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जानिए रोगों के निदान की आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति पंचकर्म के बारे में

अनुज श्रीवास्तव

13th November 2019

पंचकर्म आयुर्वेद की एक प्रभावी चिकित्सा पद्घति है, जिसके माध्यम से शरीर में व्याप्त व्याधियों को दूर किया जाता है। पंचकर्म चिकित्सा क्या है व कैसे इसके माध्यम से रोगों का निदान होता है, जानते हैं लेख से।

जानिए रोगों के निदान की आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति पंचकर्म के बारे में
आयुर्वेद रोग निवारण की एक प्राचीन पद्धति है जिसके माध्यम से विभिन्न रोगों का उपचार किया जाता है। आयुर्वेद में ही पंचकर्म चिकित्सा का वर्णन है। इस चिकित्सा विधि में पांच कर्मों अथार्त वमन, विरेचन, बस्ति, रक्तमोक्षण, और नस्य के माध्यम से रोगों का निदान किया जाता है।

क्या है पंचकर्म चिकित्सा पद्धति? 

शरीर की शुद्घि की प्राचीन आयुर्वेदिक पद्घति है पंचकर्म। आयुर्वेद के अनुसार, चिकित्सा के दो प्रकार होते हैं- शोधन चिकित्सा एवं शमन चिकित्सा। जिन रोगों से मुक्ति औषधियों द्वारा संभव नहीं होती, उन रोगों के कारक दोषों को शरीर से बाहर कर देने की पद्धति शोधन कहलाती है। यही शोधन चिकित्सा पंचकर्म है। आयुर्वेद के अनुसार पंचकर्म थेरेपी से शरीर में मौजूद टॉक्सिन निकल जाते हैं। यह पद्धति दीर्घकालिक रोगों से मुक्ति दिलाने में काफी लाभकारी साबित होती है। पंचकर्म विधि से शरीर को विषैले तत्त्वों से मुक्त बनाया जाता है। इससे शरीर की सभी शिराओं की सफाई हो जाती है और शरीर के सभी सिस्टम ठीक से काम करने लगते हैं।

किस प्रकार की जाती है चिकित्सा? 

वमन- पंचकर्म चिकित्सा के पहले चरण में वमन क्रिया का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में मुंह के माध्यम से उल्टी कराई जाती है। उल्टी निकाल कर दोषों को बाहर निकाला जाता है। यह प्रक्रिया तब तक करना चाहिए जब तक कि शरीर के विषाक्त पदार्थ तरल रूप धारण ना कर लें। इसके बाद आपको उल्टी होने वाली दवा के माध्यम से आपके टिश्यू से विषाक्त पदार्थ को बाहर निकाल दिया जाता है। जो लोग कफ की समस्या से परेशान हैं, उनके लिए यह विधि सबसे उत्कृष्ट है। इसके अलावा यह अस्थमा और मोटापा के लिए भी सहायक है।
विरेचन- इसके बाद मलत्याग की प्रक्रिया है। इस पद्धति में आंत से विषाक्त पदार्थ को निकाला जाता है। इसके बाद आपके शरीर पर तेल लगाया जाता है, इस पद्धति में जड़ी-बूटी खिला कर शरीर से आंत के माध्यम से विषाक्त पदार्थ बाहर निकाला जाता है। जो लोग पित्त की समस्या से पीडि़त हैं, उनके लिए यह पद्धति बहुत 
कारगर है।
नस्य- इस प्रक्रिया में आपके नाक के माध्यम से औषधि दी जाती है, जो आपके नाक, गले और सिर से विषाक्त 
पदार्थ को बाहर निकालता है। इस प्रक्रिया में सिर और कंधों पर मालिश की जाती है, जिसके बाद आप नस्य पंचकर्म के लिए तैयार हो जाते हैं। इसके बाद आपके नाक के माध्यम से औषधि की कुछ बूंदें डाली जाती हैं। यह माइग्रेन, सिरदर्द और बालों की समस्या से निजात दिलाती है।
बस्ति- इस पद्धति के अन्दर शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने के लिए कुछ तरल पदार्थों का उपयोग किया जाता है जिसमें तेल,घी और दूध जैसे तरल पदार्थ आपके मल द्वार में पहुंचाए जाते हैं। यह पुरानीबीमारियों को ठीक करने के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है। यह अत्यधिक वात से परेशान मरीजों के लिए उपयोगी माना जाता है। हालांकि, यह तीनों- वात, पित्त और कफ के लिए अच्छा माना जाता है।
रक्तमोक्षण- इस चरणआपके शरीर के खराब खून को शुद्ध किया जाता है। इस प्रक्रिया में मुहांसे और चेहरे की 
समस्या से राहत मिलती है। इसमें शरीर के किसी विशेष हिस्से या पूरे शरीर से रक्त को साफ किया जाता है। 

पंचकर्म चिकित्सा के लाभ

  • शरीर पुष्ट व बलवान होता है। 
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
  • शरीर की क्रियाओं का संतुलन पुन: लौट आता है।
  • रक्त शुद्घि से त्वचा कांतिमय होती है। 
  • इंद्रियों और मन को शांति मिलती है। 
  • दीर्घायु प्राप्त होती है और बुढ़ापा देर से आता है।
  • रक्त संचार बढ़ता है।
  • मानसिक तनाव में कारगर है।
  • अतिरिक्त चर्बी को हटाकर वजन कम करता है।
  • आर्थराइटिस, मधुमेह, तनाव, गठिया, लकवा आदि रोगों में राहत मिलती है।
  • स्मरण शक्ति बढ़ती है।

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