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कहानी रुक्कू

उदय प्रकाश

27th January 2020

उदय प्रकाश वर्तमान में देश के उन लोकप्रिय साहित्यकारों में से एक हैं, जिनकी रचनाएं आम पाठक वर्ग से लेकर साहित्य प्रेमियों के बीच चर्चा में रहती हैं। इस बार हम गृहलक्ष्मी के पाठकों के लिए उदय प्रकाश की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक से लेकर आए हैं बेहद रोचक कहानी रुक्कू।

कहानी रुक्कू
हालांकि वह कोई घर नहीं था। वह विश्वविद्यालय के विवाहित छात्रों के हॉस्टल का एक ‘वन रूम सेट' था, जिसमें मैं उस लड़की के साथ रहता था, जो कुछ ही अर्सा पहले मेरी पत्नी बनी थी। मैं भी उसका पति बन जाने के कारण उस ‘मैरीडमैन्स हॉस्टल' में उसके साथ रहता था।
लेकिन फिर भी उस हॉस्टल के कमरे को हम अपना ‘घर' ही कहते थे। वह ‘घर' ग्राउंड फ्लोर पर था और उसका नंबर था ००३। यह नंबर हमारे घर का पता था। चिट्ठियाँ, मनीऑर्डर और लोग, इसी पते के ज़रिये हमारे घर तक पहुँचते थे। माया इसी पते पर हमारे घर का काम करने आती थी। बरतन, झाड़ू, पोंछा, कपड़े। उसके साथ रुक्कू होता था। उसका दो-ढाई साल का बेटा। माया सुंदर थी, मेहनती और ख़ुश मिजाज़। मैं और मेरी पत्नी माया को माया ही कहते थे। बाई या कुछ और नहीं। माया जब बाथरूम में कपड़े साफ कर रही होती या रसोई घर में बरतन, तो रुक्कू मेरी टाँगों के साथ चिपक कर खड़ा हो जाता था। उसे सिक्के चाहिये होते थे। सिक्के मांगने का उसका यही तरीका था। माया ने सिखा रखा होगा, कई बार मैं ऐसा सोचता।
लेकिन एक दिन माया ने उसे ज़ोरों से डाँटा - ‘किसने सिखा दिया, भिखमंगे? लौटा बाबूजी के पैसे!'माया ने ख़ुद रुक्कू के हाथ से सिक्के छीन कर मेरी मेज़ पर रख दिये। मैं सहम गया। अगर मैं सिक्कों की जगह नोट देता तो क्या माया तब भी लौटाती? लेकिन मैं परेशान हो गया था। कहीं वह मुझे ग़लत तो नहीं समझ रही है? मैं तो रुक्कू को सिक्के यों ही देता था। बस यों ही। इसमें माया बीच में कहीं नहीं थी। यह मेरे और रुक्कू के बीच बनते अदृशय संबंधों की बात थी। एक तो ऐसा करना मुझे अच्छा लगता था और यह भी कि शायद माया इन सिक्कों से उसे बाद में कुछ टॉफी वगैरह खिला देगी। एक दिन मैं रुक्कू के हाथ में सौ रूपये रखूँगा और देखूँगा कि माया क्या करती है, मैंने सोचा। 
लेकिन मैं बहुत अच्छी आर्थिक हालत में नहीं था, और सौ रूपये का ऐसा जुआ नहीं खेल सकता था। कहीं माया ने ले ही लिये तो? ..अगर ऐसा हुआ तो क्या सोच कर वह लेगी? उसके सोचने के अनुमान से ही मैं घबरा जाता। ...लेकिन एक दूसरी संभावना भी तो थी। अगर कहीं माया ने रूपये लौटा दिये तो? यह अनुमान ही मेरे लिये डरावना था। इसका मतलब, मेरे बारे में क्या-क्या सोचती होगी वह। मैं तनाव में घिरने लगा। कोई अन्य, किसी और के बारे में, अपने आप ऐसा क्यों सोच लेता है? जब कि ऐसा तो कुछ भी नहीं है, मेरे भीतर। दूर-दूर तक। मैं परेशान हो जाता।
