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भारतीय संस्कृति के कई रंग दिखाती मकर संक्रांति

हनुमान प्रसाद उत्तम

4th January 2020

भारतीय संस्कृति के कई रंग दिखाती मकर संक्रांति
हिन्दू धर्म संस्कृति में वर्ष का आरंभ ही होता है मकर संक्रांति जैसे बड़े पर्व से जिसकी केंद्र में है सूर्य की आराधना। इस दिन दान और स्नान का भी विशेष महत्त्व है। आराध्य देव सूर्य काल भेद से अनेक रूप धारण करते हैं। वे ही मार्गशीर्ष (अगहन) में मित्र, पौष में सनातन विष्णु, माघ में वरूण, फाल्गुन में सूर्य, चैत्र मास में भानु, बैशाख में तापन, ज्येष्ठ में इंद्र, आषाढ़ में रवि, श्रावण में गरस्ति, भाद्रपद में यम, आश्विन में हिरण्यरेता।इस भांति बारह महीनों में भगवान सूर्य बारह नामों से संबोधित किए जाते हैं।

सूर्य का मकर राशि में प्रवेश- 

बारह स्वरूप धारण कर आराध्य देव सूर्य बारह मासों में बारह राशियों मेष, वृष,मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक,धनु, मकर, कुंभ और मीन का संक्रमण करते हैं। उनके संक्रमण से ही संक्रांति होती है। संक्रांति को सूर्य की गति का प्रतीक तथा सामथ्र्य माना गया है। सूर्य का सामथ्र्य सात देवी मन्दा, मंदाकिनी, ध्वांक्षी, घोरा, मंदोदरी,राक्षसी और मिश्राता के नाम सेजानी जाती हैं।
 
विभिन्न राशियों में सूर्य के प्रवेश को विभिन्न नाम से जाना जाता है-
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार 12 राशियां होती हैं। धनु,मिथुन, मीन तथा कन्या राशि की संक्रांति'षड्शीतिÓ कही जाती है और वृष, वृश्चिक,कुंभ व सिंह राशि पर जो सूर्य की संक्रांति होती है, उसे 'विष्णुपदीÓ कहते है। जब मेष तथा तुला राशि में सूर्य जाता है तो विषुवत संक्रांति के नाम से जाना जाता है। कर्क संक्रांति को 'यामायन और मकर संक्रांति को संक्रांति कहते हैं जो जनवरी में आता है। पुराणों के अनुसार षडशीति (धनु, मिथुन,
मीन और कन्या राशि की संक्रांति को षडशीति कहते हैं। संक्रांति में किए गए पुण्यकर्म का फल छियासी हजार गुना,विष्णुपदी में लाख गुना और उत्तरायण या दक्षिणायन प्रारम्भ होने के दिन कोटि-कोटि गुना ज्यादा होता है। समस्त संक्रांतियों मेंमकर संक्रांति का विशेष महत्त्व है क्योंकि तब सूर्य देव उत्तरायण में होते हैं। शायद उत्तरायण की इस महत्ता के कारण हीमहाभारत में कौरव-पांडव युद्ध के दौरान भीष्म पितामह घायल होकर बाणों की शय्या पर लेटे हुए अपनी मृत्यु का इंतजार कर रहे थे। भीष्म ने मकर संक्रांति अर्थात् उत्तरायण की स्थिति आने पर ही माघ शुक्ल अष्टमी आस्था सूर्य का मकर राशि में प्रवेश मकर संक्रांति के रूप में पूरे भारत में मनाया जाता है। इस दिन स्नान, दान और सूर्य की उपासना का विशेष महत्त्व है। सूर्य ऊर्जा और ओजस्विता का प्रतीक माना जाता है।
विद्वानों ने इस काल को शुभ बताते हुए उसे देवदान कहा है। सूर्य के उत्तरायण की महत्ता को छांदोग्योपनिषद में भी कहा गया है। जब पौष तथा माघ माह में सूर्य मकर राशि में आ जाता है तब उस दिन और उस समय को संक्रांति का प्रवेश काल कहा जाता है। यही संक्रांति मकर संक्रांति के नाम से जानी जाती है अंग्रेजी महीनों में यह प्रतिवर्ष चौदह जनवरी को ही मनाया जाता है। भारतीय ज्योतिष में मकर राशि का प्रतिरूप घडिय़ाल को माना जाता है, जिसका सिर हिरण जैसा होता है लेकिन पाश्चात्य ज्योतिर्विद मकर राशि का प्रतिरूप बकरी को मानते हैं। हिन्दू धर्म में मकर (घडिय़ाल)को एक पवित्र जीव माना जाता है।
मकर संक्रांति के दिन सूर्य की कक्षा में हुएबदलाव को अंधकार से प्रकाश की तरफ हुआ बदलाव माना जाता है। मकर संक्रांति से ही दिन के समय में बढ़ोत्तरी होती है। इसलिए भारतीय ज्योतिष की गणनानुसार मकर संक्रांति ही बड़ा दिन है। इस दिन सूर्य
दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रस्थान करता है और कांपते, ठिठुरते शीत पर धूप की विजय यात्रा आरम्भ होती है। इस भांति प्रकाश में बढ़ोत्तरी होती है। लोगों को कामकाज के लिए अधिक समय मिलने लगता है। इसी पर एक कहावत प्रसिद्घ हैबहुरा के दिन लहुरा, खिचड़ी से दिन जेठ यानी भादों कृष्ण पक्ष चौथ (बहुरा चौथ) से दिन छोटा होने लगता है तथा मकर संक्रांति से दिन बड़ा होने लगता है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को पूरे भारतवर्ष में त्योहार के रूप में मनाते हैं।

