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कभी भी

गृहलक्ष्मी टीम

29th January 2020

कहते हैं हर रिश्ते की अपनी नियति होती है, वक्त के साथ रिश्ते का बीज पनपता है और वक्त आने पर ही ये फलित होता है।

कभी भी
"प्रेरणा?" मेरे पास से गुजर रही एक महिला को देख कर मेरे मुँह से अचानक ही निकल पड़ा था। महिला ने पलट कर मुझे देखा । गर्म मोम बूंद जैसे जमीन पर गिरकर जम गयी । एकटक हम दोनों एक दुसरे को देखे जा रहे थे। "कैसी हो? मैंने कहा तो वो जैसे पिघली । 
"मैं, आई वाज़, हाउ आर यू? कैसे हो आप? कहते हुए लौ की तरह काँप रही थी।  
"मैं एकदम मस्त आप बताइये ।" मैंने पूछा ।
"ठीक हूँ!" उसने बस इतना कहा ।
"ज़रा किनारे हो जाओ आंटी।"  प्रेरणा के पास से गुजरती हुई एक लड़की ने कहा ।
"सॉरी बेटा!" कह कर प्रेरणा किनारे हुई । 
"कहीं बैठते हैं!, अगर फ्री हो तो!" मुझे बहुत हिम्मत नहीं जुटानी पड़ी ये बात पूछने के लिए ।
"फ्री तो नहीं हूँ, लेकिन बिजी भी नहीं हूँ ।" 
मतलब वो चलने के लिए तैयार है ऐसा मैंने उसके जवाब से मतलब निकाल लिया और थोड़ी दूर पर दिख रहे कॉफ़ी शॉप की तरफ चल पड़ा । प्रेरणा भी मेरे बराबर ही चल पड़ी ।
"और कैसी चल रही है लाइफ? गलती से उसका हाथ मेरे हाथ से छू गया तो उसने सॉरी कहा ।
"बहुत ज्यादा कुछ तो नहीं बदला है, अपना लिखना पढ़ना चल रहा है! तुम बताओ । एकदम से लापता ही हो गयी । कितने साल बाद बात हो रही अपनी ?"
"सात साल!" प्रेरणा ने इतनी जल्दी ये जवाब दिया जैसे इस सवाल के लिए तैयारी करके आई  हो ।
"हम्म, सात साल बहुत होते हैं!" मैंने कहा ।
"कुछ बहुत नहीं होते!" प्रेरणा की आवाज में जैसे चुटकी सी थी ।
"तुमको पता है सात साल में शरीर की मांस पेशियाँ एकदम से बदल कर नयी हो जाती हैं।  इंसान के खाने की पसंद और कपड़े पहनने तक की आदतें बदल जाती हैं ।" मैंने कहा ।
"बस-बस ज्यादा ज्ञान देने की ज़रूरत नहीं है!" उसने मेरी तरफ देखा । मैं उसे ही देख रहा था तो वो झेंप कर मुँह दुसरे तरफ फेर ली।
"इधर तो देखो!" मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ कर अपनी तरफ घुमाया तो वो हाथ से मुक्का बना कर मेरे बाँह पर मारते हुए बोली, "डोंट टच मी!" 
"ओ ओ ओ, सॉरी-सॉरी!" मैंने कहा ।
"हम्म! आ गयी तुम्हारी कॉफ़ी शॉप!" 
"मेरी कोई कॉफ़ी शॉप नहीं है!" मैंने कहा और हम दोनों अन्दर घुसे । उधर चलें? एक कोने में दो सीटें खाली थीं । मैं उधर ही बढ़ा । प्रेरणा मेरे पीछे ही आई । मैं टेबल के पास पहुँच कर हाथ से उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा, "मैम, प्लीज!"