वह मई-जून का महीना था। माया उस दिन देर से आयी थी और बाथरूम में कपड़े साफ कर रही थी। मैं एक ऐसी किताब पढ़ रहा था, जिसमें एक घर का ज़िक्र था, जिसमें सिर्फ़ खिड़कियों और रोशनदान से ही हो कर आया-जाया जा सकता था। इसलिए, उस किताब के अनुसार उस घर में जो भी आ कर रहने लगता था, वह कुछ समय के बाद चुपचाप किसी चिड़िया में बादल जाता था। अब उस घर में बहुत सारी चिड़ियाँ इकट्ठी हो गयी थीं। पूरे घर में उनकी फड़फड़ाहट, आवाज़ें और हलचल भर गयी थीं। …और उस घर का जो भी बाशिंदा चिड़िया बन जाता था, धीरे-धीरे वह शहर में दिखाई देना कम हो जाता और लोग उसे भूलने लगते। उसकी उपस्थिति शहर में कम होने लगती। लोग उसके बारे में अगर कभी कोई बात भी करते तो कुछ इस तरह जैसे वे किसी बहुत पुरानी चीज़, जो अब कहीं नहीं है, के बारे में बात कर रहे हों। या जैसे किसी पुराने जहाज़ के बारे में, जो पिछली सदियों में समुद्र में कहीं डूब गया था, जिसमें उनमें से किसी के पूर्वज भी थे। या या अपने किसी उस घर के बारे में जिसे वे वर्षों पहले गाँव में, छोड़ आये थे, जो मिट्टी का बना था और अब उनकी स्मृति में धूल और अंधेरे के पार कहीं डूब रहा था। उस घर को देखने वे कार में अब भी अपने बड़े होते बच्चों के साथ कभी-कभी जाया करते थे।
पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा कि मेरे दिमाग़ के भीतर भी चिड़ियों की आवाज़ें, हलचल और उनके पंखों से पैदा होने वाली ख़ुशी भर गयी है। ख़ुशी और उसके साथ एक हल्की-सी उदासी भी। ठीक-ठीक कहें तो विरक्ति। मैं अगर ठीक उस पल बोलने की कोशिश करता तो निश्चित ही मेरे गले से किसी उदास मैना या थके हुए कौए की आवाज़ निकलती। या शायद एक ऐसे अकेले धनेश की, जो अब लगभग विलुप्त हो गया है।मैं रात में सोता तो तकिये के भीतर मुझे चिड़ियों के नन्हें-नन्हें छौनों की आवाज़ें सुनाई देतीं। जैसे वे अंडे के सफ़ेद खोल के भीतर से, उस अदृशय अंधेरे में से बोल रहे हों, जहाँ उनके चारों ओर एक कोई रहस्य द्रव की तरह उन्हें घेरे हुए है। और उस तरल रहस्य के पार जीवन जैसा कोई एक दूसरा रहस्य बीच-बीच में कौंधता है। मैं सोचता - वे छौने कहाँ से बोल रहे हैं? मेरे तकिये के खोल के कपास से? मेरे मस्तिष्क के भीतर के अंधकार और नींद से? या सचमुच किसी उस अदृश्य अंडे के भीतर से, जो फिलहाल भविष्य में कहीं रखा है। धीरे-धीरे किसी एक दिन फूटने के लिये अपने आप गर्म होता हुआ। 
तभी, इसी पल, मेरे घुटनों को जैसे किसी चिड़िया के पंख ने छुआ। वह रुक्कू था। चुपचाप मेरी ओर ताकता हुआ। उसे पैसे चाहिये थे। वह मेरी मेज़ के नीचे मेरे घुटनों से सट कर खड़ा था।मैंने देखा उसकी आँखें सचमुच किसी चिड़िया की आँखों जैसी थीं। बाद में, बड़ा होने पर, बच्चे ये आँखें कहाँ खो देते हैं? मुझे एक हिन्दी के प्रोफेसर का चेहरा याद आया। उसकी आँखें अपने आप कभी किसी बाज और कभी किसी लोमड़ी जैसी दिखने लगती थीं। वह  लगातार बोलता रहता था और संसार की हर सुंदरता, उत्कृष्टता और नैतिकता से घृणा करता था।
