पर्दे और पर्दे

चंदर शेखर विकल

28th January 2020

घर में लगे पर्दे तो कमरे की शोभा बढ़ाते हैं पर वहीं अगर मन की आंखों पर पर्दा पड़ा हो तो इंसान चाहकर भी सच्चाई को नहीं देख पाता और वही उसकी सबसे बड़ी भूल होती है।

पर्दे और पर्दे
पर्दे टांगते समय मन मे प्रफुल्लता थी कि नलिन इन्हें देख कर मेरी प्रशंसा के पुल बांध देंगे, लेकिन वो पर्दे खिसका के अंदर यूं चले आए मानो वही पुराने पर्दे हों। सोचा कि शायद कोई भूमिका बना कर कुछ कहेंगे, लेकिन नहीं। कभी-कभी न जाने ऐसे क्यों होता है कि हम किसी की विशेष प्रतिक्रिया अवश्य जानना चाहते हैं। नलिन की ओर से कोई प्रतिक्रिया न देख कर झुंझलाहट सी हुई। मैं स्वयं को रोक नहीं पाई, मैंने पूछ ही लिया, 'आपने नए पर्दों को देखा ही नहीं, जिसने भी देखा है, सबने तारीफ ही की है। 'पर्दे, नलिन ने पर्दों की ओर देखा, मैं मन ही मन पुलकित हो उठी, 'जहां तक पर्दों की बात है तो मैं यही कहूंगा की ये वास्तव में ही बहुत सुंदर हैं और स्टाइलिश है। पर एक कमी है।नलिन ने पहलू बदला। मैं समझ गई, वे अब कोई फिलोसफी झाड़ेंगे।इनमें एक कमी भी है, या यूं कह लो कि आदमी इन पर्दों मे खो कर रह जाता है। बाहर कुछ दिखता ही नहीं। वे अपने अंदाज में बोले।
उनकी बात ने मुझे बींध के रख दिया। मुझे लगा कि मै स्वयं इन्हीं पर्दों को जुटाने में ही उलझी रही। नलिन ठीक कहते हैं। यदि पर्दों से बाहर झांकने का यत्न भी किया तो ठीक से देख नहीं पाई, सब कुछ धुंधला सा ही दिखाई दिया। मैं यथार्थ ही कहां देख पाई। मैंने सतीश के अंदर झांका होता तो धोखा तो न खाती?मेरे परिवार वाले यानि मेरे माता-पिता पुराने विचारों के थे। वे लड़की को घर की चार दीवारी मे ही रखने के ही समर्थक थे। मेरी बड़ी बहन को बी.ए. पास करते ही घर से विदा कर दिया। मेरे बारे मे भी यही करने वाले थेए लेकिन मै इस बात पर अड़ गयी कि मै पहले अपने पाँव पर खड़ी होञूंगीए फिर शादी के बारे मे सोचूँगी। उनकी नसीहतों का मुझ पर कोई असर न हुया। किस्मत अच्छी थी कि कम्प्युटर सीखने के बाद एक अच्छी कंपनी मे नौकरी मिल गयीए लेकिन मिली किसी दूसरे शहर मे। मैंने नौकरी जॉइन करने का निर्णय ले लिया। इस पर पिता जी ने तल्ख होकर कहा- 'बेटी, तुमने अब तक अपनी ही की है, यहां तक कि अपनी मां की भी नहीं सुनी। मुझे पता है कि अब भी तुम पर मेरी किसी बात का असर नहीं होगा। शायद तुम समझती हो कि हम जानबूझ कर तुम्हारे रास्ते मे अटकलें खड़ी कर रहे हैं। यह तुम्हारी भूल है। यह जग इतना सीधा नहीं, जितना तुम समझती हो। यहां मुखौटे पर मुखौटा चढ़ा है। दूसरे चेहरे को पर्दे से बाहर लाना इंसान के अपने वश की बात है।
उस समय मैंने उनकी बात एक कान से सुनी दूसरे से निकाल दी, लेकिन धीरे-धीरे उनके बातें जग के पर्दे पर स्पष्टत: चित्रित होती चली गईं। उस समय तो मै पिता जी की बात की पूरी तरह से कायल हो गई जब सतीश बिना बताए लंदन चला गया। सतीश के साथ मैं प्रेम के हिंडोले झूली थी, हमने साथ-साथ जीने मरने कसमें खाई थी।हमारे शारीरिक सम्बंध भी बने। परिवार वालों को भी बता दिया था कि वे मेरे विवाह की चिंता न करें। कुछ हो-हल्ला मचा कर वे चुप हो कर बैठ गए। सतीश ने लंदन जाने की कभी बात नहीं की। यहां तक कि हवा भी न लगने दी। मैं टूट कर रह गई। काश मैं सतीश के भीतर का चेहरा देख पाती, लेकिन प्रेम के पर्दे से आगे कहां देख पाई मैं। सतीश के जाने के बाद मेरे लिए काम ही सब कुछ रह गया। खाली समय उपन्यास पढऩे में नष्ट कर देती। मैंने आजन्म अविवाहित रहने का निश्चय किया। परिवार शादी के लिए प्रयास 
