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नेटबंदी

गृहलक्ष्मी टीम

31st January 2020

इंटरनेट के इस युग में नेटबंदी किसी आपातकाल की स्थिति से कम नहीं है। ऑक्सीजन की तरह काम करता ये नेट जब बंद होने की कगार पर आ जाता है तो लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ये व्यंग्य नेटबंदी के जरिए मौजूदा दौर की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर कटाक्ष है।

नेटबंदी
नोटबंदी का भूचाल अभी पूरी तरह दिल और दिमाग से मिटा भी नहीं था कि नेटबंदी की सुनामी आ गई. कभी चंद शक्तिशाली इंसानों ने मिल बैठकर सर्वशक्तिमान ईश्वर का जन्मस्थान निर्धारित कर दिया और इसे लेकर कोई तीन पांच न कर सके,इसके लिए दो दिन की नेटबंदी कर दी. कभी सिटीजनशिप एमेंडमेंट एक्ट का विरोध बढ़ा तो सरकार ने नेटबंदी कर दी. आखिर आज का सबसे शक्तिशाली हथियार यही तो है-नेट. शनिवार और रविवार छुट्टी के इन दो दिनो में स्कूल कॉलेज सब बंद होने पर भी नेटबंदी ने सबकी घंटी बजा दी.
आम गृहिणी के लिए तो सावन सूखा न भादो हरा की तर्ज पर सप्ताह के सातों दिन कामकाजी ही होते हैं.तो अपने राम तो उस दिन भी हमेशा की तरह सवेरे 6 बजे उठकर गृहस्थी की चक्की में पिसने के लिए तैयार हो गए थे. दूध गरम किया और चाय लेकर बेडरूम में लौटी तो पति महाशय को बिस्तर पर बेचैनी से करवटें बदलते देख हैरान रह गई.नित्य तो अब तक वाट्सएप, फेसबुक के दो दो राउंड निबटाकर वे पवेलियन(टाॅइलेट) की ओर प्रस्थान कर चुके होते हैं. ओह याद आया आज तो नेट बंद है. कायमचूर्ण(वाट्सएप,फेसबुक) की डोज़ ही शरीर में नहीं पहुंची तो मोशन होगा कैसे? प्रजा की सेहत से खिलवाड़ के लिए सरकार पर केस कर देना चाहिए. खैर किसी तरह बेचारे ने ब्रश करके चाय गले में उड़ेल ली.चुस्की वाला मजा तो स्मार्टफोन पर नेट के साथ है. पेट में मरोड़ें उठ रही थीं. पर मोशन की भी अकड़ देखिए.स्मार्टफोन का मुंह जोहे बिना बाहर आने को तैयार नहीं. उनकी छटपटाहट देखकर हमने हॅंसी को काबू किया और सहानुभूति दर्शाई.
‘आज तो बच्चे भी लेट उठेगें. चलिए वाॅक कर आते हैं.वैसे भी आपको आज कुछ काम तो है नहीं' संभालते संभालते भी सच्चाई मुंह से निकल गई थी. पतिमहोदय ने हमें घूरा पर फिर साथ हो लिए थे. लौटते में वाॅक जाॅगिंग और फिर घर आने तक रनिंग में तब्दील हो गई थी. जिसका राज घर पहुंचने पर खुला.जब वे भागते हुए टाॅयलेट में घुसे और धड़ाम से दरवाजा बंद कर लिया. मैं मुंह दबाकर हॅंसने लगी.
‘क्या हुआ? हॅंस क्यॅूं रही हैं आप?और सवेरे सवेरे बिना बताए कहां गायब हो गए थे आप दोनों? मैंने पूरा घर छान मारा.' बेटी का मूड उखड़ा हुआ था.
‘इसे कैसे हमारी सुध आ गई?आंख खुलने के बाद भी यह तो दो दो घंटे तक बिस्तर से नीचे पांव ही नहीं रखती.स्मार्टफोन पर ही लगी रहती है.'मैने सोचते हुए हैरत से उसका माथा छुआ.‘तेरी तबियत तो ठीक है.'
‘अरे कहां मम्मी! बेचारी की किस्मत तो देखो.कल पार्लर से लौटकर ढेरों सेल्फी ली. उनमें से चुन चुनकर फेसबुक पर अपलोड की. सवेरे ढेरों लाइक्स और कमेंट्स की उम्मीद में स्मार्टफोन खोला तो ईद का चांद बने नेट महाशय नदारद.अब तो चांद दिखने पर ही बेचारी रोजा खोल पाएगी. अरे तब तक मम्मी का रसोई में हाथ बंटा दे. वाॅक करके लौटी हैं. थक गई हैं.है न मम्मी?' बेटे ने पहेली सुलझाई.
‘ज्यादा मत बोल! सवेरे से भरा हुआ तो खुद बैठा है.मम्मी आज इसका दोस्तों के संग मूवी जाने का प्रोग्राम था. अब नेट बंद है, टिकट बुक नहीं हुए तो मुझसे लड़कर खुन्नस निकाल रहा है. खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे.' दोनों भाई बहन की कुत्ते बिल्ली वाली नोंच खसोट शुरू हो गई थी.
मैंने रसोई में घुसकर परांठों के लिए आलू उबलने रख दिए थे.
‘तू क्यूं नहीं हेल्प करता मम्मी की, तेरे भी तो आज छुट्टी है.'
मैं अब भी चुपचाप आटा गूंथती रही.दोनों ने कनखियों से एक दूसरे को देखा. इशारों इशारों में कोई समझौता हुआ और फिर दोनों रसोई में आ गए.‘आज परांठे हम बनाएगें.'
