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कैसा हो शिशु-आहार

नीरा कुमार

10th June 2019

शिशु की निर्भरता यूं तो मां के दूध पर ही सबसे ज्यादा होती है, लेकिन समय बीतने के साथ उसे वैकल्पिक आहार देना शुरू करना भी ज़रूरी होता है। इसी बारे में कुछ अहम जानकारी-

कैसा हो शिशु-आहार

परिवार में एक नए शिशु के आगमन से एक तरफ जहां खुशी का माहौल छा जाता है, वहीं शुरू हो जाता है, रिश्तेदारों की बधाइयों के साथ सलाह और हिदायतों का लंबा क्रम। यहां जरूरी बात यह है कि शिशु के सही विकास पर हो रहे निरंतर शोधों के कारण चिकित्सीय सलाह बहुत जरूरी है। मसलन शिशु को मां का दूध कब तक पिलाना चाहिए। उसे दूसरे तरल पदार्थ कब से देना शुरू करना चाहिए। सेमी लिक्विड और ठोस आहार कब से शुरू करें, आदि बातों के बारे में जानकारी दे रहे हैं, मैक्स हॉस्पिटल से जुड़े वरिष्ठ सलाहकार पैड्रिटीशियन (बाल रोग विशेषज्ञ) डॉक्टर राजीव रंजन।

प्रथम चार माह तक सिर्फ मां का दूध

डॉक्टर राजीव कहते हैं कि शिशु के लिए मां का दूध ही सबसे अच्छा और पौष्टिक आहार है। इसमें वे सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं, जो शिशु के लिए जरूरी हैं। मां का दूध शिशु में रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास करता है, इसलिए जन्म के साथ ही शिशु को अपना दूध पिलाना चाहिए। नॉर्मल डिलीवरी होने पर शिशु को मां का दूध दो घंटे बाद पिलाना चाहिए और सिजेरियन होने पर चार घंटे बाद।

शिशु को अपना दूध पिलाने से पहले स्वच्छता का अवश्य ध्यान रखना चाहिए। अपने दोनों स्तनों को गीले कपड़े या रुई से अच्छी तरह साफ करें और जब दूध पिलाएं तो हमेशा आराम से बैठ कर शिशु का सिर थोड़ा ऊपर रखें। ध्यान रखें कि स्तन के भार से शिशु को सांस लेने में परेशानी न हो। दोनों स्तनों से बारीबारी से पिलाएं। इससे दूध सही मात्रा में बनता है। शिशु को हर दो घंटे बाद दूध पिलाना चाहिए। अगर बच्चा ठीक से दूध नहीं पी रहा है तो स्तनों को हाथ से दबा कर या ब्रेस्ट पंप की मदद से दूध निकालें। मां को दूध पिलाते समय शांत और प्रसन्नचित्त मुद्रा में रहना चाहिए। इससे मां और बच्चे के बीच एक स्वाभाविक भावनात्मक संबंध बनता है। दूध पिलाने के बाद डकार दिलवाना भी जरूरी है। इस क्रिया को चिकित्सक से सीख कर अवश्य करें, अन्यथा बच्चे के पेट में दर्द हो सकता है, गैस भी बन सकती है।

चार से छह माह तक

जन्म के समय शिशु के शरीर में कई तत्व जैसे विटामिन, आयरन आदि पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं, लेकिन चार माह के बाद शिशु को मां के दूध के अतिरिक्त ऊपरी आहार भी देना जरूरी हो जाता है, क्योंकि शारीरिक विकास के लिए अब बच्चे को अन्य तत्वों की भी जरूरत होती है। इसके लिए शिशु को पानी उबाल कर व ठंडा करके पिला सकते हैं। लिक्विड डाइट में शिशु को मूंग दाल का पानी, चावल का पानी और टमाटरों को उबालकर-छानकर उसका रस देना चाहिए। साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि शिशु को एक साल तक नमक और चीनी किसी भी चीज में डाल कर नहीं देना चाहिए। हर दो घंटे के अंतराल पर शिशु को कुछ-न-कुछ देते रहना चाहिए।

सातवें महीने से एक वर्ष तक

शिशु के सातवें महीने से सेमी लिक्विड डाइट देनी चाहिए, जैसे खिचड़ी, दलिया, मैश किया हुआ केला, घर का निकला फ्रूट जूस, उबली व मैश की हुई सब्जियां आदि। शिशु के आठ महीने के बाद उसे ठोस आहार जैसे- उबला आलू, चूरा की हुई ब्रेड, बिस्कुट, अंडा आदि। रोटी-चावल भी कुछ मात्रा में दिया जा सकता है। छह महीने के बाद यदि मां को अपना दूध पिलाना संभव नहीं हो तो गाय का दूध दिया जा सकता है। बस ध्यान रखना है कि धीरे-धीरे दूसरे दूध पर डालें। एकदम से बंद नहीं करना चाहिए। किसी भी हालत में बच्चे को भूखा नहीं रखना चाहिए। आदर्श स्थिति तो यही होगी यदि शिशु को एक वर्ष तक मां का दूध दिया जाए।

नई मां को हिदायतें

शिशु के जन्म के बाद मां की डाइट बहुत ही पौष्टिक और संतुलित होनी चाहिए। उसे मिर्च मसालेदार खाना, नॉन वेज और रेस्तरां का खाना नहीं खाना चाहिए। साथ ही प्रचुर मात्रा में पानी पीना चाहिए, क्योंकि चार महीने तक शिशु को पानी नहीं दिया जाता है। इसके अलावा गोभी, मटर, छोले, राजमा, मशरूम आदि ऐसी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए, जो गैस बनाती हैं। शिशु को भी गोभी, मटर आदि का सेवन नहीं कराना चाहिए। एक साल के बाद शिशु का आहार मां के आहार का आधा होना चाहिए। बच्चे का सही विकास कराना है तो उपरोक्त बातों का अवश्य ध्यान रखना चाहिए।

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