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बोझिल पलकें, भाग-34

रानू

10th July 2019

समय सबसे बड़ा मरहम होता है। यही समय अब अंशु के रूप में अजय के सारे दुखों पर मरहम रखने जा रहा था। अजय को यकीन नहीं हो रहा कि अब जो कुछ उसके साथ हो रहा था, वह सब सपना नहीं, हकीकत है।

बोझिल पलकें, भाग-34

रविवार का दिन था। सारी लड़कियां तथा लड़के सुबह अपने निश्चित समय पर अंशु के बंगले पर पहुंचने लगे।

मीना भी आ गई, परंतु मीना को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि विशाल वहां उपस्थित नहीं है।

अंशु जब अपना सामान बस के ऊपर रखवाने लगी तो मीना ने पूछ ही लिया, ‘विशाल बाबू क्यों नहीं आए?'

‘तेरी रुचि उनमें इतनी क्यों बढ़ रही है? नहीं आए तो नहीं आए।' अंशु ने मस्तक पर बल डालकर कहा।

‘अरे बाबा, मेरी रुचि उनमें क्यों बढ़ने लगी?' मीना ने कहा, ‘मैं तो तेरी संगति के लिए कह रही थी। कम से कम इसी बहाने उन्हें तेरे ऊपर अपने दिल का हाल तो प्रकट करने का अवसर मिल जाता। आजकल विवाह से पहले यदि रोमांस नहीं किया जाए तो जीवन सूखा-सूखा लगता है। निश्चय ही तू उन्हें फोन करना भी भूल गई होगी।'

वास्तविकता यह नहीं थी। अंशु ने जब भी विशाल को ट्रंककॉल करनी चाही, दिल साथ नहीं दे सका। एक बार तो अंशु ने ट्रंककाल मिलाने के बाद भी काट दी थी। अजय के साथ पिकनिक का इतना सुनहरा अवसर वह हर्गिज गंवाने को तैयार नहीं थी। पिकनिक में अजय के साथ रहकर वह बहुत आसानी से उसके दिल की बात जान सकती थी और फिर स्वयं भी अपना प्यार प्रकट कर सकती थी।

उसने बात समाप्त करने के लिए कहा, ‘यही समझ ले।'

‘अब तो तुम निश्चय ही पिकनिक में बोर होओगी।' मीना ने खेद प्रकट किया।

‘बोर क्यों होऊंगी?' अंशु ने कहा, ‘मेरे साथ अजय बाबू जो रहेंगे।'

‘अजय बाबू!' मीना चौंकी। फिर चंचलता से बोली, ‘उनसे तो मैं साथ प्राप्त करने की आशा कर बैठी थी और तू...'

‘क्या?' अंशु ने आंखें दिखाईं।

‘सच बता...' मीना गंभीर हो गई। पूछा, ‘कहीं तुझे अजय बाबू से प्यार तो नहीं हो गया?'

अंशु ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह भी गंभीर हो गई।

‘मैं समझ गई।' मीना ने कहा। पूछा, ‘क्या वह भी तुझे चाहते हैं?'

‘पता नहीं!'

‘पता नहीं की बच्ची!' मीना फिर चंचलता पर उतर आई। उसने अंशु के कूल्हे पर चिकोटी काटी। बोली, ‘क्या कभी किसी नवयुवक का दिल तेरे लिए धड़कने से इंकार कर सकता है? खैर, पिकनिक में मैं उनके दिल की बात अवश्य पता लगाकर बता दूंगी।'

धीरे-धीरे सभी लड़के-लड़कियां वहां पहुंच गए। अजय भी आ गया तो मीना ने अंशु को देखा। अंशु का मुखड़ा प्रसन्नता तथा लाज से दमक उठा था।

अजय ने अपना ब्रीफकेस स्वयं बस के ऊपर डाल दिया। फिर सुबह की पौ फटते-फटते बस बंबई से दूर एक पिकनिक स्पॉट की ओर चल पड़ी।

बस में अंशु को उसकी सहेलियों ने घेर रखा था, जो अंशु नहीं चाहती थी तथा अजय भी। अजय एक कोने में सबसे पीछे बैठा था।

लड़के-लड़कियों से बस भर गई थी। किसी ने गिटार साथ ले लिया तो किसी ने बैंजो। अन्य साज भी थे। बस चलते ही चहक तथा ठहाके आरंभ हो गए थे। बस में ही लड़के-लड़कियों ने अपना-अपना ब्रेकफास्ट लेना आरंभ कर दिया। अंशु भी उठकर अजय के पास गई। कुछ ‘स्नैक्स' उसकी ओर बढ़ाए तो अजय ने धन्यवाद के साथ एक ‘स्नैक' ले लिया।

जब सुबह अच्छी तरह निखर आई तो एक जगह बस रुकी। सबने थरमस से चाय निकालकर पी। उसके बाद बस अपनी मंजिल के लिए रवाना हुई तो ठहाकों का शोर और ऊंचा हो गया। कुछ घंटों बाद संगीत का प्रोग्राम होने लगा। मनचले नवयुवक चलती बस में विदेशी ढंग पर खड़े होकर थिरकने के अंदाज में शरारत से मटके जाते।

सभी चहक रहे थे, परंतु सदा चहकने वाली अंशु आज गंभीर थी। इस बात को अजय ने भी महसूस किया तथा अंशु के समीप बैठी मीना ने भी।

प्यार मानव को किस प्रकार गंभीर बना देता है, यह बात मीना अंशु को देखने के बाद ही जान सकी।

कुछ लड़कियों को छोड़कर सभी के अपने-अपने प्रेमी थे। कुछ लड़कियों ने दृष्टि द्वारा अजय को भी निमंत्रण दिया, परंतु अजय टाल गया।

अजय की दृष्टि बार-बार अंशु से टकरा जाती थी, परंतु दोनों खामोश थे एक-दूसरे के दिल की धड़कनों का स्वर सुनकर भी एक-दूसरे से बहुत दूर थे।

जब लड़के-लड़कियां संगीत से थक गए तो चुटकुले आरंभ हो गए। चुटकुले का दौर खूब चला। चुटकुले सुनकर अंशु भी मुस्करा देती। मुस्कराकर जब वह अजय को देखती तो अजय के दिल में अंशु की प्राप्त करने की अभिलाषा और तीव्र हो उठती।

जारी...

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