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फिल्म में हमने हर किसी का व्यू पॉइंट दिखाया है- जॉन अब्राहम

गृहलक्ष्मी टीम (मुम्बई ब्यूरो)

13th August 2019

जॉन अब्राहम की फिल्म बाटला हाउस 15 अगस्त को रिलीज़ हो रही है और इस फिल्म को प्रमोट करने के लिए जॉन अब्राहम हाल ही में हमारे मुम्बई ब्यूरो की टीम से बातचीत की और फिल्म के बारे में दिल खोलकर बातें की-

फिल्म में हमने हर किसी का व्यू पॉइंट दिखाया है- जॉन अब्राहम
ये फिल्म करने का मन आपने कैसे बनाया?
संजीव कुमार यादव के किरदार के लिए निर्देशक ने मुझे स्क्रिप्ट दिया और कहा कि पढ़ो और मैंने इस पढ़ा मुझे ये बहुत अच्छा लगा। ये पूरी तरह से फैक्फिट्रस पर बेस्ड था और मुझे लगा कि ये कहानी पर्दे पर आनी चाहिए।  देखिए सच हमेशा कहानियों से ज्यादा रोमांचक होता है। मैंने निखिल से कहा कि इसे तुम ही डायरेक्ट करो और मैंने ये भी कहा कि मैं इस फिल्म के बनने में सहयोग करना चाहता हूं क्योंकि अभी तक मेरे प्रोडक्शन में जो भी फिल्में बनी हैं जैसे विकी डोनर, मद्रास कैफे, परमाणु और मुझे लगा इसमें बाटला हाउस भी होनी चाहिए। फिल्म संजीव के रोल के लिए मेरा लुक भी सही है।
 
रियल लाइफ कहानियों के साथ इस बात का ध्यान भी रखना पड़ता है कि किसी को तकलीफ न पहुंचे।इस बारे में आप क्या करते हैं?
इस तरह की फिल्मों में आप क्रिएटिव लिबर्टी ले सकते हैं। लेकिन इस फिल्म में मैं किसी तरह की क्रिएटिव लिबर्टी नहीं लेना चाहती। बाटला हाउस के बाद संजीव के साथ क्या बीती। मैं उनके साथ कई दिन साथ रहा। मैंने संदीव के किरदार के साथ कोई भी एक्सपेरिमेंट नहीं की है। लेकिन फिल्म को थोड़ा एंटरटेनिंग भी बनाना पड़ा क्योंकि कोई भी डोक्यूमेंट नहीं देखना चाहेगा।
 
आपको डर नहीं लगता है कि कहीं आप जजमेंटल न हो जाएं क्योंकि इस कहानी का पहले बहुत राजनीतिकरण हो चुका है?
हमने इसमें कोर्ट, राजनेता, मीडिया, पुलिस सबके व्यू को दिखाया है और जब दर्शक हॉल से बाहर निकलेंगे तो वो समझ सकेंगे या सोच सकेंगे कि क्या हुआ होगा या कैसे हुआ होगा। हमने वो चीज़ें भी दिखाई हैं जो उस समय पॉलिटिक्स में इस मुद्दे को लेकर हो रहा था। और डरना क्या था। ये एंकाउंटर बहुत गंदे तरीके से पॉलिटिक्स किया गया था। हमलोग जज नहीं कर रहे हैं, हमने ये काम लोगों के लिए छोड़ दिया है। 
 
ये फिल्म स्वतंत्रता दिवस पर आ रही है...बड़े होते हुए इस दिन की क्या अहमियत थी आपके सामने?
जब मैं छोटा था तो हमेशा इस दिन बड़ा सा झंडा हाथ में लेकर फहराना चाहता था। मैं हमेशा अपनी मां से कहता भी था कि मेरा मन है कि मैं खूब बड़ा झंडा खरीद कर लाउं, लेकिन उन दिनों इस बात की इज़ाजत नहीं दी थी। बचपन में मैं स्वतंत्रता दिवस के दिन सुबह उठना और स्कूल जाकर  झंडा फहराना मुझे अच्छी तरह याद है। हालांकि स्कूल में उस वक्त काफी सांस्क़तिक कार्यक्रम भी होते थे, लेकिन मेरा दिमाग इस बात पर रहता था कि मैं फुटबॉल खेलने जाउं कयोंकि उस दिन छुट्टी होती थी।
 

 

 

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