मकर संक्रांति के विविध रूप-

यह त्योहार पूरे भारतवर्ष में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे खिचड़ी पर्व कहते हैं। मकर संक्रांति के मौके पर गंगा-यमुना या पवित्र सरोवरों, नदियों में स्नान कर तिल-गुड़ के लड्डïू एवं खिचड़ी देने और खाने की रीति रही है।लड़की वाले अपनी कन्या के ससुराल में मकर संक्रांति पर मिठाई, रेवड़ी, गजक तथा वस्त्रादि भेजते हैं। उत्तर भारत में नववधू को पहली संक्रांति पर मायके से वस्त्र, मीठा
तथा बर्तन आदि भेजने का रिवाज है। 
गुजरात में संक्रांति के दिन तिल गुड़ खाने की परंपरा है साथ ही पतंगबाजी भी यहां खूब प्रचलित है। पतंग उड़ाना भी शुभ मानते हैं। गुजरात में प्रति वर्ष इस समय पतंग उत्सव का भी आयोजन किया जाता है।
पंजाब और जम्मू में इस पर्व को लोहड़ी के नाम से जाना जाता है। एक किंवदंती के अनुसार इस दिन पापी कंस ने बाल गोपाल कृष्ण का वध करने के लिए लोहिता नामक राक्षसी को मथुरा भेजा था जिसे कृष्ण ने खेल ही खेल में मार डाला, कदाचित तभी से लोहित का अपभ्रंश लोहड़ी प्रसिद्घ हो गया। पंजाब में हंसी-खुशी तथा उल्लास का विशिष्ट त्योहार लोहड़ी, मकर संक्रांति की पूर्व संध्या को मनाया जाता है। इस दिन लकडिय़ां एकत्र कर आग लगाई जाती है। आग के चारों तरफ नाचते-गाते उल्लास मनाते हुए तिलों तथा मक्का के खिलों से अग्निपूजन किया जाता है। पंजाबी परिवारों में नववधू अथवा नव शिशु की प्रथम लोहड़ी को खास समारोह के रूप में मनाया जाता है।
असम में भोगाली बिहू तो तमिल लोग इसे 'पोंगलÓ के रूप में मनाते हैं। सुख सम्पत्ति तथा संतान की कामना हेतु मनाया जाने वाला तमिलनाडु का त्योहार पोंगल मकर संक्रांति का ही प्रतीक है। लोगों के सांस्कृतिक जीवन के साथ पारंपरिक रूप से जुड़ा पोंगल ही एक ऐसा त्योहार है जिसे मद्रास या चेन्नई (तमिलनाडु) के सभी वर्ग के लोग धूमधाम से मनाते हैं।
उड़ीसा और बंगाल में इसे बिशु कहते हैं तो उत्तराखंड में घुघुतिया या पुसूडिया के नाम से जाना जाता है। सूर्य को कृषि का देवता कहा जाता है। वनस्पतियां तथा प्राणी-सृष्टि सूर्य से ही पैदा हुई है तथा उसी से पालित हो रही है। इष्टदेव सूर्य संसार का भला करने के लिए अपनी रश्मियों से धरा के सोमरस रूपी पानी को ग्रहणकर तृप्तिदायक मेघ तथा धारण कर पानी की वर्षा से सभी प्रकार के अन्न में ताकत प्रदत्त करते हैं। अणुओं की ताकत सूर्य की रश्मियों से अन्न में आती है। सूर्य में वह ताकत उसके अणुओं के टूटने से पैदा होती है तथा सूर्य की रश्मियों द्वारा अन्न के अणुओं में पहुंचती है। मकर संक्रांति को सूर्य की उपासना करके कृषक गण आराध्यदेव आदित्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। 

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