GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

मैं कितना गलत थी पापा

शोभा माथुर ब्रिजेंद्र

18th July 2019

मनाली पहुंचकर लगा, जैसे सारे जहां की खूबसूरती चारों तरफ बिखर गई हो। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह घाटी देवदार के वृक्षों से घिरी हुई थी। गीली नम हवाओं के बीच धुंध ही धुंध थी। हर रोज़ शाम से पहले बादल दरख्तों के चारों ओर बिखर जाते थे। शहर में चांद एक जगह नहीं दिखता था। लगता था, अपनी चांदनी से मिलने तेज़ी से बढ़ रहा है, पर मनाली में दरख्तों के बीच झमकता चांद रुक गया था।

मैं कितना गलत थी पापा

चारों तरफ दूध सी उजली चांदनी छिटकी हुई और उस चांदनी को वह बेहद प्यार से निहार रहा था। पत्तों की आड़ में लुकताछिपता चांद। सुरमई शाम देहलीज़ को छू भी नहीं पाती थी कि देखते ही देखते यहां गहन अंधेरा हो जाता था। बस्तियां खामोश हो जाती थीं, पहाड़ पर सन्नाटा छा जाता था।

हमारी नई-नई शादी हुई थी और ये भी हमारी खुशकिस्मती कि मेरे पति इस गेस्ट हाउस के मैनेजर भी थे। शादी के बाद वे मुझे भी यहीं, इसी गेस्ट हाउस में ले आए थे। लखनऊ के नवाबी माहौल और भरे-पूरे शहर से निकलकर मनाली जैसे स्वर्ग में आना मुझे बहुत ही ज्यादा अच्छा लग रहा था। यहां जहां तक नज़र जाती, ऊंची-ऊंची दीवारों, सड़कों, बाजारों की जगह शांत-सौम्य-गंभीर प्रकृति की छटा ही छाई रहती। एक ऐसा मौन था, जो अपने से, अपनी ही बात कहने की इजाजत देता था। तीन कमरों की खूबसूरत सी कॉटेज, आगे पूरी पहाड़ी पर बगीचा था, जहां खूबसूरत कौसमस फूलों की फैंसिंग थी। बगीचे में नेस्ट्रोशियम, पहाड़ी छोटे गुलाब, वरबीना, लिली, डेलिया आदि के फूल मेरा स्वागत कर रहे थे। ऊपर की पहाड़ी पर गेस्ट हाउस का स्टाफ रहता था। सुबह-सुबह आंख खुली तो देखा नहा-धोकर काले सूट में तैयार हैं। मुझे जगा हुआ देखा तो मुस्कुराकर मेरे पास चले आए। फिर मेरे बाल सहलाकर बोले, 'मैं होटल जा रहा हूं (होटल नीचेवाली पहाड़ी पर था और पीछे की छोटी सी पगडंडी के बाद कुछ सीढिय़ां उतरकर ही होटल का किचन था), तुम्हारे लिए चाय भिजवाता हूं, दस बजे ब्रेकफास्ट के साथ ही मैं भी आ

जाऊंगा।  मैं लिहाफ लेकर फिर सो गई। इन पहाड़ों की सॢदली सुबह मुझे और ज्यादा अलसाए दे रही थी। तकरीबन एक घंटे बाद बैल बजी और खूबसूरत सा लड़का, जो बैयरे की प्रॉपर ड्रेस में था, वह केतली में चाय रखकर चला गया। मुझे लगा मैं जन्नत में हूं, कुछ भी काम नहीं था। यहां हम ताला भी नहीं लगाते थे और न ही घर का कुंडा बंद करते थे। सिर्फ रात में ही किवाड़ बंद करते थे। प्रकृति की उदारता ने परिवेश को भी उदार बना दिया था।ठीक दस बजे नाश्ते की ट्रे लिए एक बैयरा आया। पीछे-पीछे ये भी कॉटेज में दाखिल हुए। मुझ जैसी लड़की के लिए यह सब किसी ख्वाब से कम न था। ब्रेकफास्ट में हर वह चीज़ थी, जो टूरिस्ट्स के लिए बनती थी। इनके सामने तो मैं शर्माती, कुछ ठीक से नहीं खाती, मगर जैसे ही ये होटल वापस जाते, मैं बगीचे में बैठकर आराम से खाती। खाना इतना स्वादिष्ट भी होता होगा, नहीं जानती थी। बगीचे में पूरी पहाड़ी पर सेब के बाग थे। नीचे पूरा पोदीना था,   बजाय घास के। दुष्कर पगडंडियां थीं, सर्पीले रास्ते थे। मोटे-मोटे दरख्तों पर लिपटी हुई बेलें। शाम होते ही चाय आ जाती व रात होते ही डिनर, मगर सारे दिन इनका होटल में रहना कुछ दिनों बाद मुझे अखरने लगा। स$फाई वाला सफाई करके हर दूसरे दिन

