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मेरा है तू

प्रीता जैन

7th February 2020

जीवन में हर रिश्ते की अपनी अलग अहमियत होती है और व्यक्ति जितनी जल्दी ये बात समझ जाए उसी में समझदारी है। मां-बेटे की ये कहानी भी कुछ यही बयां करती है।

मेरा है तू
बीना जी ने खाना मेज़ पर लगाया ही था कि सुबोध जी की आवाज़ सुनाई दे गई, भई! कितनी देर में खाने आना है बड़ी ज़ोर की भूख लगी है तुम्हारी इस खुशबू ने तो और भी भूख बढ़ा दी, बस-बस रहने दीजिए आप और आपकी बातें... अभी प्रियांक आता ही होगा तभी सब एक साथ खाएंगे। ठीक है भई! तुम और तुम्हारा बेटा उसके बिना तो तुम्हें कुछ करना ही नहीं है, इतना कह सुबोध जी बीना जी की तरफ देख मुस्कुरा दिए और वापस अपने काम में लग गए। करीब 15-20 मिनट बाद प्रियांक और बहू प्राची ऑफिस से आ गये, उन्हें देखते ही बीना जी चहक सी गई आ गए! तुम लोग जल्दी से हाथ मुंह धोकर खाने पर आ जाओ तुम्हारी पसंद की चीज़ें बनाई हैं मैंने, सब साथ बैठेंगे अच्छा लगेगा। बीना जी की बात अनसुनी कर प्रियांक बोलने लगा, 'नहीं मां आज हम लोग खाना नहीं खाएंगे, ऑफिस में ही हमने डिनर पर बाहर जाने
का तय कर लिया था। अपनी बात कह और उनकी प्रतिक्रिया की परवाह ना करते हुए वह अपने कमरे में चला गया और कुछ देर बाद दोनों ही घर से निकल गए तब तक बीना जी यंत्रवत ही खड़ी हुई सब देखती रहीं न कुछ बोलीं न कुछ कर सकीं। खैर माहौल को हल्का करने के लिए सुबोध जी ने ठहाका लगाया अब तो आपके सुपुत्र कुछ ना कुछ खा ही लेंगे तो मुझ गरीब को भी खाना दे दो। बीना जी ने सुबोध जी की थाली लगा दी किन्तु खुद से कुछ खाया नहीं गया। एक रोटी अनमनी हो खायी फिर उठ
गईं, अब किसी काम में मन नहीं लग रहा था। यही सोचती रहीं कि यही प्रियांक मुझसे बिना पूछे कहीं नहीं जाता था पर अब तो पहले प्रोग्राम बनाता है फिर बताता है, इसने आज इतनी भी परवाह नहीं की मम्मी ने खाना बना रखा होगा उसका क्या होगा। मम्मी को कैसा लगेगा वगैरा-वगैरा। प्रियांक बीना जी का इकलौता बेटा है, यही वजह है कि उनकी सारी दुनिया इसी के इर्दगिर्द घूमती है उसी को देख उनकी सुबह उसी के
साथ शाम होती है। घर में और कोई ना दिखने की वजह से प्रियांक भी बीना जी के साथ-साथ ही रहता उन्हीं के साथ खाता-पीता कहीं आताजाता। वो तो इंजीनियरिंग करने के लिए बड़ी मुश्किल से हॉस्टल भेजा अपने से अलग किया, फिर भी जैसे ही छुट्टी लगती प्रियांक घर आ जाता और फोन पर तो पल-पल की बातें दोनों मां बेटे की होती ही रहती। दोस्तों के साथ घूमता-फिरता तो भी बीना जी को खबर रहती हर काम उन्हीं के निर्देशानुसार ही करता। यही वजह थी कि अब छोटी-छोटी बातें जो प्रियांक
की तरफ से हो जातीं जिन्हें वो जानबूझ कर नहीं करता, बीना जी के मन को आहत कर जातीं वे दिल से परेशान हो जातीं। अभी परसों की ही बात है रात को प्रियांक-प्राची खाना खाने के बाद थोड़ी देर टहलने निकल गए जब आये तो अपनी बातों में मशगूल कमरे की ओर चले गए। बीना जी वहीं अपने कमरे में बैठी हुई थीं उन्हें लगा आज प्रियांक ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा, ना ही सोने जाने से पहले मुझसे बातें
