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कृष्ण की जीवन लीला से जानें रिश्तों का महत्व और उन्हें निभाने की कला

यशोधरा वीरोदय

23rd August 2019

कृष्ण ने धरती लोक पर अपने जीवनकाल में अपने सभी रिश्तों को निर्वाह करते हुए मानवीय सम्बंधो के लिए आदर्श स्थापित किए थें।

कृष्ण की जीवन लीला से जानें रिश्तों का महत्व और उन्हें निभाने की कला

एक आम धारणा है कि एक स्त्री और एक पुरूष कभी मित्र नहीं बन सकते हैं, उनके बीच रक्त और परिणय संबंध के अलावा कोई दूसरा संबंध या भाव नहीं हो सकता है। लेकिन इस आम धारणा से अलग सदियों पहले श्री कृष्ण और द्रौपदी के बीच सखा भाव ने संबंधो की अलग परिभाषा गढ़ी थी। जैसा कि हम सब जानते हैं कि द्वारकाधीश श्री कृष्ण और पाण्डवो की धर्म पत्नी द्रौपदी के बीच सखा और मित्रवतसंबंध थें। वैसे श्रीकृष्ण ने सिर्फ मित्रता बल्कि धरती लोक पर अपने जीवनकाल में हर संबंधो और रिश्तो का निर्वाह पूरी श्रद्धा से किया था। ऐसे में कृष्ण के जीवन और रिश्तों के प्रति उनके समर्पण भाव से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। जी हां, हम अपने इस लेख हम आपको इसी बारे में बता रहे हैं कि कैसे आप कृष्ण से रिश्तों का महत्व और उन्हे निभाने की कला सीख सकते हैं। 

 द्रौपदी के सखा 

वैसे तो द्रौपदी पांच पाण्डवो की धर्मपत्नी थीं, ऐसे में उनके जीवन में पांच पुरूषों की छाया थी, पर इनसे सबसे अधिक किसी पुरूष के साथ उनकी निकटता थी, तो वे थें कृष्ण। श्री कृष्ण और द्रौपदी के बीच सखावत संबंध और भाव रहे थें। इस रिश्ते की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तो जहां उनके पांचो पति मौन धारण किए हुए थें, वहीं द्रौपदी के एक विनती पर कान्हा ने उनकी सुन ली और उनकी लाज बचाई थी। 
ऐसे में ये संबंध अपने आप आदर्श है, क्योंकि आज के आधुनिक समय में भी जहां स्त्री-पुरूष की मित्रता पर सवाल उठाए जाते हैं, ऐसे में उस प्राचीन समय में द्रौपदी और कृष्ण के बीच की मित्रता मानवीय संबंधो का एक आदर्श रूप प्रस्तुत करती है। 

 सुदामा के सच्चे मित्र

सुदामा और कृष्ण की मित्रता बेहद लोकप्रिय है, कि कैसे अपनी बचपन के मित्रता को ना सिर्फ श्री कृष्ण ने युवास्था तक याद रखा बल्कि सुदामा की गरीबी और उनकी विवशता को बिना कहे ही समझ गएं और उसका निवारण भी किया। सुदामा के साथ कृष्ण की मित्रता आज भी मित्रता के मिसाल के रूप में जानी जाती है।

सुभद्रा के प्रिय भाई

जी हां, कृष्ण एक अच्छे भाई भी थें, जो कि अपनी प्रिय बहन सुभद्रा की खुशी के लिए किसी भी हद को पार करने के लिए तत्पर थें। इसका उदाहरण सुभद्रा और अर्जुन के विवाह से मिलता है। जैसा कि पौराणिक मान्यताओं की मानें तो कृष्ण के सहयोग से ही सुभद्रा और अर्जुन का प्रेमविवाह सम्भव हुआ था। कृष्ण को जब ये पता चला कि सुभद्रा और अर्जुन एक-दूसरे को पसंद करते हैं, तो उन्होने स्वयं अर्जुन को सुभद्रा को भगा ले जाने की योजना बताई और इस प्रयास में कृष्ण को अपने बड़े भाई बलराम का प्रतिरोध भी झेलना पड़ा था। 

 राधा के निश्छल प्रेमी और रूकमणी के आदर्श पति

राधा और कृष्ण का प्रेम तो अपने आप में मिसाल है, भले ही दोनो का मिलन ना हो पाया पर आज भी जब आदर्श प्रेम की बात आती है, तो राधाकृष्ण के प्रेम का उदाहरण दिया जाता है। वैसे कृष्ण ने जहां राधा के साथ प्रेम निश्छल भाव से किया था, वहीं उन्होने रूक्मणी और अपनी दूसरी धर्म पत्नियों के साथ परिणय संबंध का भी पूरे आदर्श भाव से निर्वाह किया था। 
इस तरह से कृष्ण ने अपने जीवनकाल में विभिन्न लोगों के साथ अपने रिश्ते को निर्वाह करते हुए मानवीय संबंधो के लिए आदर्श स्थापित किए थें।

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