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बोझिल पलकें, भाग-26

रानू

8th June 2019

बदले हालात के साथ जहां चन्दानी की नजरों का घेरा अजय पर तंग होता जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ अजय और अंशु के छिपे हुए दिली जज़्बात भी बदल रहे थे। अजय समझ नहीं पा रहा था कि क्या अब भी किस्मत कहीं उस पर रहम कर रही है या खिलवाड़। क्या छिपा था अजय की जिंदगी के अगले मोड़ पर?

बोझिल पलकें, भाग-26

कुछेक दिन बीत गए। इस बीच अजय जहां भी गया, उसने महसूस किया कि उस पर नज़र रखी जा रही है। उसकी एक-एक बात पर ध्यान दिया जा रहा है।

अजय को अधिक आश्चर्य नहीं हुआ। दीवानचंद चन्दानी की कैद में हैं। अजय अपने जीवन में चन्दानी का काम करते हुए पहली बार असफल हुआ था और वह भी अपने पिता के बंदी बनने के बाद, इसलिए चन्दानी का उस पर संदेह करना स्वाभाविक था।

अजय ने भी हर पग बहुत फूंक-फूंककर उठाना आरंभ कर दिया। पहले भी वह कम सावधान नहीं था।

सावधानी बरतकर वह डी.आई.जी. से केवल फोन पर ही बात करता, अपनी आवश्यकताएं बताता, उनकी सलाह लेता।

वह जब भी किसी पुलिस कर्मचारी से भेंट करता तो केवल थोड़े समय के लिए ही और वह भी होटलों की लिफ्ट में, किसी मंजिल से किसी मंजिल तक जाते हुए। लिफ्ट में उसे अपनी आवश्यकता की वस्तुएं मिल जाती थीं। तब पुलिस कर्मचारी भी शहरी वेशभूषा में ही होता था।

इस बीच कई बार अजय की इच्छा हुई कि वह अंशु को फोन करे, उससे बातें करे, उसके कलियों जैसे होंठों से टपकता शहद समान रस कानों द्वारा अपने दिल की गहराई में उतार ले 

उसने टेलीफोन निर्देशिका में राय साहब का निवास स्थान देखकर टेलीफोन मिलाया भी उधर से किसी पुरुष का स्वर सुनाई भी पड़ा उसने अंशु को टेलीफोन पर बुलाकर बात भी करनी चाही, परंतु फिर उसने साहस छोड़कर फोन काट दिया।

अंशु से वह क्या बात कर सकता था। अपने दिल का हाल कैसे प्रकट कर सकता था अंशु का भविष्य तो विशाल के लिए सुरक्षित है। वह विशाल को प्यार करती है और विशाल का उसकी सुंदरता पर रीझना स्वाभाविक है, परंतु एक बार जब उसे स्वयं ही अंशु का फोन सुबह दस बजे के करीब मिला तो वह विश्वास नहीं कर सका।

‘हैलो।' फोन उठाकर उसने कहा।

‘अजय बाबू?' स्वर अंशु का था, मीठा, शहद समान।

‘हां।' उसने अंशु का स्वर तुरंत पहचान लिया था।

दिल के अंदर मिठास समा गई थी।

‘मैं अंशु बोल रही हूं।'

अजय ने उसे नमस्ते कहना चाहा, परंतु तभी ठिठक गया। उसने कहा, ‘अंशु? कौन अंशु? रांग नंबर।'

अजय ने तुरंत फोन काट दिया।

उसने दोबारा फोन मिलाया, राय साहब के नंबर पर। फोन अंशु ने ही उठाया, वही स्वर, वही मिठास।

अजय ने कहा, ‘अंशु जी?'

‘हां।'

‘मैं अजय बोल रहा हूं।' अजय ने कहा। फिर पूछा, ‘अभी-अभी आप ही ने मुझे फोन किया था?'

‘हां।' अंशु ने कहा, ‘और आपने...'

‘मैंने जान-बूझकर ऐसा कहा था।' अजय ने उसकी गलतफहमी दूर करनी चाही।

‘जान-बूझकर!' अंशु कुछ समझी नहीं।

‘जी हां।' अजय ने कहा, ‘मैंने सोचा, कहीं आपके स्वर में तथा नाम का बहाना लेकर चन्दानी मेरा भेद तो नहीं ले रहा है?'