प्रेरणा मुझे देखते हुए ही कुर्सी पर बैठी और मैं सामने जाकर बैठ गया । एक पल के लिए हम दोनों एक दुसरे को देख रहे थे । मैं भी हँस रहा था वो भी मुस्कुरा रही थी । मैं साफ़-साफ़  देख सकता था कि उसके गाल शर्म से लाल हो रहे थे । अब उसने अपनी आँखें झुका लीं । तभी वेटर आया और उसने आर्डर के बारे में पूछा ।
"प्रेरणा, देखो क्या लोगी?" मैंने मेन्यु उसके तरफ बढ़ाते हुए पूछा । 
उसने मेन्यु हाथ में लेकर खोलते हुए कहा, "तुम देख लो ना! मेरा ना कुछ ठंडा पीने जैसा मन हो रहा है। सिन्नामोन चलेगा?"
"हाँ, उसमें थोड़ा धनिया पाउडर भी डलवा देना।"      
"शट अप!" उसने मेन्यु बंद करके वेटर से कहा। "टू सिन्नामोन!"
"ये चॉकलेट वाली पेस्ट्री!" मैंने वेटर से कहा।
"मैं भी लुंगी!" 
"तो उतने देर से क्या मंत्र पढ़ रही थी मेन्यु देख के!" वेटर हमारी नोकझोंक पे मुस्कुरा रहा।
"दो पेस्ट्री, दो दालचीनी वाली कोल्ड कॉफ़ी!" मैंने वेटर से कहा और वेटर ने "स्योर सर" कहके स्माइल करते हुए चला गया।
"तो मिस प्रेरणा त्यागी! कैसी हैं आप? मैंने कह तो दिया लेकिन मुझे लगा कि कुछ गड़बड़ बोल गया मैं। "आई ऍम सॉरी! मिस या मिसेज़.."  
"इट्स ओके!" प्रेरणा नपी तुली हँसी के साथ बोली। 
मैं प्रेरणा को आँख भर के देख रहा था। प्रेरणा एकटक मुझे देख रही थी। हम दोनों एकदम शांत थे। हम दोनों ही एकदूसरे को जैसे "चेक" कर रहे थे। सात साल पहले की तस्वीर में प्रेरणा के बाल कितने घने होते थे। अब तो उसने बाल छोटे करा लिए हैं। मैं और प्रेरणा कभी जीवन में मिले नहीं थे। हालाँकि हमारी जान-पहचान तो दस साल पुरानी है। सात साल पहले हमारी आखिरी बात हुई थी लेकिन उसके तीन साल पहले से हम दोनों एक दुसरे को जानते थे। मुझे याद है दिसम्बर में प्रेरणा की फेसबुक पे रिक्वेस्ट आई थी। तब प्रेरणा चौबीस साल की एक अल्हड, चुलबुली, चमकदार लड़की होती थी। सुन्दर भी खूब ही हालाँकि सुन्दर तो अब भी लग रही है वो। मैंने ध्यान दिया कि प्रेरणा ने सिम्पल ढीला-ढाला मैरून रंग का कुरता और क्रीम कलर का प्लाजो पहना हुआ है। लेकिन इसी प्रेरणा की एक फोटो में इसे मैंने स्लीव लेस टॉप और स्किनी जीन्स में भी देखा था। तब की प्रेरणा खूब बातूनी हुआ करती थी उसे देश दुनिया की पूरी खबर हुआ करती थी। इंग्लिश तो कमाल की थी। टाटा पॉवर में जॉब करने वाली प्रेरणा मेरे जीवन की पहली ऐसी लड़की थी जो कि इतना कुछ जानती थी दुनिया के बारे में। इसके अलग प्रेरणा की जो सबसे बड़ी बात मुझे अच्छी लगी थी वो था उसका लिखना। प्रेरणा बहुत अच्छा लिखती थी। इतना अच्छा कि मुझे इर्ष्या होती थी। मैंने उससे कई बार कहा था तुम किसी नौकरी के लिए नहीं बल्कि लिखने के लिए बनी हो लेकिन उसने इस बात को माना नहीं। उससे मैंने एक बात और कही थी कि "तुम इतना अच्छा लिखती हो कि जब कभी लिखना शुरू करोगी एक बड़ी लेखक ज़रूर बनोगी।"मैं प्रेरणा से मिलने टाटा पॉवर के रोहिणी वाले ऑफिस चला गया था बिना बताये और ऑफिस के बाहर आकर उसे फेसबुक पे मेसेज कर रहा था। प्रेरणा मुझे बाहर रुकने के लिए बोली और वो बाहर आकर चली गयी लेकिन हम दोनों मिल नहीं पाए। फिर बाद में समझ में आया कि मैं गलत जगह आ गया हूँ। दरअसल प्रेरणा मंगोलपुरी वाले ब्रांच में थी। 