उस दिन मेरी मेज़ पर ख़ूब सारे चिल्लर थे। खुदरा पैसे। मैंने सारे सिक्के अपनी मुट्ठी में समेट कर रुक्कू की जेब में भर दिये। एक बेतहाशा ख़ुशी, जिस ख़ुशी की उम्र रुक्कू के बराबर ही थी, उसे अपने होठों को भींच कर भरसक अपने भीतर रोकता हुआ वह धीरे-धीरे पीछे खिसक रहा था। मुझे किसी प्रसन्न चिड़िया की मिचमिची शर्मीली आँख से देखता हुआ।अचानक उसने 'क्रीं... क्रीं... क्रीं...' की आवाज़ निकाली और हँसा। कौन-सी चिड़िया है यह? शायद गौरैया, या पहाड़ी मैना। मैंने सोचा। फिर मुझे डर लगा कि कहीं माया आज फिर ना उसकी जेब से पैसे निकाल कर मेरी मेज़ पर वापस रख दे।कहीं वह मुझे बाज तो नहीं समझती? जब कि सच यह था कि मैं ख़ुद बाजों से अपनी जान बचाता फिरता था।मुझे पान खाना था। पान मैंने बचपन से ही खाना सीख लिया था। इसलिए मैं उठ कर बाहर चला आया। यूनिवर्सिटी के गेट के ठीक बगल में पूरन की पान की दूकान थी।
काफी देर बाद, जब कि मैं पूरन के साथ उसकी गुमटी में, बात करने में लगा हुआ था, दूर से माया आती हुई दिखी। उसके साथ-साथ रुक्कू भी चल रहा था। दोनों पूरन की गुमटी की ओर ही आ रहे थे। उसी ओर जहाँ मैं था। मुझे डर लगा। शायद मेरे पास आकर माया मेरे सारे सिक्के वापस करेगी। सुलगती हुई आँखों से मुझे देखती हुई। रुक्कू की शर्ट की जेब में हाथ डाल कर जोर-जोर से बोलती हुई। पूरन क्या सोचेगा, मेरे बारे में? जब कि ऐसी कोई बात ही नहीं थी दूर-दूर तक। स्त्रियाँ बहुत रहस्यपूर्ण होती हैं। वे कुछ भी सोच सकती हैं। उनके सोचने के बारे में कई किताबें लाइब्रेरी में थीं, जिन्हें पढ़ने के बारे में मैं अक्सर सोचा करता था।
मैंने पहली बार जाना कि मैं दूसरों के सोचने से, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बहुत डरता हूँ। अक्सर वे ऐसा कुछ सोचते हैं, जिसके अनुमान से ही मैं परेशान हो जाता हूँ। लेकिन वे ऐसा सोचते क्यों है? शायद ऐसा सोचने की आदत उन्हें उनका समय या उनका अपना जीवन देता होगा। लेकिन मैं अक्सर सोचता कि क्या उनके दिमाग़ के भीतर कोई चिड़िया नहीं रहती?
माया ने आते हुए मुस्कुरा कर मुझे देखा। यह एक बिल्कुल आकस्मिक और अप्रत्याशित घटना थी। मैंने देखा कि रुक्कू मुझे देखकर कुछ-कुछ शरमा रहा है। वह मुझसे आँख मिलाने से कतरा रहा था।
'चिड़िया' ...मैंने सोचा। बहुत तेज इच्छा हुई कि मैं 'क्रीं... क्रीं... क्रीं...' की आवाज़ अपने गले से निकालूँ और उड़ जाऊँ। तब पता चलेगा लोगों को कि मैं असल में हूँ कौन, और मुझे मारना इसीलिए कितना कठिन है। इतने वर्षों बाद अब तो उन्हें अपना प्रयत्न छोड़ देना चाहिये।
