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धूप की गंध

प्रभात रंजन

12th November 2019

इंसान सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं मरता है, बल्कि जीते जी भी वो दूसरों के लिए तब मर जाता है, जब आपसी संवेदनाएं खत्म हो जाती है। प्रभात रंजन जी की ये लघु कथा का भी कुछ ऐसा ही सार है।

धूप की गंध
कमरे में धूप की भीनी गंध भरी रहती थी. शाम को जब वह लौटता था धूप की गंध भरी रहती थी. धूप की गंध और धुआं. घर उसे घर की तरह लग ही नहीं रहा था. वैसे घर, घर रह भी नहीं गया था. लेकिन क्या करे लौटते वक्त हमेशा घर की ही याद आती है न. और कुछ हो न हो रहने को घर तो रह ही जाता है।
असल में, बचपन से ही उसको धूप की गंध मृत्यु की गंध लगती थी. छोटा था जब दादाजी की मृत्यु हो गयी थी. दिसंबर की एक कुहरीली सुबह उन्होंने कहा कि आज उनका मन गांव के पश्चिम किनारे बहने वाली नदी के किनारे जाने का हो रहा है. कुछ देर बाद दिल का दौरा पड़ा और उनकी आत्मा पश्चिम चली गई।उनका अंतिम संस्कार उसी नदी के किनारे किया गया था, आग और धुएं के बीच उसने उनको राख होते देखा था. सब कहते, उनको मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था।
12 दिनों तक रोज उनके कमरे में सुबह-शाम धूप जलाई जाती थी. तभी से उसको धूप की भीनी गंध कभी अच्छी लगी ही नहीं. उसको उसमें मृत्यु की नामालूम उदासी महसूस होने लगती थी। धूप की गंध आते ही उसको सबसे पहले मृत्यु की ही याद आती थी। मंदिरों में, पूजा में धूप की गंध आते ही उसको लगता था जैसे किसी की मौत हो गई हो। शायद साथ रहते-रहते रिश्ते भी मरने लगते हैं.
वह घर में अकेला रहना चाहता था, अपने साथ, अपने उस कमरे में जो 12 साल बाद अचानक खाली हो गया था. उसने चाहा नहीं था. किसी ने चाहा नहीं था. खाली हो गया था. जिंदगी में वही-वही होता रहे जो हम चाहते हों तो जिंदगी, जिंदगी नहीं रह जाती. थोड़ी बोरिंग हो जाती है न।
सुनयना ने एक दिन उसको अचानक एक कागज़ दिया और कहा साइन कर दो। वह वकील का बनाया हुआ अदालतनामा था. लिखा कि वे दोनों अपनी मर्जी से तलाक लेना चाहते हैं. उसने कहा तो था पहले इस बारे में, लेकिन सच में पेपर्स तैयार करवा लेगी सोचा न था।
उसने सुनयना की आंखों में देखा. उसमें कुछ भी नहीं दिख रहा था. पिछले कुछ महीनों से जब भी उसकी आंखों में देखता था उसको कुछ अपना लगता ही नहीं था. देखते-देखते उसकी आंखों से मेरी पहचान गायब होती रही और मैं समझ भी नहीं पाया. शायद उसको आंखों में देखना मैंने छोड़ दिया था. मैंने कुछ भी देखना छोड़ दिया था! अचानक ऐसा क्या होता है कि बरसों की पहचान जैसे खो जाती है. सपने धीरे-धीरे मरने लगते हैं.
और प्यार?
उसका तो अहसास ही तब होता है जब वह बाकी नहीं रह जाता है. 
