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अध्यात्म से संवारें गर्भ से ही बच्चे का व्यक्तित्व

अनामिका जैन (एस्ट्रोलॉजर)

10th June 2019

हर मांबाप का यह सपना होता है कि उनकी आने वाली संतान स्वस्थ, प्रभावशाली होने के साथ ही जीवन में सफल रहे। इस सपने को साकार करने के लिए मां-बाप हमेशा प्रयत्न करते रहते हैं। संतान आने वाली वंश की परंपरा को आगे बढ़ाती है।

अध्यात्म से संवारें गर्भ से ही बच्चे का व्यक्तित्व

उस परिवार, समाज और देश का भविष्य कैसा होगा, यह आने वाली पीढ़ी पर ही निर्भर करता है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि मां-बाप इस तरफ ध्यान दें और ऐसे कदम उठाएं, जो यह सुनिश्चित करें कि आने वाली संतान अपने जीवन में सफल और संतुलित हो।

क्या है पुंसवन संस्कार

हिंदू धर्म और दर्शनशास्त्र में कर्म की बहुत महत्ता है और कर्म पर ही जीवन आधारित है हमारी ऐसी मान्यता है कि हम अपने कर्म से आने वाले समय को बेहतर कर सकते हैं। हिंदू धर्म में 16 संस्कारों के बारे में कहा गया है। इसमें दूसरे स्थान पर पुंसवन संस्कार होता है। इस संस्कार के अंतर्गत गर्भवती स्त्री के गर्भ की रक्षा और शिशु की लंबी आयु की कामना की जाती है। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास शुरू हो जाता है। वेद मंत्रों, संस्कार सूत्रों और शुद्ध वातावरण की प्रेरणा से शिशु के मन पर श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता है।

कहानियों में मिलता है प्रमाण

हम सभी अभिमन्यु की कहानी से परिचित हैं कि कैसे उन्होंने गर्भ से ही अपने पिता द्वारा बताए गए ज्ञान को प्राप्त किया था। भक्त प्रहलाद की कहानी से भी हम परिचित हैं कि कैसे नारद मुनि ने विष्णु भक्ति की बातें उनकी मां को बताईं और उन्होंने जन्म लेने के बाद भी वे बातें याद रखीं और कैसे भगवान ने उनकी रक्षा करने के लिए नरसिंह रूप में अवतार लिया था।

विचार हों संतुलित

अच्छे शिशु के संस्कार का मार्ग भी मां से होकर ही गुजरता है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि मां अपने महत्त्व को जाने और उसके आस-पास के लोग भी इस बात का ध्यान रखें कि गर्भवती को कोई भी बात कष्ट न पहुंचाए और गर्भवती भी अपने आचार-विचार को अच्छा और संतुलित रखें, जिससे कि वह एक अच्छी संतान को जन्म दे। मां का आचार-विचार और व्यवहार अच्छा होना चाहिए। गर्भवती के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह अच्छा साहित्य पढ़े और खून-खराबे वाली चीजों को ना देखें और ना ही विचार करें। नहीं तो उसका प्रभाव भी बच्चे पर पड़ेगा। वह बच्चे के कोमल मन पर बुरा प्रभाव डाल सकता है, इसलिए ऐसे साहित्य को पढ़ें या फिर धार्मिक ग्रंथों को पढ़ें, जो आपके भीतर भक्ति भाव को जागृत करें और मन में ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना और भाव विकसित करे।

सात्विक हो खान-पान

गर्भवती को अच्छे स्वस्थ शिशु के लिए हमेशा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह संतुलित और ताजा खाना ही खाएं। बासी खाना और मिर्च-मसाले के खाने से परहेज करें, क्योंकि जो भी खाना मां खाती है उसका सार ही बच्चे को मिलता है। खाना खाने से पहले मां अन्नपूर्णा का स्मरण करें और यह प्रार्थना करें कि यह खाना बच्चे को स्वस्थ और तंदुरुस्त बनाए। आस-पास का माहौल ऐसा हो कि मां सुरक्षित महसूस करें। गर्भवती को अपने पति से पूरे ह्रश्वयार और सम्मान की प्राप्ति होनी चाहिए, क्योंकि जो भाव मां के होंगे, वही भाव बच्चा ग्रहण करेगा। यदि मां सुरक्षित और खुश रहेगी तो आने वाली संतान भी खुश रहेगी।

पहले और दूसरे महीने

गर्भ के पहले और दूसरे महीने में अपनी कुलदेवी की पूजा करें और पति-पत्नी साथ बैठकर पूजन का विधि-विधान पूरा करें और यह प्रार्थना करें कि आने वाला बच्चा अपने परिवार की मान्यताओं से हमेशा जुड़ा रहे और अपने परिवार का नाम रोशन करें। साथ ही खाने वाली चीजों का दान भी करें। अगर आपको अपने कुल के देवी या देवता के बारे में ज्ञान नहीं है तो आप महागौरी और श्री गणेश का पूजन करें और गर्भवती का हाथ लगवाकर उसका पति नारियल का दान करें।

तीसरे और चौथे महीने

तीसरे और चौथे महीने में गर्भस्थ शिशु के माता-पिता श्री कृष्ण का पूजन करें और उनकी कथाएं पढ़ें, सुनें या फिर देखें। दूध, घी, मक्खन, मिश्री, जैसी भी आप की सामथ्र्य है, वैसा दान दें। यह दान मां का हाथ लगाकर गर्भस्थ शिशु का पिता दान करें और प्रार्थना करें कि आने वाली संतान में श्री कृष्ण जैसी मधुरता हो और वह हर परिस्थिति में अपना मार्ग बनाता जाए। श्री कृष्ण से बच्चे की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें।

पांचवे और छठे महीने

पांचवे और छठे महीने में मां दुर्गा का पूजन करें और कामना करें कि आने वाली संतान बहादुर और सशक्त हो। मां दुर्गा के मंदिर में सफेद और लाल फूलों की माला अर्पित करें और गर्भवती का हाथ लगवाकर हलवा और चने का दान दें। यह दान भी गर्भवती का पति करें।

सातवें और आठवें महीने

सातवें और आठवें महीने में पति-पत्नी मिलकर विष्णु सहस्रनाम का रोज पाठ करें और प्रार्थना करें कि आने वाले शिशु का जीवन धन-धान्य- सौभाग्य से परिपूर्ण हो और दान के रूप में पति लड्डुओं का दान दे।

नवे महीने

नवे महीने में फिर से आपने अपनी कुलदेवी या कुलदेव की आराधना करनी है, क्योंकि उन्हीं की कृपा से आपकी वंश माला आगे बढऩे जा रही है और ऐसी प्रार्थना करें कि बच्चा बिना किसी कष्ट के जन्म ले। इस प्रकार से किए गए पूजन-अर्चन और दान का बहुत गहरा असर बच्चे पर पड़ता है और यह सात्विकता बच्चे के व्यक्तित्व को छू कर जाती है तथा आने वाली संतान में जीवन में बिना संयम खोए लडऩे की योग्यता लाती है। इस प्रकार किए गए पूजन-अर्चन से एक तो बच्चा अच्छे व्यक्तित्व का धनी होगा और दूसरा उसके जीवन में सकारात्मकता आएगी। इस प्रकार का जन्मा बच्चा सामाजिक व्यक्तित्व का भी धनी होगा।

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