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बोझिल पलकें, भाग-31

रानू

26th June 2019

जिस पिता के लिए अजय ने अपराध की दुनिया से मजबूरन खुद को जोड़े रखा था, उनकी मौत के साथ ही वह दुनिया भी दम तोड़ चुकी थी, लेकिन क्यों अभी भी अजय खुद को न तो आजाद महसूस कर रहा था और न ही उसे कोई नयापन महसूस हो रहा था?

बोझिल पलकें, भाग-31

अजय की आंखों में आंसू छलक आए। उसके पिता के दिल में क्या भेद था? वह उससे सदा ही कुछ न कुछ कहना चाहते थे। कहते-कहते रुक जाते थे, बाद में बताने का वचन देते थे। मरने से पहले वह अपने दिन का भेद उस पर प्रकट करने का वादा कर चुके थे, परंतु अब क्या हो सकता है? अब? उसके पिता का भेद तो अब उनके साथ ही दफन हो गया। आज जब उसके पिता अपने बेटे को बुरे कर्मों से स्वतंत्र देखने योग्य हो गए थे तो उनकी आंखें ही सदा के लिए बंद हो गईं। आज जब वह स्वयं भी चन्दानी के जाल से स्वतंत्र होने योग्य हो गए तो उनका जीवन ही उन्हें धोखा दे गया। डी.आई.जी. ने अजय को तसल्ली देने के लिए उसके कंधे पर हाथ रखा और खेद प्रकट करते हुए बोले, ‘आई एम सॉरी, माई सन।'

अजय की आंखों के आंसू गालों पर लुढ़क आए। जिनके जीवन के लिए उसने अपने जीवन की बाजी लगाई, अब वही नहीं रहे।

 

3

 

अजय को कोतवाली में अपना बयान देने के लिए बहुत देर ठहरना पड़ा। अपराधियों का इतना बड़ा गैंग पकड़ने की सूचना रात ही रात सारे शहर में जंगली आग के समान फैल गई थी। कोतवाली के बाहर दर्शकों की इतनी भीड़ लग गई थी कि पुलिस को संभालना कठिन हो रहा था। पत्रकार कोतवाली में पहुंचकर सभी पुलिस वालों से तुके-बेतुके प्रश्न पूछ रहे थे। कुछेक पत्रकारों को जब यह पता चला कि इस गैंग को पकड़वाने का सेहरा अजय को है तो उस पर प्रश्नों की बौछार कर दी। कुछेक ने उसकी तस्वीरें भी खींचीं। अजय का मन उसके पिता की मृत्यु के कारण भारी था, फिर भी उसे सबके प्रश्नों का उत्तर देना था और वह संक्षेप में उनका उत्तर देता रहा। जब आधी रात बाद वह अपने घर पहुंचा तो बहुत थक चुका था, परंतु उसके बाद भी उसे नींद नहीं आ सकी। अपने पिता के बिछुड़ने का उसे बहुत दुख था।

पिता का शव उसे दूसरे दिन पोस्टमॉर्टम के बाद मिलना था। पलंग पर लेटने के बाद बार-बार वह एक ही बात सोचने पर विवश था। उसके पिता उससे क्या कहना चाहते थे? उसके पिता के दिल में क्या भेद था, जो वे बहुत उदास रहा करते थे। क्यों भगवान का अट्टहास उड़ाते-उड़ाते अचानक उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे? अजय के मन में ऐसी बेचैनी बनी हुई थी कि वह बहुत देर तक नहीं सो सका। जाने कैसे सुबह होने से कुछ पहले ही उसे नींद आई।

सुबह जब उसकी आंखें खुलीं तो समीप ही रखे फोन की घंटी बज रही थी। फोन की निरंतर बजती घंटी ने ही उसकी नींद तोड़ दी थी। उसने मन ही मन इतनी सुबह फोन करने वाले को कोसा। देर से सोने के कारण उसका सिर फटा जा रहा था। फिर भी उसने करवट बदलते हुए फोन उठा लिया। बोला, ‘हैलो?'

उस तरफ एक भेद-भरी खामोशी थी।

अजय का दिल धड़का। कहीं कोई अपराधी कल बच निकलने के बाद उसे बदले की चुनौती तो नहीं देना चाहता है? संभलकर बैठते हुए उसने कहा, ‘हैलो?' उसका स्वर तेज था।

सहसा उसके कानों में रस टपक गया। एक आवाज आई, बहुत ही मीठी, सुरीली, परिचित-सी, ‘हैलो।' स्वर अंशु का था।

अजय अंशु का स्वर पहचान चुका था। फिर भी उसने पूछना आवश्यक समझा, ‘आपका शुभ नाम?'

‘मैं...' उत्तर में थोड़ा संकोच था, परंतु वाक्य पूरा हो गया, ‘मैं अंशु हूं।'

‘ओह! अंशुजी आप!' अजय के सिर का दर्द मानो तुरंत दूर हो गया। वह आलथी-पालथी मारकर बैठ गया और गोद में एक तकिया रखकर फोन वाले हाथ की कोहनी स पर टेक दी। बोला, ‘कहिए, इतनी सुबह-सुबह कैसे याद किया?'

‘आज के अखबार में आपकी तस्वीर तथा सफलता देखकर आपको बधाई देना आवश्यक समझा बस इसीलिए रिंग कर दिया।'

‘ओह...धन्यवाद! अजय ने कहा, परंतु उसका स्वर गंभीर था। उसने बात जारी रखी, ‘परंतु जिनके जीवन की सुरक्षा के लिए मैंने दोबारा अपराध करना स्वीकार किया था तथा जिनकी स्वतंत्रता के लिए मैंने इतना बड़ा खतरा मोल लिया, वही नहीं रहे तो क्या लाभ?'

‘आपने कभी यह भी सोचा कि आपके पिता ने अपनी बलि देकर अनेक बेबस तथा मजलूम लोगों को अपराध करने से बचा कर कितना बड़ा पुण्य का काम किया है?' अंशु ने कहा।

‘जी हां, यह बात तो है फिर भी...' अजय ने कहना चाहा।

‘फिर-फुर कुछ नहीं। भगवान जो भी करता है, अच्छा ही करता है।' अंशु ने समझाया, ‘क्या जाने उनके बचने के बाद सरकार उन्हें क्षमा करने की बजा बाकी जीवन...'

अजय को अंशु की बात उचित लगी तो उसे शांति मिली। यदि उसके पिता जीवित बच जाते तो कानून उन्हें कभी क्षमा नहीं करता। आखिर उनका सारा जीवन एक अपराधी बनकर ही तो बीता था। उसने कहा, ‘आप ठीक कहती हैं कि भगवान जो भी करता है, अच्छा ही करता है।'

‘जी हां...' अंशु ने कहा, ‘आप अपने पिताजी को भूलकर अब एक नया जीवन आरंभ कीजिए।'

नया जीवन! अजय ने सोचा, नया जीवन आरंभ करने के लिए उसे एक नए जीवन-साथी की आवश्यकता भी तो है। क्या अंशु...अंशु...अजय का दिल अंशु के बारे में सोचते हुए धड़क उठा, परंतु उसने अपने दिल को समझा लिया।

जारी...

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