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युवा होते बच्चों का थामें हाथ

संविदा मिश्रा

29th January 2020

किशोरावस्था , उम्र का सबसे अहम् पड़ाव जब बच्चों की एक अलग दुनिया होती है। उनसे बेहतर उन्हें कोई और नज़र नहीं आता है। बहुत कुछ जान लेने की जिज्ञासा और कुछ अलग करने की चाह ऐसे में कहीं बच्चा गलत रास्ते की ओर न चला जाए।

युवा होते बच्चों का थामें हाथ
किशोरावस्था  एक ऐसी अवस्था जब मन सातवें आसमान पर होता है और  बच्चा जो भी करता है उसे सही ही मानता  है।  इस अवस्था में बच्चे में बहुत से बदलाव देखने को मिलते हैं हार्मोनल चेंजेज़ की वजह से कुछ शारीरिक बदलाव,  तो बदलती उम्र के साथ कुछ मानसिक बदलाव। ऐसे में पैरेंट्स को भी कुछ  सावधानियां बरतने की आवश्यकता होती है।
 

किशोरावस्था में बच्चों में आने वाले बदलाव 

 दोस्तों की कंपनी अच्छी लगती है 

 इस उम्र के बच्चे दोस्तों की कंपनी को प्राथमिकता देते हैं जिसकी वजह से कई बार उनके ऐसे दोस्त भी बन जाते हैं जो उनको गलत रास्ते पर ले जाते हैं और कम उम्र में ही शराब,सिगरेट की लत  लग जाती है। 

अपनी अलग दुनिया 

ये अपनी अलग ही दुनिया में मस्त रहते हैं और अकेला रहना ज्यादा पसंद करते हैं जैसे पैरेंट्स  किसी फैमिली फंक्शन में जा रहे हों तो उनके साथ बाहर जाने की बजाय मोबाइल या लैपटॉप में अकेले व्यस्त रहना पसंद करते हैं। 

उद्दंडता का व्यवहार 

किशोरावस्था में बच्चे थोड़े उद्दंड स्वभाव के हो जाते हैं जिससे वो कई बार अपने पैरेंट्स  के साथ गलत व्यवहार तक करने लगते हैं , या गलत शब्दों का प्रयोग करते हैं। 

अपने आपको सही समझना 

किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चे हर बात में अपने आप को सही मानते हैं इसीलिए वो माता-पिता की हर बात को गलत ठहराते हुए उनसे बहस करने लगते हैं और बच्चों को लगता है कि वो जो भी कर रहे हैं वही सही है। 

गुस्सैल स्वभाव होना 

बच्चे स्वभाव से गुस्सैल हो जाते हैं वो ये भी भूल जाते हैं कि  माता -पिता जो भी करते हैं उनकी भलाई के लिए ही करते हैं।  ये बच्चे घर ही नहीं बल्कि बाहर  भी बहुत बार दूसरों से गुस्से में लड़ाई कर लेते हैं। कई बार गुस्सा दिखा कर  घर छोड़ने की धमकी तक दे डालते हैं। 

किशोरावस्था के बच्चों की परवरिश के तरीके 

मित्रवत व्यवहार करें 

 किशोरावस्था बहुत ही नाज़ुक अवस्था है इसलिए इस अवस्था के बच्चों के माता-पिता को चाहिए कि उनके साथ मित्रवत व्यवहार करें।  जैसे कि बच्चों के साथ बैठकर मूवी देखें, उनके साथ गेम्स खेलें और उनकी पसंद के हिसाब से उनके लिए गिफ्ट लाएं। कभी -कभी बच्चों के साथ बाहर उनकी पसंदीदा जगह पर घूमने जाएं। 

प्रशंसा करें 

बच्चों की बात-बात पर प्रशंसा करते रहें। बच्चा कुछ गलत करे तो उस पर गुस्सा दिखाने  की जगह अच्छे काम करने की प्रेरणा दें। कई बार आपके द्वारा की गई पशंसा ही बच्चे को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।    

कम्युनिकेशन गैप 

माता -पिता को चाहिए की बच्चों से हर टॉपिक पर बात करें । बढ़ती उम्र के बच्चों की बहुत सी जिज्ञासाएं होती हैं जिन्हें  घर में कम्यूनिकेशन गैप की वजह से वो बाहर  शांत करते हैं। चाहें बच्चों के स्कूल और कॉलेज से संबंधित बातें हों या फिर अन्य किसी टॉपिक पर चर्चा हो। बच्चों और पैरेंट्स के बीच संवाद होना ज़रूरी है।  