मैं यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि मैं उड़ सकता हूँ। ईश्वर के अलावा यह रहस्य मैंने सबसे छिपा रखा है। ख़ास तौर पर, जब मैं अपनी मेज़ पर बैठा हुआ कोई किताब पढ़ रहा या सफेद कागज़ पर कुछ लिख रहा होता हूँ, तब मैं अक्सर उड़ने लगता हूँ। सबसे आँख बचा कर।
मुझे यह सोचकर ही ज़ोरों की हँसी आई कि किसी को यह तक पता नहीं कि मैं अपने घर में दरवाज़े से नहीं, रोशनदान या खिड़की के रास्ते अंदर आया-जाया करता हूँ।
...और रात में तो मैं शायद ही कभी अपने बिस्तर पर मिलूँ। जैसे ही नींद आई, कि फिर बस... मैं उड़ा। बहुत देर तक उड़ा करता हूँ मैं रात में। यह भी किसी को नहीं पता। यही सारी वजहें हैं कि लोग मुझे मार नहीं पाते। वरना तो आप जानते ही हैं कि आज के वक्त में किसी का जी पाना, वह भी चिड़िया बन कर, वह भी भारत की राजधानी दिल्ली में, कितना कठिन है।
लेकिन रुकिये, एक यह सच्चाई आप जान लें कि यह सत्य सिर्फ़ चिड़िया जानती है कि किसी शहर में कितने शिकारी और कितने हत्यारे रहते हैं। उनके घर, दफ्तर या बंगले कहाँ-कहाँ हैं। जिन कारों पर वे चलते हैं उनके नंबर क्या हैं। उनके फोन नंबर क्या हैं। ...और यह भी कि आप अगर अपने शहर में किसी दूसरी चिड़िया का पता जानना चाहते हैं, तो वह आपको सिर्फ़ कोई चिड़िया ही दे सकती है। लेकिन समस्या यह है कि दूसरी चिड़िया का पता आपको तब तक नहीं मिल सकेगा, जब तक यह अच्छी तरह सिद्ध ना हो जाए कि आप बाज या हत्यारे नहीं हैं। (ऐसा लिखने के लिये क्षमा करें, लेकिन क्या करें किसी भी चिड़िया के लिये, यह संसार के इतिहास का सबसे संदिग्ध और हिंस्र समय है।)
माया पूरन की दुकान से रुक्कू के लिये, उसकी जेब से पैसे निकाल कर, टॉफियाँ खरीद रही थी। वे वही सिक्के थे, जो मैंने उसकी जेब में भर दिये थे।
...इसका मतलब ...तो ...माया ने पैसे ले लिये!!
उसने मुस्कुरा कर मेरी ओर देखा और बस स्टॉप की ओर बढ़ गयी। रुक्कू टॉफी खाता हुआ मुझसे आँख मिलाने से बच रहा था। लेकिन मुस्कुरा रहा था।
उसकी वह मुस्कान सिर्फ़ मेरे लिये ही थी। एक तरह से लजाता हुआ 'धन्यवाद'। और माया जिस तरह से रुक्कू के साथ जोर-जोर से बोलती हुई जा रही थी, उस बोलने में तो कुछ ऐसा लगातार था, जो वह सिर्फ़ मुझ तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रही थी। लेकिन उसे क्या इसका पता था कि ऐसा करते हुए वह मुझे कितनी अच्छी लग रही थी। उस पल मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि माया को पता चल गया है कि मैं दरअसल एक पक्षी हूँ। जहाँ तक मेरा सवाल है, तो मैं तो यह पहले से ही जानता था कि माया और कुछ नहीं, एक चिड़िया है। सबसे डरती हुई और सबसे बचती हुई। वह धीरे-धीरे गेट के बाहर मेरी आँख से ओझल हो गयी।
फिलहाल माया के अच्छा लगने को मैं पूरन से छिपा रहा था। क्योंकि वह मुझे भेदती हुई आँखों से घूर रहा था। मेरे भीतर एक बेचैनी पैदा होने लगी। मैंने आपसे कहा था न कि मैं दूसरों के सोचने से डरता हूँ। वे आख़िर ऐसा क्यों सोचते हैं?
