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डिजिटल युग में बिगड़ते बच्चे

दीपाली किरन

14th January 2020

आजकल के बदलते परिवेश में टेक्नोलॉजी जीवन का एक अभिन्न अंग बनता जा रहा है। जाने-अनजाने हम सभी इसकी गिरफ्त में आ गए हैं। आजकल के बच्चे अपने प्रश्नों का उत्तर ढूंढऩे के लिए किताबें खंगालने की बजाय गूगल का सहारा लेते हैं। ऐसे में टेक्नोलॉजी का ये दौर बच्चों के मानसिक विकास के लिए प्रश्नचिह्न बनता जा रहा है।

डिजिटल युग में  बिगड़ते बच्चे
डिजिटल युग में पैरेंटिंग की परिभाषा बदल गई है। समय के अभाव के चलते अभिभावक बच्चों को समय नहीं दे पा रहे। परिवार संयुक्त से एकल हो गए हैं। एकांकी परिवार, शहरों की भाग-दौड़ भरी जि़ंदगी, ऐसे माहौल में पति-पत्नी, बच्चे और अपार्टमेंट तक ही सिमट गई है। समाजिकता का स्तर दिन पर दिन गिरता जा रहा है, अब लोग अपने काम से काम रखने में ज्यादा विश्वास रखते हैं, जिसकी वजह से कहीं न कहीं बच्चों की परवरिश प्रभावित हो रही है। छोटे शहरों में अभी भी संयुक्त परिवार देखने को मिल जाते हैं, जिसमें घर के बुजुर्ग, बच्चों पर नजर रखते हैं और उनकी छत्र-छाया में बच्चों की परवरिश बहुत आसान हो जाती है। लेकिन बड़े शहरों में व्यक्तिवादिता के बढऩे के कारण ऐसी परवरिश नहीं हो पाती। फिर अभिभावक तलाशते हैं परवरिश ऑनलाइन टिप्स। तरह-तरह के पैरेंङ्क्षटग ब्लॉग्स, गूगल के सहारे अभिभावक अपने बच्चों को पालने की जद्दोजहद में जुटे हुए हैं। ऐसे में अगर आप भी शहरी जिंदगी में सिमट चुके हैं तो बच्चों की परवरिश के लिए आपको भी कुछ बातों का ख्याल रखना बेहद जरूरी है।
आज के युग को डिजिटल युग भी कहा जाता है।दरअसल, यह ऐसा समय है जिसमें बेहद छोटी उम्र से ही बच्चों के हाथ में मोबाइल थमा दिया जा रहा है और जब उनकी खेलने-कूदने की उम्र आती है तो वे पूरा दिन सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं। आजकल ज्यादातर घरों में अभिभावक बच्चों को व्यस्त रखने के लिए या खाना खिलाते वक्त उनके सामने यूट्यूब वीडियोज और गेम्स खोलकर रख देते हैं ताकि वे इनमें व्यस्त रहें, लेकिन इस बात की गंभीरता को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे न सिर्फ बच्चों की आंखें खराब हो रही है बल्कि व्यवहार में खासा नकारात्मक बदलाव आ रहा है। आजकल छोटे-छोटे बच्चे आसानी से मोबाइल एप्स, गेम्स चला रहे हैं और 8-10 साल के कई बच्चे आपको सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय मिल जाएंगे, अगर आपके बच्चे भी सोशल मीडिया और गूगल के शिकंजे मे फंसते जा रहे हैं तो उन पर किसी भी प्रकार की बंदिश लगाने की बजाय कुछ सावधानियां आजमाएं। इस विषय पर 'जीवनधारा रिहेब्लिटेशन एंड रिसर्च  इंस्टिट्यूट  बरेली से फिजियोलॉजिस्ट मानसी सिंह राठौड़ आपके लिए कुछ ऐसे टिप्स लेकर आई हैं जो आपको अपनी परवरिश में शामिल करने की जरूरत है।