अपने अचूक रामबाण शस़्त्र ‘मौन' की कामयाबी पर इठलाते हुए मैं तुरंत चकला बेलन छोड़कर बाहर आ गई थी.
अब तक पतिमहोदय भी हल्के होकर आ गए थे.तन मन से हल्के हो जाने का अहसास उनके मूड से छलका पड़ रहा था.‘मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा रहता है.....' गुनगुनाते वे रसोई में बच्चों के पास पहंुच गए थे.‘ओहो, आज तो ब्रंच बच्चा पार्टी तैयार कर रही है.सराहनीय प्रयास! हमारे मार्गदर्शन की आवश्यकता हो तो बता दीजिएगा.'
‘जी बिल्कुल है! फ्रिज में धनिया, पुदीना, अदरक, नींबू और मिर्च रखा है. उन्हें जरा किचन सिंक का मार्ग दिखाते हुए मिक्सर के दर्शन करवा दीजिए.' बेटे ने कहा तो चटनी बनाने के लिए फ्रिज की ओर बढ़ते मेरे हाथ विद्युत गति से पीछे हो लिए थे. सबसे तटस्थ निरपेक्ष बनी मैं फुर्ती से नहाने घुस गई थी. 
आहहा, लंबे अरसे बाद चैन से मल मलकर नहाई. खूबसूरत नया सूट निकालकर आराम से तैयार होने लगी.
डाइनिंगटेबल पर बं्रच सजने की प्रक्रिया में था. काम के साथ साथ तीनों के बीच चल रहे उन्मुक्त वार्तालाप के स्वर मेरे कानों में अमृत घोल रहे थे. याद नहीं आ रहा था कितने अरसे बाद यह संवादसेतु खुला था.
‘पापा यह नेटबंदी किस खुशी में है?'
‘अखबार पढ़ा करो न भाई. कितना कहता हॅूं.'
‘नेट ही नहीं चल रहा. कहां से न्यूज़ पढ़ें?'
‘अरे अखबार, अखबार. यह हार्ड काॅपी!' पतिदेव बच्चों को अखबार दिखाकर नेटबंदी की न्यूज़ बताने लगे.मुझे लगा अगली पीढ़ी के लिए अखबार भी म्यूज़ियम में रखने वाली चीज़ बनने वाली है.
‘इस बेचारे की तो मूवी रह गई.' बेटी ने चिढ़ाया.
‘मेरे पास डाउनलोड की हुई पड़ी है.अभी घर पर ही चला लूंगा.' बेटा कहां पीछे हटने वाला था.
‘सच! फिर तो मैं भी देखूंगी.पापा आप भी देखो न ‘बाला;' आपके भी तो आयुष्मान की तरह....'बेटी ने जीभ काट ली‘
‘कौन बाला,कैसी बाला?हमने तो सिर्फ मधुबाला को सुना और देखा है.'
‘.... पापा देखते हैं न, वैसे भी पूरा दिन करेगें क्या?स्मार्टफोन्स तो नेट के बगैर लैंडलाइन्स हो गए हैं.मम्मी को भी साथ बैठा लेते हैं. अरे यह मम्मी कहां रह गई?'
अपने नाम की पुकार मचती देख मैं डेªसिंगरूम से बाहर निकली और अदा से चलकर डाइनिंगटेबल पर विराजमान हो गई.
‘ओहो, ये हमारी मधुबालाजी कहां जाने के लिए तैयार हुई हें?'
‘बाला' देखने! अपने होम थिएटर में' मैंने अपने बेडरूम की ओर इशारा किया.
‘अरे वाह, आज तो मम्मी फुल फाॅर्म में!क्या कहने!तो फिर खाना मम्मी पापा के बेडरूम में ही ले लेते है. मूवी के साथ परांठों का लुत्फ उठाएगें.' कहते हुए बेटे ने परांठों का कैसरोल तो उठा लिया था पर कदम उठाने में हिचकिचा रहा था. कारण स्पष्ट था मेरे बेडरूम में खाने पीने की चीजें ले जाना निषिद्ध है.
‘ठीक है, खा लेना पर....'मैंने बमुश्किल खुद को मनाया.
‘हे, मोगेम्बो खुश हुआ' बेटे ने नारा लगाया.
‘एक मिनट पूरी बात सुन लो.पहले सब यहीं बैठकर दो मिनट आंखें बंद करो. मुझे प्रार्थना करनी है.' मैंने आंखें बंद कर बुदबुदाना शुरू कर दिया तो सबको बैठना पड़ा.
‘हूॅं, अब चल सकते हैं.'मैंने आंखें खोल दी थीं.
‘क्या बंदा जान सकता है कि मल्लिका ए सुख विला (हमारे घर का नाम) उर्फ मधुबाला क्या इबादत कर रही थीं?' पतिदेव ने उत्सुकता से पूछा.
‘मेैं नेटदेवता को मना रही थी कि सप्ताह में दो दिन न सही, कम से कम एक दिन तो इस घर से अवश्य ही रूठ जाया करे. ताकि यह सुखविला अपने नाम को सार्थक करते हुए वास्तव में सुख विला बन जाए.' मेरे हास्यबोध पर हॅंसी के फव्वारे फूटने की बजाय मेरी अपेक्षा के विपरीत माहौल भावुक हो गया था.
‘सुमि, वादा करता हॅूं, अब से हर संडे नेट बंद रखूंगा.'
 बेटी ने भी भावुक होकर ऐसा ही वादा किया तो बेटा बोल उठा,‘बस कर पगली, रूलाएगी क्या? रोती हुई सेल्फी कौन लाइक करेगा?'
इसके साथ ही सबकी आंखों की नमी खिलखिलाहट में तब्दील हो गई

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