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सॉफ्ट लैंडिंग

चिरंजीव सिन्हा

19th October 2019

निर्मल के सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। पिता के असमय गुजर जाने के बाद उसके परवरिश की पूरी जिम्मेदारी उसकी मां निरूपा जी के कंधों पर आ गई। दुख के इस भंवर में अचानक घिर आई उनकी जीवन नौका बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गई थी, परंतु निर्मल के उज्जवल भविष्य को देखते हुए अपनी इस टूटी हुई नौका को फिर से जोडऩे में वे पूरे प्राणपन से लग गईं।

सॉफ्ट लैंडिंग

वे खुद तो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन उन्हें शिक्षा का महत्व बखूबी पता था। निर्मल की प्राइमरी शिक्षा तो गांव के सरकारी पाठशाली में पूरी हो गई, लेकिन उसकी आगे की पढ़ाई एक गंभीर चुनौती बनकर खड़ी हो गई क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए उनके गांव में क्या आसपास के गांव में भी कोई अच्छा स्कूल नहीं था। किंतु बेटे को अच्छी शिक्षा दिलाना उनका सपना था। लेकिन सपना देखना एक बात है और उसे जमीन पर उतारना उससे बिल्कुल अलग। एक तो गांव का रूढि़वादी माहौल ऊपर से विधवा बहू की सामाजिक हैसियत एक तिनके से ज्यादा कहां कुछ होती है? फिर भी एक दिन हिम्मत करके वे अपने ससुर से बोली, 'पिताजी मैं निर्मल को पढ़ाने के लिए शहर जाना चाहती हूं। ससुर के साथ-साथ घर के सभी सदस्य इस बात पर चौंक पड़े, 'क्या?

एक तो विधवा दूसरी जवान। क्या यह खतरों से खेलने के समान नहीं था? वे घर के सदस्यों की मनोभावना समझ गई। सबको आश्वस्त करते हुए वे बोलीं, 'आप लोग निश्चिंत रहिए इस घर की इज्जत पर मैं कभी आंच नहीं आने दूंगी। यह बोलते हुए उनकी वाणी इतनी तेजोमय एवं आत्मविश्वास से परिपूर्ण थी कि घर के किसी सदस्य का साहस उन्हें रोक पाने का नहीं हुआ।

उनके एक परिचित पास के शहर में एक प्रतिष्ठित स्कूल में वाचमैन थे। उन्होंने निरूपा जी को उसी स्कूल में आया की नौकरी दिलवा दिया। शहर तो वे आ गई थी और जिंदगी की गाड़ी खींचने के लिए एक नौकरी का जुगाड़ कर अपने सपने को पूरा करन की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ा लिया था। अब उनका अगला लक्ष्य किसी तरह उस स्कूल में निर्मल का दाखिला कराना था। अपने सदव्यवहार के कारण कुछ ही दिनों में वे सभी की प्रिय पात्र बन गई। एक दिन साहस कर उन्होंने प्रिंसिपल सहब से निवेदन किया, 'सर! मेरे बच्चे को भी इस स्कूल में पढऩे की अनुमति दे दीजिए। मैं आपकी हमेशा ऋणी रहूंगी। प्रिंसिपल साहब, 'ठीक है, यदि तुम्हारा बेटा प्रवेश परीक्षा में पास हो जाता है, तो मैं जरूर उसके लिए कुछ न कुछ करूंगा। निर्मल बचपन से मेधावी तो था ही, उसने प्रवेश परीक्षा पास कर लिया और प्रिंसिपल साहब ने भी वादे के अनुसार स्कूल प्रबंधन से कहकर उसे स्कॉलरशिप दिलवा दिया।

इधर निरूपा जी निर्मल की पढ़ाई और परवरिश के लिए रात-दिन एक कर रही थीं। वह दिन के समय स्कूल में आया की नौकरी करती और रात में पड़ोस की दर्जी की दुकान से कपड़े लाकर उसे सिलने का काम करती ताकि कभी भी पैसों की कमी निर्मल की पढ़ाई के आड़े न आने पाए। निर्मल पढ़ाई में होशियार होने के साथ-साथ बहुत

समझदार भी था। वह मां द्वारा उसके भविष्य के लिए किए जा रहे त्याग और तपस्या के मूल्य को भली-भांति समझता था। उसन खूब मन लगाकर पढ़ाई किया और प्रथम प्रयास में ही आईआईटी में प्रवेश प्राप्त कर लिया। इंजनिरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे गुडग़ांव की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में साफ्टवेयर डेवलपर की नौकरी मिल गई। कंपनी की तरफ से उसे एक पॉश सोसाइटी में फ्लैट भी मिल गया। नौकरी पाने के बाद सबसे पहले वह अपनी मां के पास गया। वे अभी तक उसी स्कूल में आया की नौकरी कर रही थी। वह उनसे बोला, 'मां, तुमने अपना धर्म निभा लिया, अब मेरी बारी है। तुम मेरे साथ गुडग़ांव चलो।

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