की। खैर! कुछ देर बाद वो दूध का गिलास लेकर जब कमरे में गईं तो दोनों टीवी पर कोई पिक्चर देख रहे थे। प्रियांक ने जल्दी से उनकी तरफ देखा और कह दिया मां पूछकर तो दूध बनाती अभी बाहर से आइसक्रीम खाई थी तो इच्छा नहीं हो रही है, मैं नहीं पी सकूंगा। बस! इतनी सी बात पर बीना जी कहने लगी तो अब
तुझसे हर बात पूछकर ही करनी होगी अब तो बिना बताये खाने-पीने भी लगा है, ठीक है कलसे बता देना क्या करना है क्या नहीं...। प्रियांक एकदम हतप्रभ हो कहने लगा, 'मां! मेरा कुछ ऐसा-वैसा मतलब नहीं था बस आपको पता ही था हम घूमने गए हैं, मन हुआ तो आइसक्रीम खा ली इसलिए दूध नहीं लिया इतनी छोटी सी बात कि आइसक्रीम खाई है आपको बताना ज़रूरी नहीं समझा और वैसे भी पहले कहीं रात को जाता नहीं था अब चला जाता हूं तो थोड़ा-बहुत कुछ ना कुछ खाने-पीने में आ ही जाता है इस वजह से कभी-कभी दूध की इच्छा नहीं होती और कोई बात नहीं है। आप परेशान मत हो। सही तो कहा प्रियांक ने कि परेशान मत हो, किन्तु मात्र ऐसा कहना ही अब बीना जी को दु:खी कर जाता उन्हें ऐसा लगने लगा था कि प्रियांक अब उनसे दूर होता जा रहा है उस पर उनकी पकड़ कम होती जा रही है अब तो प्राची के साथ-साथ ही रहता है। यही बेबुनियाद बेवजह की बातें उन्हें अंदर ही अंदर दुखी करतीं जिससे कहीं न कहीं स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन तनाव दिखने लगा। वे अचानक ही असहज असामान्य व्यवहार करने लगतीं। रोज़मर्रा के घर के सभी काम हो ही रहे थे सब अपने-अपने काम में मशगूल थे। तभी एक दिन ऑफिस से आने के बाद प्रियांक कहने लगा, 'मैं और प्राची कुछ दिन के लिए केरल घूमने जा रहे हैं, अभी अगले हफ्ते 4-5 दिन की छुट्टी है तो हमने अपना जाने का प्रोग्राम बना लिया है। कई दिनों से सोच रहे थे अब फाइनल हो सका है। हम जाएंगे तो आप लोग अपना ध्यान रखना, वैसे फोन पर तो मैं लगातार आपसे बात करता ही रहूंगा। उसका इतना कहना था कि बीना जी बिफर उठीं, 'हां-हां क्यों नहीं अब तो तू इतना बड़ा हो गया है कि पहले प्रोग्राम बनाता है फिर हमें बताता है बताने की भी क्या ज़रूरत समझी ना ही बताता चला जाता, रह लेंगे अब तेरे बिना, वैसे भी दिन पर दिन तू हमसे दूर होता ही जा रहा है, यदि तुझे हमारी ज़रूरत नहीं है तो बता दे... हम अलग हो जाएंगे। हमारे साथ ज़बरदस्ती प्यार का दिखावा ना कर दिल से चाहता हो तो साथ रहेंगे नहीं तो दूर ही सही। तू वही प्रियांक है जो हर काम मुझसे पूछ-पूछ कर करता था। यहां तक कि रोज़ के काम भी मुझसे बताकर ही करता था, अब क्या हो गया है। वही मैं हूं वही तू है तेरे लिए सब बदल गया होगा मेरे लिए कुछ नहीं बदला। खैर! जैसी तेरी मर्जी रह। हमसे नाता रखना हो तो रख नहीं तो जैसा चाहे कर, हमसे कोई मतलब नहीं। प्रियांक हक्का-बक्का सा रह गया, साथ ही प्राची भी। प्रियांक ने अभी कुछ भी बोलना सही नहीं समझा, साथ ही सुबोध जी ने भी उसे इशारे से चुप करा दिया। पर प्रियांक ने इतना अवश्य कहा, 'मां! पहले से थोड़ा बड़ा तो मैं हो ही गया हूं पर आज भी