मैंने अपने दोनों हाथ पान की दुकान के तख़्ते पर टिकाये, आगे की ओर झुका और पूरन के चेहरे के करीब होता हुआ फुसफुसाया - 'क्या तुम्हारे दिमाग़ के भीतर कोई चिड़िया नहीं रहती?' यह सवाल मैंने बहुत गुस्से और सख़्ती के साथ पूछा था।
'...हो ...हो ...हो...' करके पूरन हँसने लगा। उसके दांत कत्थे में रंगे थे। वह बहुत अच्छा और प्यारा-सा आदमी था। वह मुझ पर पूरा भरोसा करता था और मुझे ख़ूब उधार देता था। मैंने साफ-साफ सुना, पूरन के हँसने में से 'क्रीं... क्रीं' की बहुत मद्धिम-सी आवाज़ बीच-बीच में कहीं छुपती हुई कांप रही थी। बहुत ही गोपनीय तरीके से अपने होने को प्रगट करती हुई।
ओह तो वह भी पक्षी ही है। मैंने लंबी सांस ली क्योंकि अब मैंने पूरन का रहस्य जान लिया था और मैं बहुत ख़ुश था। (आप नहीं जानते कि जब कोई चिड़िया किसी दूसरी चिड़िया को खोज निकालती है, तो वह कितना प्रसन्न और निश्चिंत होती है।) इसका मतलब, पूरन मुझे दरअसल ठीक-ठीक पहचानने के लिये ही अब तक घूर रहा था। मैं बेफ़िक्र हो गया।)
मैंने मुस्कुराकर उसे देखा और ज़ोरों से 'क्रीं...क्रीं' की आवाज़ अपने गले से निकाली।
और ठीक इसी पल वह घटना घटी।
मेरी यह आवाज़ अचानक एक बहुत डरावने, चीख़ते-दहाड़ते यांत्रिक विस्फोट में डूब गयी। यह भयावह शोर उधर हुआ था, जिधर गेट था और अभी कुछ ही पल पहले माया रक्कू के साथ जिधर गयी थी।
मैंने देखा, पूरन अपनी दूकान से कूद कर उसी तरफ भागा। फिर मैंने देखा चारों तरफ से लोग उसी तरफ भाग रहे हैं। मैं भी दौड़ा। मेरे दिमाग़ के भीतर एक ऐसा डर पैदा हो गया था, जिसमें एक गूंजता हुआ सन्नाटा भरा होता है। ऐसा सन्नाटा सिर्फ़ उस चिड़िया के दिमाग़ में पैदा होता है, जो किसी बंदूक की गोली से बच जाने के ऐन पल पर, धमाके के ठीक आख़िरी छोर पर उड़ा करती है। उसके पंख सिर्फ़ इसलिए हवा में खुलते और बंद होते हैं क्योंकि वे यह पता लगाना चाहते हैं कि क्या अभी भी उनमें जीवन शेष है? यह उड़ना नहीं होता है, यह जीवन के बचे रह जाने की एक विकल-दारुण खोज होती है।
गेट के बाहर, जहाँ पर बस स्टॉप था, वहाँ बहुत भीड़ थी। और भी लोग आ-आकर उस भीड़ में मिलते जा रहे थे। लोगों का एक दायरा-सा बन गया था। वहाँ हवा में भारी, खरखराती, अमूर्त्त-सी आवाज़ें उठ रही थीं। यह एक किसी समवेत कराह जैसी आवाज़ थी।
वह बस, जिसका रंग लाल था, कुछ आगे खड़ी हुई थी। मुझे लोगों की पीठ के अलावा और कुछ नहीं दिख रहा था। मैं माया को खोज रहा था। वह पता नहीं कहाँ थी? आप एक बात और जान लें कि हर एक चिड़िया की देह में बहने वाले रक्त में जो धुन या लय होती है, वह ठीक उस पल तिड़क कर टूट जाती है, जिस पल किसी एक दूसरी चिड़िया की मृत्यु हुआ करती है।
मेरी देह की शिराओं में बहने वाले रक्त की धुन बिखर गयी थी। वहाँ सिर्फ़ एक निर्वात और सन्नाटा था। मेरे दिमाग़ ने जान लिया था कि अभी-अभी यहाँ कोई न कोई चिड़िया ज़रूर मर गयी है।
माया कहाँ है? मैं बेचैनी और बदहवासी में घिर गया था। लोगों ने अपनी पीठ से एक वृत्ताकार दीवाल बना ली थी, जिसके पार कुछ भी नहीं दिख रहा था। एक अभेद्य, अपारदर्शी, ठोस वृत्ताकार दीवाल।
मैं उधर भागा, जिधर बस स्टॉप था। बस स्टॉप के दो पोलों के बीच की पाइप को पकड़ कर मैं झूल गया और गर्दन उचका कर, मैंने सड़क के बीचों-बीच उस जगह को देखने की कोशिश की, जिसे लोगों की पीठ ने घेर रखा था।