सोशल मीडिया पर नज़र

सबसे पहले आपको ये ध्यान रखना होगा कि क्या आपका बच्चा उस उम्र में पहुंच चुका है, जिसमें वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर सके? क्योंकि छोटी उम्र के बच्चे अक्सर सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर गलत कदम उठा लेते हैं या आपराधिक विचारधारा के बन जाते हैं और यदि वो सोशल मीडिया के इस्तेमाल के योग्य हो चुका है तो अपने बच्चे से सोशल मीडिया को लेकर बातचीत करें। उससे उसके ऑनलाइन अनुभव के बारे में जानकारी लें। बच्चों को कभी भी अकेले में सोशल मीडिया पर सक्रिय न रहने दें और न ही अकेले में ज्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल करने दें, क्योंकि उत्सुकतावश आपका बच्चा सर्च इंजन के जरिए न जाने किस खतरे को आमंत्रण दे सकता है।
बच्चों को ऑनलाइन गेम्स के खतरों के बारे में जानकारी दें और एक समय निर्धारित करें ताकि आपके बच्चे को ऑनलाइन गेम खेलने की लत न लगे। अगर आप चाहें तो 
लैपटॉप और कंप्यूटर में सॢवलांस सॉफ्टवेयर लगा सकते हैं, जिससे आप इस बात को जान सकेंगे कि आपके बच्चे क्या सर्च कर रहे हैं।

योगा मेडिटेशन

बच्चों में योगा की आदत डालें ताकि आज की भाग-दौड भरी जि़ंदगी में जूझने के लिए तैयार रहें। इससे उनमें एकाग्रता आएगी। सूर्य नमस्कार करने के लिए प्रेरित करें।संस्कार-आजकल के ज्यादातर अभिभावक के लिए परवरिश का अर्थ केवल अपने बच्चों की खाने-पीने, पहनने-ओढऩे और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना है। इस तरह से वे अपनी जि़म्मेदारियों से तो मुक्त हो जाते हैं पर कहीं न कहीं उनमेें संस्कार डालना भूल जाते हैं या फिर यूं कहें उन्हें मालूम ही नहीं है बच्चों को संस्कारी कैसे बनाया जाए। 
बच्चों को बड़ों का आदर करना सिखाएं, दूसरों की मदद करना, विनम्रता जैसे संस्कार, जिनसे वे आत्मनिर्भर और जिम्मेदार बन सकें। डायरी लिखने की आदत एकल परिवार की वजह से बच्चे अपने मन की बात जल्दी नहीं कह पाते जिससे उनमें कुंठा उत्पन्न हो जाती है, इसलिये उनको दिन भर की बातें डायरी में लिखने के लिए प्रेरित करें और अपने बच्चे से दोस्ती करें ताकि वो आपको ही सारी बातें बताए।

मोबाइल से दूरी

बच्चों को व्यस्त रखने के अलग-अलग तरीके अपनाएं। आजकल बाजार में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए तरह-तरह के किट आते हैं, जिससे बच्चों का मानसिक विकास तो होगा ही साथ ही साथ आपका बच्चा मोबाइल से दूर रहेगा। बड़े बच्चों को आउटडोर इनडोर गेम्स खेलने के लिए प्रोत्साहित करिए, जिससे उनके शरीर और 
मस्तिष्क दोनों का ही विकास होगा और उनमें एक नई ऊर्जा आएगी।

क्वॉलिटी टाइम बिताएं

वर्किंग पैरेंट्स के साथ यह समस्या होती है कि उनके पास अपने बच्चों के साथ बिताने के लिए समय नहीं मिल पाता। ऐसे माता-पिता अपने वीकएंड्स अपने बच्चों के लिए ही रखें और सामान्य दिनों में भी उनके क्रियाकलापों पर ध्यान दें उनसे बातचीत करें कि वे क्या करते हैं, उनके दोस्त कौन हैं।

किताबों मे रूचि

मॉरल एजुकेशन वाली बहुत सी किताबें बाजार में उपलब्ध हैं। बच्चों को ऐसी किताबें लाकर दें ताकि उनका ध्यान टीवी, कंप्यूटर और लैपटॉप की ओर कम जाए और उनमें नैतिकता का विकास हो।
आधुनिक अभिभावक की सोच है कि मेरा बच्चा, किसी भी स्थिति में किसी से कम न हो और बस इसी भागदौड़ में लगे रहते हैं। बच्चों को सुविधा तो दीजिए, पर ध्यान रहे वो उसका दुरूपयोग न करे।

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