आपके लिए उतना ही मान-सम्मान मेरी नज़रों में है जितना पहले था और हमेशा आप मेरे लिए इस जहां में सबसे अच्छी व आदरणीय ही रहेंगी, सिर्फ इतना सा फर्क हो गया है कि अब मेरे पास उतना समय नहीं रहा, जितना पहले हुआ करता था। आप तो जानती हैं ना सुबह 8 बजे ऑफिस निकलता हूं रात 9 बजे तक घर आ पाता हूं। वीकेंड पर भी या तो ऑफिस का ही काम रहता हूं या फिर आपके घर के काम कर देता हूं इसलिए कई बार कोई मन में विचार आता है तो चाहते हुए भी समयाभाव की वजह से आपसे उस समय साझा या शेयर नहीं कर पाता, फिर कुछ ज़रूरी होता है तो स्वयं ही निर्णय ले लेता हूं। यही सोचता हूं मां को फिर बता दूंगा, कोई परायापन तो है नहीं कि अभी बताने की टेंशन लूं। इतना तो आप भलीभांति जानती-समझती हैं कि आपसे कभी कुछ नहीं छुपाया, ना ही छुपाऊंगा और ऐसा करूंगा भी क्यों... आप व पापा ही मेरे और प्राची के लिए सब कुछ हैं, बस यही सोचा था कि मेरी छुट्टी और रिजर्वेशन दोनों का ही फाइनल हो जाए तभी आप लोगों को बताऊंगा। यदि दोनों में से कुछ भी फाइनल नहीं हुआ तो बताने का क्या फायदा होगा, हाँ! इतना मैं नहीं समझ पाया कि विचार आते ही आपको बताना था नहीं तो बुरा भी लग सकता है। मां! मेरे मन में कुछ नहीं रहता, बस यही लगता है आप तो मेरे अपने हो, आपसे कोई औपचारिकता तो है नहीं, कोई बात कभी भी बता सकता हूं। घर में जैसा रहना चाहूंगा रह सकता हूं। आपका बेटा ही तो हूं जैसा पहले था वही अब हूं ना कुछ बदला ना ही बदलेगा। खैर! अबसे ध्यान रखूंगा जैसे ही कुछ सोचूंगा या ध्यान में आएगा आपको खबर करनी है फिर भी कभी भूल जाऊं तो आप बुरा ना मानना... क्योंकि वास्तव में इतना सब कुछ सोच-समझ नहीं पाता हूं ना ही इतना ख्याल रख पाता हूं। यह कह कर अपने कमरे में चला गया, पीछे-पीछे प्राची भी चली गई, अकेले रह गए बीना व सुबोध जी। बीना जी ऊपर छत की तरफ देख रही थीं और सुबोध जी उनका भावविहीन शून्य सा चेहरा, वो तो अब जानसमझ ही रहे थे ना तो बीना जी गलत हैं ना ही प्रियांक... दोनों ही बस एक- दूसरे से बंधे हैं किन्तु जि़ंदगी के एक मोड़ पर आकर कुछ रास्ते अपनों के बीच भी अलग-अलग हो जाते हैं, जिन पर साथ चलना मुश्किल हो जाता है, इसलिए राहें अलग कर देनी चाहिए फिर एक मोड़ पर आकर तो वापस मिल ही जाते हैं और उस समय साथ- साथ खुशी-खुशी चल पड़ते हैं। शायद अब हमारे लिए भी ऐसा ही समय आ गया है बस! प्यार से व धैर्य के साथ अब राहें जुदा करनी होंगी ताकि आपस में जुड़ाव बना रहे संग-साथ यूंही हरदम बना रहे निभता रहे।
सुबोध जी दो गिलास पानी व चाय बनाकर लाए साथ-साथ दोनों ही बिना बोले चुपचाप पीते रहे, पीकर थोड़ा अच्छा लगा। आंखों में नींद ना थी इसलिए बाहर बालकनी में आकर बैठ गए फिर सुबोध जी ने बोलना शुरू किया, 'बीना अब तुम्हें कुछ बातों को समझना होगा, दिल में अपनों के प्रति विश्वास रखना होगा। प्रियांक को लेकर अपने मन को समझा लो कि वो अब पहले वाला छोटा बच्चा नहीं है जो तुम्हारी उंगली पकड़कर चलता था, तुम्हारे दिखाए रास्ते पर ही चलते रहता है। अब वो बड़ा हो गया है, कुछ रास्ते उसने अपने अलग भी खोज