चादर बदल जाता, फूल सजा देता, मैं खाली इंतज़ार करती रहती कि ये कब आएंगे, कब आएंगे, मगर रात के दो बजे से पहले ये कभी भी नहीं आ पाते। ऊपर की पहाड़ी पर हमारी कॉटेज थी, वहीं खिड़की से मैं होटल में आने-जाने वालों को देखती रहती। कुछ भी तो नहीं था करने को। अकेली भी नहीं जा सकती थी कहीं, पहाड़ी रास्तों में गुम न हो जाऊं, डरती थी। यह उन दिनों की बात है, जब टीवी घर-घर नहीं होते थे। दिन भर पंछियों की चहचहाट मन को

बहलाती थी, लेकिन इन सबकी भी तो एक हद होती ही है। दो महीने गॢमयों के बीत गए, तभी लखनऊ से पापा का खत आया कि यूनीवॢसटी खुल गई है और मुझे तुरंत ही ज्वॉइन करना होगा। उन दिनों मैं लखनऊ यूनीवॢसटी से एमए कर रही थी। शादी को अभी वक्त ही कितना हुआ था। अभी तो हम दोनों ठीक से पास भी नहीं आए थे कि

मेरी पढ़ाई, मेरा भविष्य मुझे इनसे दूर कर रहा था। मेरा दिल ही जानता है कि मेरे लिए इन्हें छोड़कर जाना कितना मुश्किल था। एक तो हम वैसे ही सारा दिन अलग-अलग रहते थे, ऊपर से यह बिछोह... दोनों ही खूब रोये, उदास भी हुए और गुस्सा भी, मगर जाना तो था ही, क्योंकि पापा की मेरे फादर इनलॉ से यह पहली शर्त थी कि मैं अपना एमए हर हाल में पूरा करूंगी ही। अत: पापा के डर से न चाहते हुए भी, मन मारकर, कुढ़ते हुए ही मैं चली गई। वहां छह महीने मुझे और पढ़ाई करनी थी। मम्मी व छोटे भाई-बहन बेहद खुश थे, मुझे फिर अपने बीच पाकर, पर पता नहीं क्यों, अब मुझे इनके बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। रह-रह कर वहां की याद आती थी, इनका

मुस्कुराना,प्यार से मेरे हाथों को थाम कर कहना, 'प्लीज़ मत जाओ, इस अकेले जंगल में मुझे छोड़कर। मत जाओ। पहले तो मैं रह लेता था, पर अब नहीं रह पाऊंगा। तुम्हारी आदत जो हो गई है। ये सब मुझे याद आता। उस समय पापा मुझे विलेन की तरह लगने लगे थे और यही घर जहां शादी से पहले मैंने इतना अर्सा गुजारा, आज मुझे ज़रा भी नहीं भा रहा था। मन दौड़-दौड़कर उन्हीं वादियों में, अपने पति के पास पहुंच जाता। मैं जब भी पढ़ाई करती, पापा चुपचाप पीछे से आकर खड़े हो जाते, फिर कहते, 'क्या कर रही थी? मैं कहती, 'पापा, नोट्स बना रही हूं। तब वह कहते कि नोट्स बना रही है या चिट्ठी लिख रही है? तू बिना एमए किए यहां से हिल भी नहीं सकती, समझ में आया। मैं यह सब चुपचाप सिर झुकाकर सुन तो लेती, लेकिन मन ही मन कुढ़कर रह जाती।

