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मातृत्व एक आशीर्वाद है

मोनिका अग्रवाल

13th June 2019

जानी-मानी आईवीएफ और फॢटलिटी विशेषज्ञ डॉ. प्रीति गुप्ता के लिए अपने इस प्रोफेशन में मातृत्व का काफी बड़ा प्रभाव रहा है, क्योंकि वे कई लोगों को मातृत्व का उपहार देती हैं और खुद भी एक मां हैं। वे मातृत्व के जादुई क्षणों को जानती और महसूस करती हैं और शायद यही वह भावना है, जिसके कारण वे अपने पेशे को भी अच्छी तरह से निभा पाती हैं। वे जानती हैं कि मां बनना और बच्चों की देखभाल करना आसान नहीं है। यह प्यार और सम्मान की बात है। यह एक बड़ी जि़म्मेदारी है।

मातृत्व एक आशीर्वाद है

बच्चों को कैसे समझा जाए और समझाया जाए, ताकि बच्चे अपने जीवन में अच्छे इंसान के रूप में विकसित हों, यह हमेशा एक चुनौती के रूप में सामने खड़ा होता है। साथ ही जब महिला नौकरीपेशा हो, तब ऐसे समय में उसके लिए यह काम और भी मुश्किल हो जाता है। काम और पारिवारिक मोर्चे, दोनों को प्रबंधित करना बहुत आसान नहीं है। अपने बच्चों के साथ अपने रिश्ते के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, 'मैंने हमेशा अपने पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन को पूरी तरह से संतुलित किया है। मैं अपने बच्चों के साथ जो समय बिताती हूं, उससे मुझे बहुत सारी चीजें करने के लिए सकारात्मक ऊर्जा, खुशी और ताकत मिलती है। अब मैं उनके लिए सोचती हूं तो मुझे स्वत: ही सारी ऊर्जा मिल जाती है और दिन-भर की थकान दूर हो जाती है। उनके अनुसार कुछ खास बिंदु, जिन पर हर मां चाहे कामकाजी हो या घरेलू, ध्यान देना जरूरी है।

दोस्त हैं या हिटलर

सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि आप कैसी मां हैं, यानी बच्चे की दोस्त, जिससे बच्चे सब कुछ शेयर करते हैं या हिटलर? बच्चे को किसी अच्छी या बुरी बात के बारे में कुछ नहीं पता होता। बच्चे की मनोदशा मां से अच्छा कौन समझ सकता है। मां ही एक बच्चे की पहली गुरु है। एक मां ही अपनी संतान को खुश रख सकती है और जितना वो उन्हें सिखा सकती है, दूसरा कोई नहीं।

परेशानी क्या है

आज के समय में मां के सामने सबसे बड़ी परेशानी ये है कि बच्चे को कहां पर सुरक्षित माने। आज के मासूम बच्चे ना ही घर में सुरक्षित हैं, ना ही बाहर। बच्चों के साथ यौन-शोषण के मामले आए दिन सुनने को मिलते हैं। इन मासूमों के साथ अगर कुछ गलत हो जाए तो मां-बाप कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन सबसे पहले एक मां ही गुड टच और बैड टच की शिक्षा दे सकती है, ताकि इन मासूमों को भी पता चले कि उनके साथ जो हो रहा है, वह अच्छा है या बुरा।

यकीन किस पर

दिल है कि मानता नहीं! समझ पाना मुश्किल होता कि कौन विश्वास के काबिल है, कौन नहीं। मन किसी पर भी यकीन नहीं करता। ऐसे मे जब एक मां अपने बच्चे की बेस्ट फ्रेंड बनती है तब बच्चा अपने को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करता है। चाहे आप कितना ही बिजी क्यों ना हों, कुछ वक्त बच्चे के साथ बिताना बहुत जरूरी है।

निवेश करें

यहां मेरा निवेश करने से मतलब रुपया या फाइनेंस से नहीं है। जब आपका बच्चा सफल होता है, तब आपके लिए यह दुनिया का सबसे बड़ा सुख होता है, लेकिन यदि वह लडख़ड़ाए तो उसे इस स्थिति में देखना मां-बाप के लिए सबसे अधिक पीड़ादायक है, इसलिए याद रखने लायक महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों पर प्यार निवेश करें। इस निवेश से निश्चित तौर पर फर्क पड़ता है। हालांकि आप पहली बार में इसका फल नहीं देख सकते हैं। आपको कई बार कोशिश करनी पड़ सकती है, पर निश्चित रूप से आपको फर्क दिखेगा और आपका बच्चा दुनिया का बेहतरीन बच्चा साबित होगा।

सपोर्ट मिसिंग तो नहीं

अपने बच्चों के सपनों का समर्थन करें। उन्हें प्रोत्साहन दें और ऐसा करने का अवसर प्रदान करें, जिससे वे अपने सपनों को साकार कर सकें। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप बच्चे की सुनते ही ना हों और बच्चे को सपोर्ट ही ना मिलती हो।

किसकी परवाह

यदि आपकी बेटी या बेटा डॉक्टर नहीं बनना चाहते या इंजीनियरिंग नहीं करना चाहते तो इसमें कैसी परेशानी? नाराज न हों। यह आपके बच्चे का जीवन है। उन्हें अपने कुछ निर्णय खुद कर लेने दें। कौन परवाह करता है। यदि आपकी बेटी हिप हॉप संगीत सुनती है और अत्यधिक मात्रा में आईलाइनर लगाती है, वह तब भी आपकी बेटी है। चार लोग क्या कहेंगे यह कैसी परवाह?

बच्चे की सोच अपनाएं

इस बात को समझें कि आपके बच्चे की सोच आप से अलग हो सकती है। इस बात पर उग्र होने की आवश्यकता नहीं कि उनकी सोच आप से अलग है। हो सकता है आप वह ना करें, जो आपके बच्चे कर रहे हैं, लेकिन यह उनका निर्णय है, आपका नहीं। पहले से ही आपका उनके जीवन पर एक बड़ा प्रभाव पड़ता है। यह आपने तय किया था कि वह कौन से स्कूल में जाए, वह रात के खाने में क्या खाए, उन्हें सप्ताह के खर्च के लिए कितनी पॉकेट मनी मिले, वह किस से मिले आदि। बस, अब और नहीं, और ज़्यादा न करें। जीने दें। अपने फैसले उन्हें खुद लेने दें। मार्गदर्शक बनें, मार्ग अवरोधक नहीं।

नो ऑफिशियल वर्क

यह हमेशा अच्छा होता है कि आप ऑफिस या बिजनेस का काम घर लेकर न आएं। काम के प्रति समर्पित होना बुरा नहीं है, लेकिन काम को घर लेकर जाना सही नहीं है। एक बार जब आप ऑफिस से बाहर निकल जाएं तो ऑफिशियल फोन, इ-मेल चेक न करें। संभव है कि आप किसी महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर काम कर रही हों, लेकिन उसे अगले दिन थोड़ा ज्यादा वक्त देकर भी पूरा किया जा सकता है।

छुट्टियां भी जरूरी बच्चे और परिवार के लिए जरूरी है कि आप साथ समय बिताएं। इससे तनाव कम होता है, इसलिए काम के बीच-बीच में छुट्टियां लेंगी तो बच्चे अकेलापन महसूस नहीं करेंगे।

(डॉ. प्रीति गुप्ता, आईवीएफ और फर्टिलिटी विशेषज्ञ, आईवीएफ क्लिनिक से बातचीत पर आधारित)

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