"ठीक है मैं मंगोलपुरी आ जाता हूँ!" मैंने मेसेज किये लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। "मुझे नहीं मिलना तुमसे।" इस मेसेज के बाद मैंने कई मेसेजस के बाद कोई जवाब नहीं दिया। मैं प्रेरणा के लिए कुछ किताबें ले गया था जो वापस लेकर आना पड़ा। उस दोपहर के बाद प्रेरणा ने शाम को मुझे मेसेज किया। मैं बिना मिले चला आया था उसे भी कहीं न कहीं बुरा ज़रूर लगा था। शायद अपने गिल्ट को ही कुछ कम करने के लिए उसने मुझसे मेरा नंबर लिया और फोन किया। मैंने फोन पर उसे एक कविता सुनाई जो कि उसके लिए लिखी थी। कविता उसे अच्छी लगी थी। उसने मेल पर वो कविता मंगाई। हमारी बात ख़त्म होने से पहले उसने कहा मुझे उसके नंबर पर फोन करने के लिए मना किया था। कुछ ही दिन बीते रहे होंगे कि हमारी फोन पर बात होनी शुरू हुई। फोन पर बात क्या शुरू हुई बात खत्म ही न हुई। अगले एक महीने के बाद हमलोगों की बात लगातार ही होने लगी थी। 
और अचानक ही एक दिन मैंने अपने मन की बात प्रेरणा से कह दी। प्रेरणा ने मेरे मन की बात सुनकर अपने मन की बात सुनाते हुए मुझे मना कर दिया था। 
उसने कहा था, मैं तुमसे कभी भी नहीं मिलूंगी, मैं तुम्हारी शक्ल कभी भी नहीं देखूंगी! मैं तुमसे कभी शादी नहीं करुँगी। तुम दुनिया के आखिरी इंसान भी हुए तो मैं तुमसे शादी नहीं करुँगी। और अगर तुम दिल्ली में रहने लगे तो मैं दिल्ली में कभी पैर नहीं रखूंगी।"
मुझे नहीं पता प्रेरणा ने किस वजह से ये सारी बातें मुझसे कहीं थीं। इस बात को कहने में मैं बिलकुल गुरेज नहीं करूँगा कि उसके परिवार के मुकाबले मेरे परिवार की हैसियत कुछ नहीं थी लेकिन मैं तो इतना नकारा नहीं था फिर भी मैंने कभी उसको दुबारा उस बात के लिए जबरदस्ती नहीं की। उसके इन सब जवाबों को सुनने के बाद भी हम दोनों की बातचीत होती रही। 
उसने टाटा की नौकरी छोड़ कर सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू की। कोचिंग जाते समय रास्ते में मुझसे बात, वापस आते समय मुझसे बात। उस साल जनवरी से लेकर दिसंबर तक मुझे याद है तीस हजार मिनट से ज्यादा बात हुई थी हमारी। इतनी बात हुई कि मैं उसके सारे रिश्तेदारों को पहचानने लगा था, वो मेरे घर के सब लोगों को जानने लगी थी। मेरा भी लिखना पढ़ना जारी था। मैं एक साथ दो फिल्में लिख रहा था उस समय। सही मायने में अच्छे दिन तो मेरे ही आये थे। अच्छे पैसे मिले और जीवन शून्य से सौ हो गया था अंत के तीन महीनों में। 
हमारी बातचीत होती ही रही लेकिन और बाद में कुछ बातें ऐसी हुईं कि बीच में असहजता जैसी हुई। प्रेरणा को लेकर मेरे मन में जो भाव थे वो बदले नहीं बल्कि और गाढ़े ही हुए। इस गाढ़ेपन को भी समझ रही थी। मेरे इसी गाढ़ेपन को हल्का करने के लिए उसने मुझसे बचना शुरू किया। कितनी ही बार वो मुझसे बोली कभी फोन मत करना, कभी मेसेज मत करना। लेकिन एक दिन से बढ़ के दो दिन ही हुआ होगा कि हम फिर बात करने लगते थे। प्रेरणा के घर में भी उसके शादी की बात चीत चल ही रही थी उसे दो साल की मोहलत मिली थी सिविल की तैयारी के लिए। निकले तो ठीक नहीं तो शादी! मेरे सामने ही उसके छः महीने निकल चुके थे। प्रेलिम्स की परीक्षा मई में होने वाली थी। 
