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क्यों मनातें लोहड़ी का त्यौहार, जानिए इसके पीछे की कहानी

यशोधरा वीरोदय

11th January 2020

सुंदर मुंदरिए और दुल्ला भट्टी के लोकगीतों से सजा और पौराणिक कथाओं के ताने बाने से बुना लोहड़ी का त्योहार देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। चलिए आपको लोहड़ी मनाने के पीछे की प्रचलित कथा के बारे में बताते हैं।

क्यों मनातें लोहड़ी का त्यौहार, जानिए इसके पीछे की कहानी
बसंत ऋतु के आगमन के साथ ही लोहड़ी की मस्ती में हर कोई रंग जाता है। लोहड़ी एक पंजाबी लोक महोत्सव है, जिसकी तैयारियां कई दिन पहले से ही शुरू कर दी जाती हैं। इस त्योहार को सर्दियों के जाने और बसंत के आगमन के संकेत के रूप में देखा जाता है। दरअसल यह पर्व रबी की फसल की बुनाई और कटाई से भी जुड़ा हुआ है। किसान इस दिन रबी की फसल जैसे मक्का, तिल, गेहूं, सरसों, चना आदि को अग्नि को समर्पित करते हैं और भगवान का आभार प्रकट करते हैं। इसके बाद लोग अलाव के चारों ओर घेरा बनाकर गीत गाते और खुशी से झूमते-नाचते नजर आते हैं। अग्नि को शीश झुकाते हैं और कहते हैं, 'आदर आए दलिदर जाए अर्थात् गरीबी दूर हो और घर मे खुशियां और सुख समृद्धी आए।

लोहड़ी से संबधित लोक कथा

वैसे तो लोहड़ी के साथ अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं। लेकिन दुल्ला भट्टी की कथा का खास महत्त्व है। कहते हैं, दुल्ला नाम का एक शख्स गरीबों का मददगार हुआ करता था। कहा जाता है कि पंजाब में संदलबार में लड़कियों को गुलामी के लिए अमीरों को बेचा जाता था। जब दुल्ले को इस बारे में पता चला तो उसने एक योजना के तहत लड़कियों को आजाद करवाया व उनकी शादी भी करवाई। इसी वजह से उसे पंजाब के नायक की भी उपाधि दी गई। उसने एक गांव की ही दो कन्याओं को अपनी बेटियां बनाकर उनका विवाह कराकर उनका कन्यादान भी किया। उनके विवाह के समय दुल्ले के पास शक्कर के अलावा कुछ भी नहीं था तो उसने सेर भर शक्कर देकर उन्हें विदा किया था। आज कल लोहड़ी उत्सव का आधुनिकीकरण हो गया है। पहले लोग उपहार देने के लिए गजक और तिल इस्तेमाल करते थे। मगर अब 'शहरों में लोगों ने चॉकलेट केक और चॉकलेट गजक उपहार देना शुरू कर दिया है। इसके अलावा वातावरण में बढ़ रहे प्रदूषण के कारण, लोग लोहड़ी मनाते समय पर्यावरण संरक्षण और इसकी सुरक्षा के बारे में अत्यधिक जागरूक और बहुत सचेत है। वे लोहड़ी पर अलाव जलाने के लिये पेड़ काटने के बजाए वृक्षारोपण करने की कोशिश करते हैं।
घर के बाहर एक खुले स्थान पर बहुत सारी लकडिय़ों और उपलों से एक बहुत बड़ा ढ़ेर बनाया जाता है, जिसमें अग्नि प्रज्जवलित करके तिल, गुड़, मक्के के दाने और मूंगफली को अग्नि को भेंट किया जाता है। इसके अलावा अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करके ईश्वर से सुख समृद्घि की कामना की जाती है। इसके बाद सभी लोग एक दूसरे को लोहड़ी की शुभकामनाएं देते हैं और प्रसाद के रूप में मूंगफली, रेवड़ी, गजक, और मक्के के दानों का आनंद उठाते हैं। इस दिन पंजाब में अधिकतर घरों में गन्ने के रस की खीर, सरसों का साग व मक्के की रोटी बनाना शगुन के तौर पर अच्छा समझा जाता है। पंजाबियों के अलावा बाकी समुदायों के लोग भी पवित्र अग्नि में दूध और पानी समर्पित करके भगवान सूर्य का नमस्कार करते हैं और उनका आर्शीवाद लेते हैं। त्योहार के कुछ दिन पहले से ही लकडिय़ां इक्कठी करनी शुरू कर दी जाती हैं, जिन्हें नगर के बीचोंबीच किसी खुले स्थान पर रखा जाता है। लोहड़ी की रात सभी लोग अलाव के आसपास बैठते हैं और पारंपरिक गीत गाते हैं। इसके अलावा नवविवाहित जोड़े अग्नि के इर्द गिर्द चक्कर काटते हैं और अग्नि देवता को प्रणाम करके उनका आर्शीवाद लेते हैं। लोहड़ी की शाम पूरा परिवार इस उत्सव में शामिल होता है। उसके बाद रिश्तेदारों को बधाई देने का सिलसिला भी चलता है। हालांकि अब बधाई के साथ अब तिल के लड्डू, मिठाई, सूखे मेवे आदि देने का रिवाज भी चल पड़ा है फिर भी रेवड़ी और मूंगफली का विशेष महत्त्व बना हुआ है। इसीलिए कई किलो रेवड़ी और मूंगफली पहले से ही खरीद कर रख दी जाती है। साथ ही बड़े-बुजुर्गों के चरण छूकर सभी लोग बधाई के गीत गाते हुए खुशी के इस जश्न में शामिल होते हैं।

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