लिए हैं, जहां उसको चलना है और उसके लिए यह जरूरी भी है, लेकिन अलग राह पर जाने के बावज़ूद पहले भी तुम्हारा था अब भी है और हमेशा तुम्हारा ही रहेगा। इस विश्वास की गांठ अपने दिल में लगा लो। हर बात का ऐसा-वैसा मतलब समझ बेफिज़ूल की बात पर तुम तो दुखी होती ही हो साथ ही सबके परेशान होने से घर का माहौल भी खुशनुमा नहीं रह पाता है। लेकिन हां! अत्यंत आवश्यक है कि इस भावना इस अहसास से अपने को अलग करो, मन को समझाओ कि अब प्रियांक सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ही नहीं है, उस पर अब प्राची का भी हक है, जिसके साथ उसकी एक अलग दुनिया है, जहां वो कुछ समय उसके साथ बिताना चाहता है। अपनी उम्मीदों को अपने सपनों को यथार्थ में देखना चाहता है। एक समय बाद पक्षी या जानवर तक अपनी संतान को अलग कर देते हैं, फिर हम तो मनुष्य हैं, सब कुछ जानते-समझते हैं इसलिए अनजान ना बने रहकर वास्तविकता में जीना सीखेंगे तभी अपने छोटे से परिवार अपने आशियाने को बांधकर रख सकेंगे, नहीं तो हमारे बच्चे निश्चित ही हमसे अलग हो अपने तरीके से जि़ंदगी जीने की सोचेंगे। यदि वास्तव में एक होकर एक साथ रहना चाहती हो तो प्रियांक के साथ ही प्राची पर भी भरोसा रखो कि वे हमसे कुछ नहीं छुपाते हैं। हमारे साथ ही अपने सपने पूरा करना चाहते हैं। ज़रूरी है हम अपनों के साथ इन प्यार भरे रिश्तों की अहमियत को समझें ताकि इन रिश्ते- नातों की मज़बूत नींव पर खड़े रहकर पल-पल प्रोत्साहित रह छोटी-बड़ी खुशियों को अपनी मुठ्ठी में कर लें अपनी उम्मीदों व सपनों को हकीकत में बदल सुखी व खुशहाल जि़ंदगी जीएं। अत: समझदारी और परिपक्वता के साथ अपने मन की हर उलझन खोल दो तथा एक सुलझे हुए मन-मस्तिष्क से अपने बच्चों को अपने आगोश में आलिंगन करने की सोचो, ऐसा बर्ताव करना कि प्यार रूपी डोर दूर जा भी रही हो तो अगले ही क्षण फिर तुम्हारे ही पास आ जाए, हमेशा के लिए सदा-सदा के लिए। बीना जी ने सभी बातें बड़ी तन्मयता से सुनीं अब सुबोध जी के समझाने पर बड़ी राहत महसूस कर रहीं थी मन की धुंध जो मिट गई थी। केवल उजाला ही उजाला आंखों के सामने था, कुछ देर बाद दोनों सोने के लिए चल दिए। अगली सुबह का स्वागत करने के लिए। सुबह जैसे ही प्रियांक उठा तब बीना जी नाश्ता लगा रही थीं... थोड़ी ही देर में प्राची भी तैयार हो आ गई दोनों को देखते ही बीना जी ने पहले सुबोध जी की तरफ देखा फिर मुस्कुराते हुए बोलीं... तुम दोनों केरल जा रहे हो खाने के लिए थोड़े से लड्डू-मठरी बना दूं या फिर वही पिज़्ज़ा-पास्ता ही खाना है। उनका बोलने का अंदाज़ ऐसा था कि प्रियांक एकाएक अचंभित हो उनकी तरफ देखता ही रह गया। फिर अचानक उसके मुंह से निकला- ओह! मेरी पहले वाली मां मुझे वापस मिल गई। मेरी मां अच्छी मां कहता रहा और गले लग गया। मां-बेटे का यह मधुर मिलन देख सुबोध जी व प्राची दोनों ही भावविभोर हो उनके पास चले गए फिर इस सुखद अनमोल क्षण में एक साथ चारों ने हाथ में हाथ लिए हमेशा ऐसे ही खुश रहने का मन ही मन निश्चय किया प्रण लिया...।
 

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