कर के चुप बैठ गया। लेकिन नलिन जब यहां ट्रान्सफर हो कर आया तो उसके व्यक्तित्व ने मेरे अंतर को झकझोर दिया। वह सतीश की हूबहू कापी लगा। अन्तर केवल इतना था कि उसकी बातें दार्शनिकों जैसी थी और सतीश इसके बिलकुल उलट- खुले स्वभाव वाला। मेरी कंपनी की ओर से ऐसे ट्रान्सफर में फ्लैट की सुविधा थी, सो नलिन को भी एक फ्लैट उपलब्ध करा दिया। नलिन का फ्लैट मेरे फ्लैट से तीसरा था।
एक दिन मुझे पता नहीं, मैं क्यों गुनगुनाने लगी कि सहसा मुझे बाहर पदचाप सुनाई दी। दरवाजा खोला तो सामने नलिन खड़ा था। यकायक मुझे सामने देख कर वह झेंप गया।'जी, कहिए, मैंने पूछा।'आप की आवाज़ मे इतना माधुर्य है कि यहां से गुजरते-गुजरते मेरे पांव स्वत: ही रुक गए 
और अधिक स्पष्ट सुनने को मैं दरवाजे के समीप आ गया।वह बिना किसी भूमिका के बोला। मैं धक से रह गई। सतीश भी तो बिना किसी लाग-लपेट के सीधी बात करता था। अब झेंपने की मेरी बारी थी।'पता नहीं, मैं क्यों गुनगुनाने लगी। सच्चाई मेरे मुंह से निकाल गई। यदि ये गुनगुनाना है तो मैं सृष्टि के निर्माता से निवेदन करूंगा कि ऐसा सुर प्रत्येक मनुष्य को दे। मैं कट कर रह गई।
'अच्छा, मैं चलता हूं।वह जाने के लिए उठने लगा तो मैंने उसे चाय पी कर जाने का अनुरोध किया।यह थी हमारी नाटकीय और अनौपचारिक भेंट। ऑफिस में सब औपचारिक होता है। धीर-धीरे हम प्राय: प्रतिदिन मिलने लगे। मुझे नहीं पता कि ऐसा क्यों होने लगा कि मेरा उससे बात करने को मन करता रहता। दो तीन दिन वह न मिलता तो मैं उसके घर चली जाती। मुझे कभी-कभी यूं लगता कि वह अन्दर ही अंदर किसी बात के लिए जूझ रहा है और एक दर्द सा सिंधु उसके हृदय में हिलोरे ले रहा है, लेकिन 'आह...कभी उसके होठों पर नहीं आई। मैं उसके 
जीवन के बारे में, उस दर्द के बारे में, पूछना चाहती थी, लेकिन साहस न जुटा पाई। हां, एक बार उसकी मां कुछ दिनों के लिए उसके पास आई थी तो बातों ही बातों में उन्होने बताया था कि एक दुर्घटना ने उसका जीवन बदल दिया वरना वह एक हंसता- खिलखिलाता युवक था। 
उस हादसे में वह मरता-मरता बचा था।वे बीमार थे तो एक दिन मैं दवा लेके उनके फ्लैट की ओर जा रही थी। मुझे कुछ बड़बड़ाहट सी महसूस हुई। मैं दबे पांव भीतर गई तो नलिन बुदबुदा रहे थे, 'मेरे जीवित रहना का क्या लाभ? क्यों लोग मेरे जीवन में बुझे दीपक को जलाना चाहते हैं? मैं इस योग्य कहां रहा?
मैं थोड़ा सकपका सी गई। पता नहीं क्या पूछ बैठें। कुछ असहज हो गई।'एक माली पौधा लगाता है। समय आने पर उसमें एक कली अंकुरित होती है। माली रोज़ उसे पानी देता है, सोचता है कि जब कली खिल कर फूल बनेगी तो वह उसे किसी देवी या देवता के चरणों में अर्पण करेगा या उसकी कमाई का एक साधन बनेगा। कली खिलने लगती है, परंतु उसके फूल बनने से पूर्व ही माली यह संसार छोड़ कर चला जाता है। कोई दूसरा देख-भाल करने वाला नहीं। कली फूल बनते-बनते मुरझाने लगती है। शायद भगवान को उस पर दया आ जाती है। पानी बरसता है। कली खिलने लगती है। एक दिन फूल बन जाती है। उसकी इच्छा होती है कि उस पर भी कोई तितली मंडराए और जब तितली मंडराने लगती है तो पता चलता है कि फूल तो बिलकुल खोखला है। तितली उसे छोड़ कर किसी दूसरे के पास चली जाती है तो फूल पर क्या बीतेगी? आप इसे क्या कहेंगी?Ó
'अब आप से कौन बहस करे, मैं हथियार डालती हुई बोली। इतना अवश्य समझ गई कि नलिन ने अपने विगत जीवन के बारे में सब कुछ अप्रत्यक्ष में कह डाला है। मेरा मन कुछ भारी हो गया। चाह कर भी कुछ स्पष्ट न पूछ पाई। उन्हें दवा देकर चली आई।
