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परंपरा में ही है प्रकृति से जुड़ाव

दामिनी यादव

20th June 2019

घरों में बनने वाली रोटियों में से पहली गाय के लिए और आखिरी कुत्ते के लिए, चिडिय़ों के लिए छत्त पर पीने का पानी रखना, कबूतरों को बाजरा डालना, चींटियों को आटा बुरकना, श्राद्ध में कौवे के लिए पहला खाना रखना, शुभ अवसरों पर बैल या घोड़े को गुड़-चना खिलाना और ऐसे ही न जाने कितने कर्मकांड, जिन्हें आज केवल धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़कर देखा जाता है, हमेशा से हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। भले ही ये सब मुख्य रूप से 'धर्म के नाम पर होता आया हो, लेकिन धर्म की तो वास्तविक परिभाषा ही यही रही है, जिसे धारण किया जा सके, जो हमारे रोज़मर्रा के जीवन का अटूट हिस्सा हो।

परंपरा में ही है प्रकृति से जुड़ाव

अब यही देख लीजिए कि भारत में तो पेड़, पौधे, पत्थर, नदियां, पहाड़, चांद, तारे, लगभग संपूर्ण प्रकृति को ही आदर दिया गया है तो इसके पीछे मूल भावना इस प्रकृति के संरक्षण की ही है, दूसरा रूप और जो चाहे जोड़ दिया गया हो। अगर हम आज की बात करें तो अब जब हमें 'विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की ज़रूरत अलग से महसूस होती है तो ये बात साफ तौर पर समझ में आ जाती है कि हम न सिर्फ़ प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, बल्कि अपनी सुविधा और स्वार्थ में अंधे होकर उसे इस हद तक इस्तेमाल कर चुके हैं कि सभी प्राणियों का जीवन बचाने वाली प्रकृति को आज खुद के संरक्षण की ज़रूरत पड़ गई है।

ये दुनिया इंसान के रहने के लिए ही इतनी कम पडऩे लगी है कि घर के ऊपर घर बनकर मल्टीस्टोरीज़ आसमान छू रही हैं और पांवों तले से ज़मीन छूटती जा रही है। चिडियों-गौरेयों के घोंसलों के लिए पेड़ या झाडिय़ों की गुंजाइश निकले तो कहां से निकले। जाने कितने ही पशु-पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं, जिनके संरक्षण के लिए बार-बार जागरुकता अभियान चलाए जा रहे हैं,पर दुखद ये लगता है कि ये सारी कवायद भी सिर्फ़ किसी एक दिन या तारीख तक ही सीमित होकर रहती जा रही है। बाकी के दिन फिर हम सभी वही उदासीनता ओढ़ लेते हैं।

हालांकि अगर ऐसे लोग हैं, जो प्रकृति को पहुंच रहे इस नुकसान के प्रति सजग हैं और दूसरों को भी जागरूक कर रहे हैं तो इन भावनाओं को आदर और अहमियत दी जानी चाहिए। उनकी कोशिशों में बाकी के समाज को भी साझेदारी करनी चाहिए। कोई भी इन बातों की सुध न ले, उससे अच्छा है कि कहीं, किसी कोने से ही सही, आवाज़ तो उठे। बार-बार ये बात कही जाती है कि कोई भी अच्छी शिक्षा जब एक पुरुष पाता है तो वह आमतौर पर केवल उसी तक सीमित रह जाती है, लेकिन वही शिक्षाएं जब एक स्त्री तक पहुंचती है तो स्त्री उसे पूरे समाज तक पहुंचा देती है। इस बात को हमेशा याद रखने और बार-बार दोहराने की ज़रूरत है। अगर वे तमाम बातें, जैसे- गाय के लिए रोटी निकालना, चिडिय़ों के लिए पानी रखना वगैरह धर्म के नाम पर हो या प्रकृतिसं रक्षण के नाम पर, क्या फर्क पड़ता है।

आखिर नाम में क्या रखा है, मकसद तो काम से है और आज अपनी पृथ्वी और इसके पर्यावरण का संरक्षण एक बहुत बड़ा काम है, क्योंकि ये बचेंगे, तभी हम इंसान बचेंगे। जिन्हें धर्म और विज्ञान की लड़ाई को एक बहस का रूप देना है, उन्हें देने दीजिए, आम घरेलू महिलाएं तो बस इस कोशिश में जुट जाएं कि कैसे इन तमाम कोशिशों को अपने पूरे परिवार के एक-एक सदस्य की जि़ंदगी का हिस्सा बना देना है। ये बहुत खूबसूरत आदतें हैं, एक खुशबू की तरह, जो आपके घर से होकर रिश्तेदार, दोस्तों, अड़ोसियों-पड़ोसियों तक पहुंचेंगी। इन्हीं एक- एक घर से जुड़कर बनता है एक मोहल्ला, फिर एक शहर, फिर एक देश और फिर एक पूरी की पूरी दुनिया।

आप भी अपनी लाड़ली के हाथों में सौंप दीजिए एक नन्हा सा पौधा और अपने लाड़ले को दे दीजिए छोटे से पालतु पशु या पक्षी के रूप में एक प्यारा सा दोस्त। जब हर हाथ एक पौधा और एक जीव बचा लेगा तो दुनिया भी अपने-आप बच जाएगी। तो चलिए, छत्त पर ज़रा चिडिय़ों के पीने के लिए पानी रख आएं और दुनिया बचाने की कोशिशों में नन्हा सा योगदान हम अपना भी दे आएं।