उसने खिड़की खोल दी. शायद धूप की गंध कुछ बाहर निकले. धूप का धुआं भरता जा रहा था. बारह बरस में कितना कुछ अंदर जमा हो गया था, कितना जमा हो जाता है जो इस तरह से अलग-अलग होने से बाहर निकल जाता है. पीछे के फ़्लैट में खन्ना अंकल अचानक गुजर गए थे. एक दिन सुबह उठकर दूध लेने जा रहा था तो सोसाइटी के सिक्योरिटी गार्ड ने बताया था- खन्ना साहब नहीं रहे!
उसी दिन शाम से धूप की गंध उसके कमरे में भरने लगी थी. सुबह को भी भरती होगी लेकिन वह गुड़गांव के अपने ऑफिस के लिए बहुत जल्दी निकल जाता था. वह ऑफिस में ही था जब सुनयना ने उसको मैसेज किया था- चाभी गेट पर है ले लेना. अब मैं नहीं आउंगी. मैंने घर ले लिया है, ऑफिस के पास ही. अगले महीने 26 तारीख को पहली डेट है. वकील ने कहा है कि 6 महीने बाद दूसरी डेट पड़ेगी फिर हम अलग हो जाएंगे. हां, वकील की फीस 40 हजार है, 20 तुम दे देना.
‘घर कहां लिया?' उसने जवाबी मैसेज में पूछा था. कोई जवाब नहीं आया था. उस दिन शाम जब वह घर में घुसा तो उसको धूप की गंध बहुत तीखी महसूस हुई थी.
जब कोई मर जाता है तो अचानक वह हमारे जीवन से चला जाता है, बस स्मृतियों में रह जाने के लिए. कभी न लौट कर आने के लिए. लेकिन पुनर्जन्म की एक उम्मीद रह जाती ही कभी-कभी.
याद आया. गांव में दयाशंकर के बेटे को सांप ने काट लिया था. 9-10 साल का था. घर के पीछे बाड़ी में अमरुद के पेड़ से अमरुद तोड़ने जा रहा था कि नीचे कहीं से आकर करैत सांप ने काट लिया. उसकी मां को एक साधू बाबा ने 11 दिन तक करने के लिए एक पूजा बताई थी. जिसके करने से उसका बेटा जीवित हो जायेगा- जो अकाल मरता है वह अकाल जी भी जाता है. वह एक महीने तक नियमित पूजा करती रही. करती रही. कुछ नहीं.
स्मृतियों में भी कितना कुछ बचता है, कुछ बचा है क्या? शायद यही बच जाना पुनर्जन्म होता हो.
उसने याद किया तो अपने दादा की अब उसको धुंधली-धुंधली सी याद रह गई थी. मसलन, उनकी घनी मूंछें तो याद आ रही थी लेकिन चेहरा नहीं, हां, सर पर लगी गांधी टोपी अक्सर उसकी स्मृतियों में कौंध जाती थी. खिड़की खोलने का कोई फायदा नहीं हुआ था. धूप की गंध कमरे में और बढती जा रही थी. और धुआं भी. उसने खिड़की बंद कर कर ली और दूसरी तरफ की बालकनी का दरवाजा खोल लिया. शायद पीछे से आती धूप की गंध आगे के दरवाजे से निकल जाए. वह जिंदगी के धुएं से मुक्ति चाहता था. और उस गंध से.
जब कोई मर जाता है तो शुरू-शुरू में कुछ दिन तक लगता रहता है कि क्या पता वह वापस आ जाए. इसीलिए कहते हैं कि सुबह शाम घर में धूप जलाकर जाने वाली की आत्मा को यह याद दिलाया जाता है कि मोह माया के बंधन से वह आजाद हो चुके हैं. अब जाएं. अपनी संततियों को मंगल आशीष दें..जाएं.
कहते हैं आत्मा भटकती रहती है 12 दिनों तक अपने वास में.
कुछ नहीं हुआ था. क्या सचमुच कुछ नहीं हुआ था.
एक दिन सुनयना ने उससे पूछा था- प्यार? तुमको नहीं लगता है कि अब हमारे बीच प्यार नहीं रह गया है. वह पढ़ते पढ़ते रुक गया था- ओरहन पामुक का उपन्यास ‘म्यूजियम ऑफ़ इन्नोसेंस' उसने एक तरफ रख दिया था और बिस्तर पर दूसरी तरफ बैठी सुनयना के पास जाकर उसको चूमना चाहा था.
