाद।' अजय ने कहा और कुर्सी पर बैठ गया।

राय साहब ने कहा, ‘हम आपके अत्यंत आभारी हैं। हमारे योग्य कोई सेवा हो तो कहने में कभी संकोच नहीं कीजिएगा।'

‘मुझे वास्तव में आपकी बहुत बड़ी सहायता की आवश्यकता है।' अजय ने मानो निवेदन किया।

‘गो ऑन माई चाइल्ड। संकोच करने की जरा भी आवश्यकता नहीं है।' राय साहब उसकी कठिनाई को सुनने के लिए ध्यानपूर्वक बैठ गए।

और अजय ने एक बार उन्हें भी अपनी बीती कह सुनाई, वे सारी ही बातें जो उसने अंशु को बताई थीं।

जारी...

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