बात किसी निर्णय पर न पहुंच सकी। नलिन को बातों से पार पाना बहुत कठिन है, लेकिन कोई न कोई निर्णय तो लेना होगा। परिवार वालों ने शादी के लिए दबाव बनाना आरंभ कर दिया था।कुछ समय उपरांत मैंने स्वयं को संयत किया और पर्दे उठा कर मेज पर रख दिये।मैं स्वयं से हारी बैठी थी कि मुझे बाहर पदचाप सुनाई दी। दिल धड़का, शायद नलिन आ रहा है। तभी दरवाजे की सांकल खड़की, धड़कते दिल से मैंने दरवाजा खोला। आने वाला नलिन ही था। उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई और मुस्कराते हुए बोला, 'कमाल है, आज पर्दे कहां गए?'आप ही कहते हैं कि आदमी को पर्दों से नहीं झांकना चाहिए, वह धोखा खा जाता है, मैंने गंभीरता से कहा। 'तो आप हर चीज़ स्पष्ट देखना चाहती हैं? 'हां, अब डर लग रहा है, कहीं ठोकर खा कर गिर जाऊं।'इंसान को अपने दिमाग से काम लेना चाहिए न कि भावनाओं के आवेग से। केवल दौड़ते ही नहीं रहना चाहिए। हो सकता है कि आपको किसी से वहां का कोई रहस्य की बात चल जाए या आप दौड़ते-दौड़ते ही मर जाएं। उसकी उलझी बातों से मैं खिन्न हो गई।'नलिन जी, शायद आपकी बात ठीक हो, लेकिन मेरे जीवन की राह में तो कोई पेड़ ही दिखाई नहीं देता। दूर एक वृक्ष दिखाई दे रहा है, वहीं भाग रही हूं। हो सकता है कि वहां पहुंचते-पहुंचते दिन ढल जाए या उसकी दूरी यूं ही बनी रहे। यदि ऐसी राह आ ही गई है तो मैं इधर-उधर क्यों भटकूं? गिरना ही है तो चलते-चलते क्यों न गिरूं? कम से कम गिरते हुए संतोष तो होगा कि मैंने जान बूझ कर गड्ढे मे पांव नहीं रखा। मेरे भीतर सीधी बात करने के लिए बवंडर अंगड़ाइयां लेने लगा। 'थोड़ी प्रतीक्षा कीजिये, शायद भीतर से कोई रोशनी दिख कुर्सी पर करवट लेते हुए बोले।'नहीं, नलिन जी, मैं अब और नहीं रुक सकती। आज नहीं तो कल पापा आ जाएंगे और शायद इस बार मैं विरोध न कर सकूं। मुझे 
किसी के गले बांध दिया जाएगा। उससे पहले मैं आपका निर्णय जानना चाहती हू, मै भावना के आवेग मे सब कुछ कह गई। पता नहीं, स्वछंद और आजीवन अविवाहित रहने की बात कहां हवा हो गई। 'मैं आपके मन की बात बहुत पहले जान गया था, फिर भी इशारों-इशारों से समझाने का यत्न भी किया था, लेकिन आप नहीं समझीं, नलिन जी हाथ मलते हुए बोले। 'किसी ने आपके साथ अन्याय किया है तो इसका अर्थ यह नहीं कि समस्त जग ही ऐसा है, मेरे शब्दों मे पूर्ण सहानुभूति थी।'आप अब भी नहीं समझी वे बेचैनी से बोले, 'याद है, मैंने की थी तितली और फूल की बात लेकिन तितली को पता चला कि फूल तो खोखला है तो वह उसे छोड़ कर किसी और फूल के पास चल दी।
नलिन के मुख पर विषाद कि रेखाएं खिंच गईं। मैं समझी कि शायद नलिन ने भी किसी से धोखा खाया है और वे भी मेरी तरह ही सोच रहे थे। कमरे में सन्नाटा छा गया।'आप स्पष्ट कहें तो अच्छा होगा, मैंने ही चुप्पी तोड़ी। 'अब मैं कैसे कहूं, कैसे समझाऊं? वे विवशता से बोले।
'आप बात टाल रहे हैं या मैं यह समझूं कि मैं आप के योग्य नहीं, मैंने दृढ़ता से कहा। 'क्या तुमने मुझे यही समझा है, वे लगभग चिल्लाते हुए बोले, 'तुम सुनना ही चाहती हो तो सुनो, मेरी शादी हो चुकी है और तलाक भी।'क्या? मैं अवाक् रह गई।'हां, पता है क्यों? एक पर्दा रह गया है, वो 
भी उठा देता हूं, मैं किसी को संतान सुख नहीं दे सकता। स्कूटर एक्सिडेंट से मैं नकारा हो गया हूं। कई डॉक्टर्स को दिखा चुका हूं, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। कहते हुए उन्होंने निढाल हो कर कुर्सी पर एक ओर लुढ़क गए और उनकी आंखों से आंसू निकालने लगे।मैं सन्न रह गई। मुझे लगा कि पर्दे फुंकारते हुए मेरी ओर लपके और मेरे शरीर को पूरी तरह छलनी कर दिया।

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