उस जगह पर रुक्कू था। लोगों के बीचों-बीच। चारों तरफ़ से घिरा हुआ। उस वृत्त के ठीक केंद्र में।
उसने अपने दोनों हाथ सड़क पर टेक रखे थे और अपने धड़ को आधा ऊपर उठा रखा था। वह अपनी गर्दन धीरे-धीरे दायें-बायें घुमा कर कुछ देख रहा था। रुक्कू शायद माया को खोज रहा था। उसकी आँखें बिलकुल तटस्थ थी। भावहीन। किसी सपाट पत्थर या खाली कागज़ की तरह। उनमें कहीं कोई विकलता या पीड़ा नहीं थी। एक बिल्कुल सपाट निर्विकार शिशु चेहरा। अबोध। वह कभी दायें, कभी बायें कुछ खोजता हुआ बस देख भर रहा था। लग रहा था, जैसे वह कोई ऐसा रोबो हो या कोई ऐसा बेजान खिलौना, जिसमें चाभी भर देने से उसकी गर्दन दायें और बायें एक निर्धारित गति और दिशा में लगातार तब तक घूमती रहती है, जब तक चाभी या बैटरी ख़त्म नहीं हो जाती।
और उसके ठीक सामने सड़क पर वही टॉफियाँ बिखरी हुईं थी, जो माया ने कुछ ही पल पहले पूरन की दुकान से उसे खरीद कर दी थीं। ...और ठीक उसी जगह उनमें से कुछ सिक्के भी पड़े हुए थे, जो मैंने उसकी जेब में भर दिये थे।
मैंने देखा और मैं जड़ हो गया। रुक्कू के धड़ का आधा हिस्सा, कमर से कुछ ऊपर से लेकर घुटनों तक का हिस्सा, सड़क पर किसी कागज़ की तरह चिपक गया था। ख़ून में लिथड़ा हुआ। उसकी कमर के नीचे अब सिर्फ़ एक भीगा हुआ लाल चीथड़ा बचा था, कोई शरीर नहीं।
रुक्कू की कमर के आसपास सड़क पर, लाल ही नहीं, और भी कई रंग थे। वे उसके शरीर में अब तक कहीं छिपे हुए थे। ऐसे रंग, जो हम सबके शरीर के भीतर जीवन भर अदृश्य छिपे रहते हैं और मृत्यु के साथ अचानक एक दिन बाहर फूट पड़ते हैं।
रुक्कू शायद अपनी माँ, माया की उंगली पकड़ कर उस रेड लाइन सिटी बस में चढ़ रहा होगा और तभी यह बस अचानक चल पड़ी होगी। झटके से रुक्कू की मुट्ठी से माया की उंगली छूट गयी होगी, वह गिरा होगा और ठीक उसी पल उस बस का पिछला पहिया रुक्कू की देह पर से, उसकी कमर के ऊपर से होता हुआ, गुज़र गया होगा।
वह बस एक प्रायवेट बस थी। जल्दी पैसा कमाने की होड़ और प्रतिद्वंद्विता में ऐसी बसें बहुत कम देर के लिये कहीं रुकती थीं और सवारी के चढ़ते ही पूरी रफ़्तार में दौड़ पड़ती थीं। उन्हें दूसरी बसों का पीछा करना होता था और उन्हें पछाड़ना होता था। वे इतनी तेज और सड़क को रौंदती हुई दौड़ती थीं कि पूरे दिन भर शहर में हाहाकार का शोर मचा रहता था। वे शहर भर में किसी उन्माद में दौड़ते पागल वनैले हाथियों की तरह थीं। जो कुछ भी कोमल था, उसे अपने वहशीपन के नीचे रौंदती हुई। यह उन्माद और वहशीपन इन बेजान मशीनों में नहीं था, बल्कि उन हत्यारे दिमाग़ों में था जो उन बसों को शहर में चलाने के लिये ज़िम्मेदार थे।
मुझे विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी से हाल में ही पढ़ी गई एक किताब याद आई, जिसका शीर्षक था 'मैडनेस इन सिविलाइजेशन'। यानी, यह हिंसक उन्माद, दरअसल उस सभ्यता ने पैदा किया था, जिसमें हम सब पक्षी निवास कर रहे थे और अपना जीवन गुज़ार रहे थे।
उस बस का इंजन अभी भी घर्रा रहा था। शायद ड्राइवर ने उसका इग्नीशन स्विच बंद नहीं किया था। उस बस के गले से ऐसी आवाज़ निकल रही थी, जो किसी जंगल में, शिकार को गिरा डालने के बाद, किसी तेंदुए या बाघ के गले में से निकलती है। एक अघाई हुई, लेकिन फिर भी हिंसा, लालसा और अतृप्त वुभुक्षा से भरी हुई एक वनैली-यांत्रिक गुर्राहट।