‘ओ...' अंशु चहक पड़ी। बोली, ‘आप आवश्यकता से अधिक सावधानी बरत रहे हैं।'

‘क्या करूं? मजबूरी है।'

‘मजबूरी नहीं, बुद्धिमानी है।'

‘धन्यवाद।' अजय ने कहा, ‘आप मुझे जब भी फोन करेंगी, ऐसा ही उत्तर मिलेगा। मैं तो आपसे केवल उसी समय बात कर सकता हूं, जब मैं स्वयं आपको रिंग करूंगा। मेरे फोन काटने पर आपने बुरा तो नहीं मान लिया था?'

‘जी नहीं, परंतु दिल को...चोट अवश्य पहुंची थी।'

‘आई एम सॉरी।' अजय के दिल को चोट पहुंची।

उसके दिल में केवल अंशु के प्रति ही धड़कनें थीं, इसलिए चोट पहुंचना स्वाभाविक था।

‘इट इज ओ.के.।' अंशु ने कहा, ‘ब तो बात साफ हो चुकी है न?'

‘धन्यवाद।' अजय को मानो क्षमा मिल गई थी।

खामोशी। दोनों ही रिसीवर को कान से सटाए खामोशी के साथ मानो एक-दूसरे की सांसों का स्वर सुन रहे थे।

अजय को यह खामोशी तोड़नी पड़ी। उसने पूछा, ‘आपने मुझे किसी काम से फोन किया था?'

‘जी नहीं, जी हां, जी नहीं...' अंशु बौखला गई।

अजय ने इस बौखलाहट को महसूस करके उसके दिल का चोर पकड़ना चाहा।

प्यार की आग क्या उस ओर भी लगी हुई है? क्या अंशु विशाल का विचार छोड़कर उसमें रुचि ले रही है? क्या ऐसा संभव है?

अंशु अपनी बौखलाहट पर काबू करके कह रही थी, दरअसल मैं...यह जानना चाहती थी कि आप अपने इरादे में कहां तक सफल हुए?'

अजय के दिल में उठता विचारों का तूफान शांत हो गया।

उसने गंभीर स्वर में कहा, ‘हम अपने इरादे में काफी सीमा तक सफल हो चुके हैं।'

‘ईश्वर आपकी रक्षा करे!' अंशु ने दिल की गहराई से कहा।

‘धन्यवाद।'

फिर वही खामोशी।

इस खामोशी ने दोनों के दिल की धड़कनों को एक-दूसरे के समीप लाने में बहुत सहायता दी। दोनों ही एक-दूसरे से कुछ कहने के लिए शब्द ढूंढ़ रहे थे दोनों के ही कान एक-दूसरे का स्वर सुनने को तरस रहे थे।

कुछ देर इसी प्रकार बीत गई तो अजय ने कहा, ‘अंशु जी...'

‘जी?' स्वर प्यार में डूबा हुआ था।

‘और तो कोई काम नहीं है?' अजय ने न चाहते हुए भी पूछा।

अंशु उसकी खामोशी में क्यों सम्मिलित है, वह पूर्णतया जान नहीं सका जान सका तो विश्वास नहीं कर सका। अंशु विशाल को छोड़कर एक अपराधी का विचार अपने दिल में बसाए, यह कैसे संभव हो सकता है?

‘जी नहीं और कोई काम नहीं। बस यही पूछना था, जिसका उत्तर आपने दे दिया।' अंशु ने भी मानो न चाहते हुए कहा।

एक लड़की होकर प्यार में वह कैसे पहल कर सकती थी? उसका नारीत्व उसे नहीं धिक्कार उठता!

‘अच्छा, बाई-बाई!'

‘बाई!' अंशु का स्वर मानो बहुत दूर से लहरा गया।

फोन कट गया तो अजय ने भी अपना रिसीवर रख दिया और फिर सिगरेट जलाकर कश छोड़ते हुए वह अंशु के विचारों में खो गया।

जारी...

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