प्लीज मुझे कॉल मत किया करो। मैसेज भी नहीं। बहुत मेहरबानी होगी। मैं जब भी कहता मुझे ब्लाक कर लो। लेकिन ब्लाक वो नहीं करती थी। मैं मैसेज करता था वो रिप्लाई करती थी मैं कॉल करता था तो एक दो बार के बाद उठा ही लेती थी। नहीं तो खुद समय मिलने पर कर ही लिया करती थी फोन। 
अचानक से एक दिन मुझे पता चला कि प्रेरणा ने मुझे ब्लाक कर दिया है। फेसबुक से, वाट्सएप्प से भी और उसका नंबर भी बंद था। मेरे पास एक और रास्ता था मेल करने का लेकिन मैंने कभी मेल किया नहीं। हाँ अपने तरफ से ये सावधानी बरती कि वो जब ब्लाक कर ही चुकी है तो मेरी कोई खबर पहुँचे न उस तक। मेरे और प्रेरणा के बीच एक लड़का म्यूच्यूअल फ्रेंड था मैंने उसको अनफ्रेंड किया और प्रेरणा की जितनी सहेलियाँ थीं फेसबुक पे सबको ब्लॉक किया ताकि वो मुझे अपने किसी सहेली के आईडी से न देख पाए। मैंने फेसबुक में ऐसी सेटिंग कर ली कि मेरी फोटोज, मेरे पोस्ट मेरे फेसबुक मित्रों के अलावा कोई और न देख पाए। 
कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिनमें हमें आंसू नहीं निकलते लेकिन पीड़ा होती है। ऐसी पीड़ा होती है जो लगता है मर जाने के बराबर ही होती होगी। ऐसी ही पीड़ा से मैं गुजरा उन दिनों लेकिन मैंने खुद को बचाया। बड़े जतन से बचाया। खुद को काम में व्यस्त रखने लगा और मेरी जितनी अधूरी कहानियां, उपन्यास और स्क्रिप्ट्स थीं मैंने सब पूरे किये एक के बाद एक। छः महीने ही बीते थे कि मेरे पास मेरे दो उपन्यास, एक कहानी संग्रह और तीन स्क्रिप्ट तैयार हो गयीं थीं। मैंने फेसबुक एकदम नाम मात्र का ही इस्तेमाल किया, घर वालों से इस दौरान कहा सुनी हुई थी उनसे भी बातचीत बंद हो चुकी थी। इस वक्त मैं अपने जीवन में बिलकुल अकेला था। इस अकेलेपन को मैंने जाया नहीं किया। ओशो को खूब पढ़ा और लगा कि क्या ही कमाल का आदमी था वो। ओशो से याद आया,प्रेरणा से बातचीत के दौरान मैंने उसको बताया था कि उसकी उँगलियाँ ओशो की तरह लगती हैं। इस बात को उसने इनकार किया था। इनकार कर देना प्रेरणा के स्वाभाव में ही था। मैं बस यही सोचता था कि कैसे इसकी बनेगी किसी के साथ। ऑफिस में थी तो वहां भी इसकी लड़ाई हो जाती थी लोगों से, कोचिंग में यहाँ तक कि घर में अपने छोटे भाई और चाची से एकदम नहीं बनती थी। प्रेरणा के ब्लॉक करने के बाद मुझे कोई खबर नहीं मिली उसकी और मैंने अपने तरफ से भरसक प्रयास किया कि मेरी भी कोई खबर उस तक नहीं पहुँचे। 
प्रेरणा से बातचीत बंद होने के एक साल के भीतर ही मेरी लिखी दो फिल्में रिलीज़ हुईं और दोनों ने अच्छी कमाई की। नाम भी हुआ पैसा भी मिला। इन दिनों मुझे बड़ी टीस सी उठती थी कि काश प्रेरणा मुझे देख रही होती लेकिन....
