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मिशन मंगल के लिए विद्या बालन ने बिना सोचे कहा था हां

गरिमा अनुराग

7th August 2019

मिशन मंगल के लिए विद्या बालन ने बिना सोचे कहा था हां

फिल्म में विद्या बालन मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर तारा शिंदे के किरदार में नज़र आएंगी। विद्या ने इस फिल्म को बिना सोचने का समय लिए तुरंत हां कर दी थी। जब हमने विद्या से ये पूछा था कि लंबे समय के बाद अक्षय कुमार से बात करके उन्हें कैसा लगा तो उनका जवाब था कि उन्हें ऐसा लगा ही नहीं कि वो दोनों दस-बारह साल बाद काम कर रहे हैं। फिल्म के सेट पर अक्षय पहले जैसे ही हमेशा लोगों को परेशान करने और हंसाने वाले बने रहे। एक बार तो उन्होंने कि विद्या की साड़ी के पल्लू में चम्मच बांध दी थी औऱ वो काफी देर तक सोचती रही कि पल्लू भारी क्यों लग रही है। पढ़िए उनसे बातचीत के कुछ अंश-

ऐसा क्यों लगा कि ये फिल्म आपको करनी चाहिए?

देखिए पहला, ये हमारे देश का बहुत बड़ा अचीवमेंट है। मैंने ट्रेलर के लॉन्च पर भी कहा था कि ऐसी फिल्मों को बड़े पर्दे पर दिखाने की जरूरत है। हमें गर्व होता है जब हम सुनते हैं कि हमारे देश के वैज्ञानिकों ने इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल की है। दूसरा, आर बालकि और जगन ने जब ये स्क्रिप्ट मुझे सुनाई, तो मुझे इस कहानी को स्क्रीन पर दिखाने का उनका तरीका पसंद आया। इसके पहले भ इस तरह की तीन फिल्में मुझे ऑफर हो चुकी हैं, लेकिन मुझे वो स्क्रिप्ट पसंद नहीं आई थी। 

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फिल्म में इतने सारे कलाकार हैं। आप सबका आपस में कैसा कनेक्शन रहा?

बहुत अच्छा रहा। हमलोग सेट पर बहुत बातें करते थे। कभी-कभी ऐसा लगता था जैसे ढ़ेर सारी सहेलियां हों, कभी दो तीन लोगों की गपशप की आवाज़ आती तो कभी बहुत सारे लोग एक साथ हंसते हुए नज़र आते। सबसे अच्छी बात है कि सभी एक दूसरे की बहुत रेस्पेक्ट करते थे। देखिए फिल्म में जितनी भी एक्ट्रेस हैं सभी ने अपना रास्ता खुद बनाया है। हर एक ने अपनी अलग आईडेंटी बनाई है। 

इस फिल्म के लिए आपने किस तरह की तैयारी की?

इस फिल्म के लिए निर्देशक जगन शक्ती ने मुझे बहुत कुछ पढ़ने के लिए दिया था जैसे साएंटिफिक टर्म आदी। हम एक्टर्स ज्यादा क्रिएटिव होते हैं और (हंसते हुए) मेरा तो साइंस समझने वाला दिमाग है ही नहीं। लेकिन फिल्म में एक साइंटिस्ट जो साइंस से पूरी तरह वाकिफ है और जो भी बोल रहा है वो उसके लिए कैज़ुअल है,  का किरदार निभाने लिए मुझे साइन्स से जुड़ी भाषा समझनी पड़ी। इसके अलावा जगन की एक बहन हैं जो इसरो में काम करती हैं, मैं उनसे भी जाकर मिली थी क्योंकि मैं ये समझना चाहती थी कि एक महिला जो कि साइंटिस्ट भी हैं, वो घर पर जाकर कैसे अपनी जिम्मेदारियों को देखती है। काम तो हम सभी कर रहे हैं लेकिन एक महिला का साइंटिस्ट बनना भी बड़ी बात है। मैं समझना चाहती थी कि एक तरफ आपके सामने एक नेशनल मिशन है जिसपर दुनिया की नज़र है और दूसरी तरफ घर पर कोई बीमार है तो वो कैसे मैनेज करती है।

 

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