मैंने अपनी सहेली हरजिंदर से कहलवाया भी कि वह मेरे पापा से कह दे कि मैं पढऩा नहीं चाहती, मेरा मन अब पढऩे में नहीं लगता। मुझे मनाली वापिस जाने दें, मगर मेरी सहेली की बात सुनकर उन्होंने जो डांट उसे पिलाई थी, वह हमारे घर का रास्ता ही भूल गई। मैं इनकी चिट्ठीयों से परेशान थी। हर चिट्ठी में यही लिखा होता कि पढ़ाई छोड़कर फौरन आ जाओ। इधर पढऩा मेरे बस में न था।

एक दिन फिर पापा चिल्लाए, 'इसे देखो, पढऩालि खना है नहीं, बस चिट्ठीयां लिखा करती है। तब मैंने भी हद पार कर दी और बोली, 'जब वह लड़का मुझे छोड़ देगा, तब क्या करोगे। यह देखो, हर चिट्ठी में वह मुझे बुला रहे हैं।

बस आव देखा न ताव, वह चप्पल पहनकर नीचे उतर गए। भइया भी उनके पीछे 'पापा-पापा कहकर भागा।उसी ने बाद में बताया कि तेरे ससुर को फोन किया है पापा ने कि अपने बेटे को समझा लें, वह अब आगे से ऐसी कोई चिट्ठीन डाले, जिससे उसकी पढ़ाई में रुकावट आए। अपना वायदा शायद आपको याद होगा। मैं अपनी बेटी की पढ़ाई पूरी कराए बिना नहीं भेजूंगा और आपने भी वायदा किया था न कि उसकी पढ़ाई पर कोई आंच नहीं आने देंगे। इसके बाद समय ठहर सा गया। कई हफ्तों बाद  इनका खत मिला, 'हम अब तब मिलेंगे, जब तुम अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी होंगी। खत मेरे कांपते हाथों में था और मेरी आंखों से आंसू टपटप बह रहे थे। दूर अंधेरे में कोई गा रहा था, 'दुनियां में ऐसा कहां सबका नसीब है, कोई-कोई अपने पिया के करीब है.... वक्त कभी नहीं रुकता, वह अबाध गति से बढ़ता जाता है।

मैं शाख से टूटे पत्ते की तरह धूलमिट्टी, तिनकों में उडऩे लगी। बस पढ़ती रहती या रात को छत पर लेटकर तारों भरे आसमान को निहारा करती… आज इस बात को गुज़रे कई साल हो गए। इस दौरान मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की। मुझे कामयाब देखने का सपना हमेशा मुझसे ज़्यादा मेरे पापा की आंखों में पला था और जब तक ये सपना सच में नहीं बदल गया, न पापा खुद चैन से सोये, न कभी मुझे सोने दिया। और जब पूरा हुआ तो सिर्फ पढ़ाई का सपना ही पूरा नहीं हुआ, बल्कि बचपन से एक लेखिका बनने का जो मेरा सपना हुआ करता था, जिस सपने पर यौवन ने अपनी परत चढ़ा दी थी, उसे भी पापा ने साकार कर दिया। आज मेरी ढेर सी किताबें छपीं, हर पत्रिका में मेरे लेख कहानियां छपे, स्कूलों में गेस्ट की भूमिका में मुझे इनवाइट किया जाता है। हर साल बुक फेयर में मुझे बुलाया जाता है। गूगल पर मेरा, मेरे काम का जिक्र है। रेडियो पर मेरे प्रोग्राम होते हैं। तब बस मुझे आप ही याद आते हो… पापा, आप न होते तो मैं कुछ भी नहीं होती। पापा यू आर माय सुपर हीरो। पापा आई लव यू, मैं कितना गलती थी पापा...।

ये भी पढ़िए-

कांटों का उपहार

एक दिन अचानक

खुशनुमा जिंदगी

आप हमें  फेसबुक,  ट्विटर,  गूगल प्लस  और  यूट्यूब  चैनल पर भी फॉलो कर सकते हैं।