‘किस तो उसको करते हैं न जिसको प्यार करते हैं.'
उसने कहा था- क्या है घर है. क्या नहीं है.
उसने कहा - प्यार!
उसने ध्यान दिया था कि सुनयना अपना फोन हमेशा अपने पास रखने लगी थी. न जाने किससे चैट करती रहती थी.
वह अपना जीवन उससे नहीं बांटती थी. अकेलापन बढ़ता जा रहा था. वह अपने फोन के सहारे काट रही थी, भुवन अलग-अलग सालों के पुस्तक मेलों में खरीदी गयी किताबों को पढ़-पढ़ कर.
वह शाम को जल्दी आ जाता था. सुनयना अक्सर देर रात. दोनों अपने अपने हिस्से का खाना माइक्रोवेव में गरम कर लेते थे. बनाने का काम मेड का था. साथ रहने जैसा साथ नहीं रह गया था. तब सुनयना ने पहली बार पूछा था- कुछ दिन अलग रह कर देख लें.
उसने कुछ कहा नहीं था. दूसरे कमरे में चला गया. जहां वह था उसके किताबों की दुनिया थी.
सच में उसने अपने जीवन को ढाल लिया था. दिन भर गुड़गांव के एक पब्लिशिंग हाउस में काम, रात को किताबों की दुनिया. रोज सोचता था. बैकलॉग ख़त्म हो तो सुनयना के साथ रोज सुबह उठकर चाय पिएगा. रात में डिनर, सप्ताह में कम से कम एक बार तो बाहर जाएगा. सेक्टर 18 में हर महीने एक नया रेस्तरां खुल जाता है.
बैकलॉग कभी ख़त्म नहीं होता था.
जब पीछे का ही ख़त्म नहीं हो रहा था तो आगे का क्या शुरू होता.
उसने बरसों पुरानी प्रेमिका को एक दिन ईमेल कर दिया था- कैसी हो?
सब ठीक?- उसने जवाब में पूछा था.
ठीक- उसने जवाब दिया था.
सब क्या कहेंगे- उसने जवाब में कहा था. सुनयना से उस दिन दूसरी बार कहा था- अलग रहकर देख लें.
कोई कुछ नहीं कहेगा. यही तो अच्छी बात है यहां की, कोई कुछ नहीं पूछता, कुछ नहीं कहता. सबका अपना बढ़ता जा रहा है, दूसरा कम होता जा रहा है. जो पूछने वाले हैं उनको मैंने बता दिया है कि बैंगलोर जा रही हूं. छह महीने के लिए. तब तक सब समझ जायेंगे. कोर्ट में डायवोर्स भी हो जायेगा. जाने के बाद उसने मेल में लिखा था.
मुझे तुम्हारे सरनेम से मुक्ति मिल जाएगी. देखो, मुझे तुमसे कुछ नहीं लेना है. एक सरनेम है तुम्हारा वापस कर दूंगी. छह महीने में.
जाते समय एक बार गले मिलकर तो जा सकती थी.
उस रात अब्सोल्युट का वोदका पीते हुए वह सेंटी हो गया था. सेंटी होने का टाइम नहीं था. जब सब कुछ ख़त्म होने लगता है तो जो ख़त्म हो रहा होता है उससे ज्यादा जरूरी होता है उसको बचाना जो बच जाता है.
धूप की गंध से उसके होने को न होने में बदला जाता है.
वह जानता था अब जीवन में आगे बढ़ना था. जो पीछे छूट गया था उसके बारे में सोचने का कोई अर्थ नहीं रह गया था. जिस जीवन को सार्थक बनाने के लिए हम बहुत मेहनत करते हैं, परिश्रम करते हैं अचानक निरर्थक बन जाता है. वही इसी अहसास से बचना चाहता था लेकिन धूप की गंध उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी. उसके मन में बचपन से यह बात बैठी हुई थी- धूप की गंध मृत्यु की गंध होती है! हारकर वह पीछे बालकनी में चला गया!

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