सेक्स एजुकेशन 

आमतौर  पर देखा गया है कि पैरेंट्स बच्चों से सेक्स के बारे में बात करने से कतराते हैं और बढ़ती उम्र के बच्चे हार्मोनल बदलाव के कारण इसको लेकर बहुत ज्यादा जिज्ञासु होते हैं। इसलिए अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए वो कई बार गलत राह अपना लेते हैं। पैरेंट्स को चाहिए कि बेझिझक बच्चों को सेक्स के बारे में बताएं। पैरेंट्स  यदि बच्चों से खुलकर इस टॉपिक पर बात करते हैं तो बच्चों को अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने  के लिए किसी और का सहारा नहीं लेना पड़ता है। 

स्पेशल केयर और सपोर्ट दें 

किशोरावस्था ऐसी अवस्था है जब बच्चा जो भी करता है सही या गलत उसे वो सही ही लगता है ऐसे में बच्चे को स्पेशल केयर की ज़रुरत होती है बच्चों के साथ बैठकर हर मुद्दे पर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों का पूरा सपोर्ट करना चाहिए जिससे वो अपनी हर बात का निर्णय पैरेंट्स  की मदद से कर सकें। बच्चों को इस नाजुक उम्र में पैरेंट्स का पूरा सपोर्ट चाहिए ताकि वो पैरेंट्स का साथ न पाकर किसी गलत संगति में न पड़ जाएं।  

लक्ष्य तय करने में  मदद करें 

बच्चों को जीवन का उद्देश्य या लक्ष्य तय करने में उनकी मदद करें।  बच्चों को बताएं कि  उनके स्किल्स के हिसाब से उनके लिए किस क्षेत्र में जाना ठीक है। कई बार ऐसा भी होता है कि पैरेंट्स  जिस क्षेत्र में बच्चे को भेजना चाहते हैं बच्चा उसमें नहीं जाना चाहता है।  ऐसे में उसकी प्रतिभा को ध्यान में रखकर ही बच्चे को  दिशा निर्देश दें। कई बार आपका सख्त रवैया बच्चे को परेशान कर सकता है और बच्चा डिप्रेशन में भी जा सकता है। 

स्कूल का माहौल बदलें 

कई बार ऐसा होता है कि स्कूल का माहौल बच्चे की प्रगति में बाधा उत्पन्न करता है जैसे कि स्कूल में अलग-अलग परिवेश के बच्चे आते हैं और सबका सोचने समझने का और काम करने का ढंग अलग होता है। जिसकी वजह से बच्चा गलत संगति में भी जा सकता है। यदि आपको लगता है कि स्कूल का माहौल बच्चे को तनावग्रस्त कर रहा है या किसी गलत रास्ते की तरफ अग्रसर कर रहा है तो बच्चे की  टीचर से बात करके माहौल बदलने का प्रयास  करें। यदि ऐसा न हो पाए तो बच्चे को उस स्कूल से निकालकर दूसरे स्कूल में डाल दें। 

सोशल और इमोशनल वैल्यूज सिखाएं 

बच्चा यदि इस उम्र में अलग रहना पसंद करता है तो  उसे समाज और रिश्तों की अहमियत समझाएं और उसे सबके बीच बैठकर बातें करने की सलाह दें। बच्चे को बहुत ज्यादा देर तक अकेला न छोड़ें। अकेले रहने से बच्चा समाज से अलग महसूस करने लगता है। इसके अलावा वो फैमिली और रिश्तों से भी इमोशनली जुड़ नहीं पाता है। 

दूसरों से सलाह दिलवाएं 

बहुत बार किशोरावस्था के बच्चे अपने माता-पिता की बात को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं और दूसरे रिश्तों को अहमियत देने लगते हैं। ऐसे में माता-पिता को चाहिए  कि वो बच्चों को उस व्यक्ति से सलाह ये प्रेरणा दिलवाएं जिससे बच्चे ज्यादा प्रभावित हैं।  जैसे किसी अंकल या आंटी जिनको बच्चे पसंद करते हैं या फिर परिवार का कोई अन्य सदस्य जैसे मामा या चाचा। उनसे बोलें कि वो समय-समय पर बच्चों को प्रेरित करते रहें। बहुत बार दूसरों की सलाह भी बच्चों की उन्नति में काम आती है। 
 

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