आज है उत्पन्ना एकादशी, जानिए इसका महत्व और पूजा विधि

यशोधरा वीरोदय

22nd November 2019

एकादशी व्रत का पुण्य कन्यादान और हजारों वर्षों की तपस्या से भी अधिक होता है

आज है उत्पन्ना एकादशी, जानिए इसका महत्व और पूजा विधि
सनातन धर्म में एकादशी के व्रत का विशेष महत्व माना जाता है, इसे सभी व्रत में श्रेष्ठ माना जाता है। मान्यता है कि इसे करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। वैसे तो हर माह में एकादशी का व्रत और पूजा की जाती है, पर इसकी शुरूआत मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी से होती है, जिसे उत्पन्ना एकादशी के रूप में जाना जाता है। इस बार यह 22 नवंबर यानि कि आज है। ऐसे में आप भी आज ये व्रत और पूजा कर इसका लाभ पा सकते हैं। चलिए आपको उत्पन्ना एकादशी का पौराणिक महत्व और इसकी सही पूजा विधि बताते हैं।

पौराणिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,एकादशी एक देवी है जिनका जन्म भगवान विष्णु के अंश से मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ था। दरअसल, पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय में भगवान विष्णु और मुर नामक राक्षस का युद्ध चल रहा था, युद्ध के दौरान जब भगवान विष्णु थक गए तो वो बद्रीकाश्रम में गुफा में जाकर विश्राम करने चले लगे, ऐसे में मुर राक्षस विष्णु जी का पीछा करता हुए बद्रीकाश्रम पहुंच गया और वहां निद्रा में लीन भगवान को उसने मारना चाहा तभी विष्णु जी के अंश से एक देवी प्रकट‍ हुई, जिन्होने मुर का तुरंत वध कर दिया। ऐसे में इससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन देवी को आर्शीवाद देते हुए कहा कि आपका जन्म कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ है इसलिए आपका नाम एकादशी होगा। इस दिन मेरे साथ आपकी पूजा करने वाले व्यक्ति की सभी इच्छाएं पूरी होंगी और वो पापों से मुक्त हो जाएगा। 

एकादशी व्रत पूजन विधि

जो लोग उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखते हैं, उन्हें व्रत से पहले वाली रात यानी दशमी की रात में भी भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिए। फिर एकादशी के दिन सूर्योदय से पहले उठें, स्नान ध्यान करके व्रत का संकल्प लें। आप चाहें तो निर्जल व्रत रख सकते हैं या अगर आप सम्भव ना हो तो फलाहार लेकर व्रत रखें। इसके साथ ही पूरे दिन मन-वचन और कर्म से कोई हिंसा ना करें। इसके बाद शाम को पुष्प, अक्षत और दीप-नैवेद्य के साथ विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा करें। 

एकादशी व्रत का महत्व

पुराणों और धर्मशास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत का पुण्य कन्यादान और हजारों वर्षों की तपस्या से भी अधिक होता है। 

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