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बोझिल पलकें, भाग-25

रानू

7th June 2019

जिस पिता के जीवन को बचाने के लिए अजय ने अपनी जान तक की परवाह नहीं की, आज उसी मोड़ पर उसके सामने एक ऐसा रास्ता खुल रहा था, जहां से उसे अपने पिता की रिहाई और चन्दानी के अपराधों का भंडाफोड एक साथ नजर आ रहा था। क्या था वह रास्ता?

बोझिल पलकें, भाग-25

राय साहब बहुत ध्यान से अजय की बातें सुनते रहे। फिर कुछ देर बाद सिगार का एक कश लिया और धुआं छोड़कर बोले, ‘हूं...'

उन्होंने घटना की गहराई को समझ लिया था। चन्दानी तथा उसके बेटे को वह किसी अन्य अपराध के बहाने सजा दिलाने के पक्ष में पहले ही थे। उन्होंने तुरंत डी.आई.जी. को फोन किया और तुरंत ही उनसे आने का निवेदन किया।

डी.आई.जी. सारी घटना सुनकर कुछ देर मौन रहे। फिर बोले, ‘चन्दानी पर हमें पहले ही संदेह है। पिछले दिनों जो अपराधी पकड़े गए, उनमें से कुछ का कहना है कि उनके अपराध के पीछे चन्दानी का ही हाथ है, परंतु किसी के कह देने से ही उसे गिरफ्तार करके हमें कोई लाभ नहीं हो सकता। हमें उस पर अपराध सिद्ध करना होगा और अपराध सिद्ध करने के लिए हमें कोई ठोस सबूत चाहिए। इसके लिए हमने उसके पीछे अपने आदमी लगाए, परंतु पता चला कि चन्दानी बंबई में जिनके बंगले में जाता है, वे सब शहर के आदरणीय नागरिक हैं। उसके अपने बंगले में तो नेताओं का भी आना-जाना है। हमें सबसे पहले चन्दानी के अड्डे का पता लगाना है। इसके अतिरिक्त हम केवल चन्दानी को ही नहीं, उसके पूरे गैंग को पकड़ना चाहेंगे, वरना यह अपराध इसी प्रकार जारी रहेगा। हम इस गैंग को जड़ से समाप्त करना चाहते हैं।'

अजय ने एक पल सोचा। चन्दानी के अड्डे का पता चलाना आसान बात नहीं। फिर भी प्रयत्न करने में क्या हर्ज है? अंशु के आगे अपनी वास्तविकता खुल जाने के बाद जब वह अपने पिता के जीवन की चिंता न करते हुए जेल जाने को तैयार हो सकता है तो फिर क्यों न अपना जीवन खतरे में डालकर वह चन्दानी के गैंग को पकड़वाने का प्रयत्न करे?

उसने कहा, ‘डी.आई.जी. साहब, यदि आप मेरी सहायता करें तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि अपने जीवन की परवाह न करते हुए भी मैं शीघ्र ही चन्दानी के अड्डे का पता लगा लूंगा।'

अंशु का दिल धड़क गया। भगवान न करे! अजय को अपने जीवन की परवाह न हो, पर उसे तो है। उसने अजय को देखा। अजय डी.आई.जी. के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था।

‘पुलिस आपकी पूरी सहायता करेगी। इस बात का मैं आपको विश्वास दिलाता हूं।' डी.आई.जी. ने कहा।

कुछ और आवश्यक बातें करने के बाद जब अजय फैक्ट्री के बाहर निकला तो शाम डूब चुकी थी। फैक्ट्री के ड्राइवर ने कार द्वारा उसके इशारे पर उसे एक मोड़ पर छोड़ दिया। फैक्ट्री की कार को अपने घर तक ले जाना बुद्धिमानी नहीं थी।

सने एक टैक्सी ली और अपने घर पहुंचा। घर के पास दो व्यक्ति बहुत भेद भरी अवस्था में खड़े उसे देख रहे थे।

शायद कम्मो ने चन्दानी के बंगले पर फोन करके आज की असफल घटना बता दी थी।

जब टैक्सी अजय के घर के पास रुकी तो उसने टैक्सी वाले को पैसे अदा किए और फिर अपना सूटकेस उठाकर लापरवाही बरतते हुए अपने घर की ओर बढ़ गया।

घर के अंदर जाकर उसने एक खिड़की की दरार द्वारा देखा, वे दोनों व्यक्ति उसी टैक्सी में बैठकर जा रहे थे, जिससे वह आया था। अजय ने संतोष की सांस ली। यदि वे व्यक्ति उस टैक्सी वाले से पूछेंगे कि वह उसे कहां से लाया था तो वह नहीं बता सकेगा कि उसने उसे राय साहब की फैक्ट्री के सामने से बिठाया था।

अजय आरामकुर्सी पर बैठा सिगरेट फूंकता हुआ आज की घटना पर ध्यान दे रहा था कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

पंद्रह मिनट भी नहीं बीते कि फोन की घंटी बजी। अजय को इसी की प्रतीक्षा थी। उसने फोन रिसीव किया। फोन चन्दानी का था। पहले जैसा ढंग अपनाकर उसे चन्दानी के सामने सूटकेस सहित उपस्थित होने की आज्ञा मिली।

चन्दानी के सामने अजय ने अपनी असफलता पर खेद प्रकट किया, परंतु यह नहीं बताया कि वह किस प्रकार पुलिस से बच निकलने में सफल हो गया।

चन्दानी ने भी पूछना आवश्यक नहीं समझा। उसे अजय से अधिक सूटकेस की चिंता थी। यदि सूटकेस हाथ से निकल जाता तो उसे एक बहुत बड़ी हानि का सामना करना पड़ता। सूटकेस के अंदर जो मूर्ति थी, उसका मूल्य उसने दस लाख रुपये लगाया था।

फिर भी उसके मुखड़े पर प्रसन्नता की लकीरें नहीं आईं। उसका मुखड़ा गंभीर था। आंखों में संदेह था। अजय ने इससे पहले कठिन से कठिन काम में सफलता अवश्य प्राप्त की है, परंतु यह पहला अवसर है, जब वह सफल नहीं हो सका। आखिर क्यों? परंतु चन्दानी को इसका उत्तर नहीं मिल सका 

फिर भी उसने तय कर लिया कि वह अजय की ओर से और सावधानी बरतेगा यदि अजय उसे धोखा नहीं दे तो इस गैंग का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति सिद्ध हो सकता है उन व्यक्तियों में, जो अजय जैसा काम करते हैं, माल ले जाना और माल ले आना। उसके अड्डे का पता तो उसके केवल गिने-चुने लोग ही जानते थे।

अजय चन्दानी की आज्ञा लेकर दो व्यक्तियों की सुरक्षा में अपने पिता से फिर मिला। दीवानचंद का वही घुटा-घुटा वातावरण, आंखों में आंसू।

अजय ने आज फिर महसूस किया, वे कुछ कहना चाहते हैं, परंतु उनके होंठों पर दो व्यक्तियों की उपस्थिति ने मानो ताला लगा रखा था। चन्दानी ने दीवानचंद को सभी आराम दे रखा था, परंतु जिसके पास स्वतंत्रता न हो, वह इन वस्तुओं को लेकर क्या करेगा? सोने के पिंजरे का बंद पक्षी भी सदा उड़ जाने को ही फड़फड़ाता रहता है।

जारी...

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