"सर, योर आर्डर!" वेटर ने प्लेट में दो कोल्ड कॉफ़ी लाकर टेबल पर रखी। मैंने उसमें से एक निकालकर प्रेरणा के आगे रखा। 
"थैंक यू" उसने धीरे से कहा। "अब सुन्दर लग रहे!" 
"कौन?"  मैंने अपनी वाली कॉफ़ी उठाकर अपने सामने रखा और प्लेट हो सरका कर एक किनारे किया।
"आप ही!" उसने ही पर जोर दिया।
"अच्छा, मजाक करने की आदत गयी नहीं तुम्हारी?" 
"नहीं सच में!" 
"अच्छा! और क्या चल रहा है?" 
"कुछ नहीं, चल रही है गाड़ी!" 
"गाड़ी का एक पहिया और कहाँ है?" 
"जोड़ा था लेकिन निकाल दिया?"
मैं उसके इस जवाब पर थोडा संजीदा हो गया। 
"आई एम सॉरी!" 
"नो-नो इट्स ओके!" प्रेरणा स्पून से ऊपर के चॉकलेट को चम्मच से खा रही थी। "पहिया जीवन की गाड़ी को खींचने के लिए होता है। पंक्चर होने के लिए।"
"पंक्चर तो ठीक भी होता है!" मैंने भी उसका देखा देखी चम्मच से चॉकलेट खाना शुरू किया।
-"एक बार-दो बार! रोज-रोज पंक्चर ही बनाने बैठे रहेंगे तो चलेंगे कब?" 
"हम्म, सही बात है!" मैंने कहा। 
"मेरी छोड़ो, आप बताओ! आपकी तो ऐश है! खूब मज़े हैं!" 
प्रेरणा ने मेरी फिल्मों, किताबों, मेरे बारे में सारी जानकारी रखी हुई थी। मैं हैरान था लेकिन उतना ज्यादा नहीं क्योंकि काम की बातें अखबार में, टीवी पर आ ही जाती थीं इन्टरनेट पे भी बहुत सारी बातें पता चल जाती थीं। जो भी हो मुझे एक पल के लिए अच्छा तो लगा ही था। 
"शादी क्यों नहीं की अब तक!" उसने ग्लास एक तरफ करते हुए टिशु पेपर से अपना ओठ पोंछते हुए कहा और फिर टिशु पेपर ट्रे में रख दी। मैं अचानक से इस सवाल के लिए तैयार नहीं था। फिर भी कहा, "बस ऐसे ही!" और मैंने अपने भी ग्लास एक तरफ सरकाते हुए ट्रे में से प्रेरणा का मुँह पोछा हुआ टिशु उठा कर अपना मुँह पोछने लगा।
"छी... ।" कह कर उसने मेरे हाथ से टिशु छिनने की कोशिश की। आधा टिशु उसके हाथ में आधा मेरे। "बद्तमीज!" कहते हुए वह हँसी।
इसके बाद मैंने उससे उसके घर, मम्मी पापा, भाई सबके बारे में बात की। सब ठीक ही था कोई अप्रत्याशित जैसा कुछ नहीं ही हुआ था उसके परिवार में। दादा-दादी उम्रदराज़ थे तो उनका जाना भी ऐसा अचरज भरा नहीं लगा था मुझे। तभी वेटर केक चॉकलेट वाली पेस्ट्री लेकर आ गया। मैंने एक प्रेरणा की तरफ बढ़ा दिया और एक अपने पास रखा।
"थैंक यू, दिल्ली में कैसे?" प्रेरणा एक टुकड़ा काटी।
"एक दोस्त की शादी है!" मैंने कहा और पेस्ट्री उठा कर एक टुकड़ा काटा।
"अच्छा! जाना कब है?" 