और तभी, ठीक एक पल के लिये, रुक्कू का चेहरा मेरी दिशा की ओर घूमा। ...और उसने मुझे देखा। एक पल के कुछ हिस्से तक के लिये उसकी आँखें मुझ पर टिकीं। मैं बस स्टॉप के दो खंभों के बीच के पोल को अपनी उंगलियों से पकड़ कर, बहुत कठिनाई से अपने शरीर का बोझ अब तक संभाले हुए था। यह एक मुश्किल संतुलन था, जिसे बनाये रखने में मुझे बहुत शक्ति लगानी पड़ रही थी। रुक्कू से आँख मिलते ही अचानक मुझे लगा जैसे मेरे शरीर की सारी ताकत ख़त्म हो गई हो। रुक्कू का देखना किसी बिजली के झटके की तरह था।
 मेरी उंगलियाँ अचानक ढीली पड़ गईं और मैं नीचे गिर पड़ा।
दस-बारह सांस लेने के बाद में दुबारा उस पोल पर लटकने की शक्ति जुटा पाया। मैंने गर्दन उचका कर उस जगह की ओर फिर से देखा।
रुक्कू अब औंधा हो कर सो गया था। उसका चेहरा सड़क के कोलतार पर औंधा टिका हुआ था।
उस जगह पर बहुत से रंग एक दूसरे के साथ धीरे-धीरे मिल रहे थे। ये वे रंग थे, जो हमारे शरीर के भीतर किसी रहस्य के अंधेरे में जीवन भर छुपे रहते हैं। हम में से कोई उन्हें अपने जीवन भर नहीं जानता। वे ठीक उसी घड़ी कुछ पलों के लिये दिखते हैं, जब मृत्यु आती है। फिर वे सूख जाते हैं। उनका रंग काला या कत्थई या धूसर हो जाता है।
आपने कभी किसी की आँख के ग्लूकोमा का ऑपरेशन कभी देखा है क्या? अगर देखा हो, तो मरीज की आँख से निकाले गये उस नीले रंग के द्रव को भी आपने देखा होगा, जो किसी रहस्यपूर्ण फॉस्फोरस की आभा में धीरे-धीरे, सर्जन की तश्तरी में बुझता हुआ सिर्फ़ कुछ पल के लिये जलता है।
वह नीला रंग जीवन का होता है। जीवन के रहस्यों के असंख्य अदृश्य-अगोचर रंगों में से एक।
रुक्कू के जीवन के सारे रहस्य उस सड़क पर बुझ कर काले और धूसर रंगों में बदल रहे थे।
माया...! माया कहाँ है?
मेरी आँखें माया को खोज रही थीं। रुक्कू की जगह को देख पाने की ताब अब मेरी देह में नहीं बची थी। उस पीठ की दीवाल में माया की पीठ कौन-सी होगी?
तभी मैंने उस लाल रंग की बस की ओर देखा। उसके गले से अब भी वही गुर्राहट निकल रही थी। ...और, वहीं उस बस के पिछले पहिये से टिक कर माया बैठी हुई थी। उसी के टायर का टेक लगा कर। किसी बेजान, पत्थर की मूर्ति की तरह।
वह रो भी नहीं रही थी। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। वह एक पत्थर हो चुकी चिड़िया की देह थी।
बस, उस दिन के बाद से मैंने माया को आज तक, कभी नहीं देखा। वह फिर कभी काम पर नहीं आयी।
उस मई के महीने में माया ने मेरे घर पर कुल मिलाकर ग्यारह दिन काम किया था। झाड़ू, पोंछा, बरतन का काम। उसकी तनख़्वाह के पाँच सौ पचास रुपये अब तक मेरे पास बाकी हैं। माया का पता भी मेरे पास नहीं है कि ये रुपये मैं उसके पास भेज सकूँ।
कई बार सोचता हूँ, इस पैसे से मैं ख़ूब सारी ऐसी नींद की गोलियाँ खरीदूँ, जो उन्माद को कम करती हैं। जो आदमी के स्नायुओं को ढीला करती हैं। जो किसी को भी सुस्त बना कर सुला देती हैं। ख़ूब सारे "ट्रैंक्वेलाइजर्स'। मैं हमेशा ऐसे लोगों के पते चुपचाप इकट्ठा करता रहता हूँ, जिनके उन्माद के बारे में मुझे पता चल जाता है।
लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि माया के ग्यारह दिन के वेतन के बचे हुए पाँच सौ पचास रुपये की गोलियाँ इस सभ्यता को सुलाने के लिये काफी कम पड़ेंगी?

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