"चार दिन हूँ अभी तो!" 
"ग्रेट!," तभी उसका फोन बजा। "जस्ट अ मिनट!" उसने अपने छोटे से पर्स में से अपना फोन निकाला और "आ रही हूँ!" कह कर फोन रख दिया। 
"एक मिनट हाथ दिखाना ज़रा!" मैंने उसका दाहिना हाथ अपने हाथ में लिया तो देखा कि उसने एक अंगूठी पहनी है जिसमें ओशो की फोटो लगी थी। मैं एक मिनट के लिए चौंका लेकिन फिर उसके मैरून कुरते को देख कर जो अंदाजा लगाया उसे प्रेरणा ने सही करार देते हुए कहा, "सही सोच रहे हैं आप! ओशो इज ग्रेट।"
"नो, एक्चुअली वी आल आर ग्रेट!" 
"अग्री!" 
"वैसे तुम ठीक ठीक बताओ क्या कर रही हो आजकल? जॉब, बिजनस?"
"मैं न नौकरी के लिए बनी हूँ न बिजनेस के लिए!" 
"अच्छा फिर किस लिए बनी हैं महारानी आप!" मैं प्रेरणा को अक्सर महारानी ही कहा करता था।
"लिखने के लिए, मैं शेयर करुँगी आपको! देखिएगा!" प्रेरणा अपनी पेस्ट्री ख़त्म चुकी थी। उसने इस बार टिशु से मुँह पोछ कर टिशु अपने हाथ में ही रखा था।
प्रेरणा के मुँह से ये बात सुन कर मैं बता नहीं सकता कितना खुश हुआ था। उस वक्त प्रेरणा मुझे ही देख रही थी। मैंने वहीं से प्रेरणा का हाथ उठाकर चूम लिया। "आई लव यू!"   
"शट अप!" कह कर उसने हाथ खींचा तो ज़रूर लेकिन उसके खींचने में खींचना नहीं था। "मुझे जाना है!" 
प्रेरणा उठने को हुई तो मैंने पूछा, "फिर कब देख सकता हूँ तुमको?!"
"कभी भी!"  उसने कहा।
"फिर कब मिलेंगे?" 
"कभी भी!" 
"फिर दिल्ली कब आऊँ?"
"कभी भी!" 
"नंबर मिलेगा?" 
"कभी भी!" प्रेरणा ने पर्स में से पेन निकाला और हाथ में पकड़े टिशु को खोलकर उसपे अपना नंबर लिख कर मेरे आगे सरका दिया। मैंने टिशु उठाकर उसे चूमा।
"छी! बाय.." कह कर प्रेरणा उठी और तुरंत ही निकल गयी। मैं कुछ कहना चाह रहा था लेकिन कहा नहीं। मैं भगवान से विनती करने लगा था कि प्रेरणा रुके और मुड़ कर मुझे देखे लेकिन शायद भगवान तक मेरी बात पहुँच नहीं पायी होगी। प्रेरणा न तो रुकी न मुड़ी गेट खोलकर सीधे गेट से बाहर निकली और अगले ही पल प्रेरणा मेरी नज़र से ओझल हो चुकी थी। मैंने तुरंत ही टिशु में से नंबर देख कर फोन में सेव किया और प्रेरणा को मेसेज भेजा, "मुझसे शादी करोगी?" दस सेकेण्ड के भीतर ही मेरे फोन पे मेसेज आया। मैंने गर्दन उठा कर कॉफ़ी हाउस की छत को देख कर भगवान को याद किया जहाँ मुझे केवल एक लाइट दिखी। मैंने धीरे से मेसेज खोला तो प्रेरणा ने लिखा था, "कभी भी!" 

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