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घूंघट हटा था क्या? भाग-2

श्यौराज सिंह बेचैन

3rd March 2020

समाज में दलितों और स्त्रियों की दशा हमेशा दयनीय रही है... दलित जहां जातिवाद का शिकार होते रहे हैं, वहीं स्त्री चाहे किसी जाति-वर्ग से हो उसे भी समाज का तिरस्कार झेलना पड़ता है। ये कहानी समाज के इसी खोखलेपन की परतें खोलती हैं।

घूंघट हटा था क्या? भाग-2
लाड़ो का मन हुआ, उसे रथ-गाड़ी से उतर कर गर्म जोशी के साथ कौली भर कर,मासूमियत भरा बच्चू का मुंह चूम कर धन्यवाद करे। परन्तु वह परंपरा से बंधी थी। चूमना तो दूर, उसे घूंघट हटा कर भरी आंखों से देखना तक कल्पनातीत था। भाई-बापू की भी अपेक्षा यही थी कि सुसराल का एक घरेलू नौकर ही सही पर है तो पुरुष ही, लाड़ो तो इतनी अनुशासित बहू थी कि यदि बलाधीन के घर का कुत्ता भी आता तो वह उसके सम्मान में भी घूंघट नीचा कर लेती।
‘‘शाबाश बेटा, हम अभी गंगा नहाएंगे, तू लौट, हमें आगे चलना है। तू तो गंगा नहाएगा नहीं।' लाड़ो के पिता ने बच्चू से कहा।''जबकि बच्चू सोच रहा था कि काश कुछ दिन के लिए मालकिन घरेलू नौकर बनाकर वे उसे साथ ले जातीं। तो सुसराल में न सही मायके में तो कभी बिना घूंघट के नजर आतीं।‘बच्चू' पास आकर भी मालकिन का दीदार करने की अपनी हसरत पूरी नहीं कर सका। देखना चाहा तो वह घूंघट ही देख पाया। वह निराश हुआ, परन्तु उसने सोचा कि गंगाधाट तक तो वह रथ-गाड़ी के साथ जा ही सकता है।जी, आप मुझे इजाजत दें तो मैं साईकिल से आपके पीछे-पीछे गंगा तक चलना चाहूँगा। उसके मन में था, मालकिन कहीं पानी पीयेंगी तो घूंघट उठाएगी, गंगा में नहायेंगी तो घूंघट नहीं रख पाएंगी।
वह साइकिल कभी आगे ले जाता, कभी पीछे चलाता, परन्तु दस कोस की यात्रा में घूंघट नहीं उठ पाया और आखिर झक मार कर वह वापस लौट आया।कुछ दिन बाद वे वापस आ गईं और प्रसव-वेदना से ग्रसित हो गईं। लक्ष्मी से बोलीं ‘‘दीदी बच्चू को बुला दो, मैं उससे कहूँगी कि वह जल्दी से तुम्हारे भैया को वापस बुला लाए। तब तक किसी तरह मुझे अस्पताल पहुंचाया जाए।''बच्चू बैलों को सानी खिला रहा था। औरतें नई बहू की मुंह दिखाई करके लौट रही थीं। वे कहती जा रही थी- ‘कित्ती मलूक है, थक्क भूरी अंगरेजिन सी। पहले तो जाके पांव को धौवन हूँ नाय हती।' दूसरी को चाची कैसी बातें कर रही हो गोरी ही तो ना हती तनिक सांवरी हती पर नाक, नक्श बोल-चाल सब तरह गुनवती तो हती।'बच्चू को औरतों का वार्तालाप अजीब लग रहा था, कि उसकी मालकिन के हवाले से स्त्री की सीरत के बजाय सूरत पर बातें हो रही थीं। परन्तु इतनी प्रशंसा सुन कर उस खूबसूरत मुखड़े को देखने की इच्छा और बलवती हो उठी थी। पर उसे अपनी हदें मालूम थीं। अदृश्य बंधनों का एहसास था उसे।
बलाधीन एक साल से शुभ मुहूर्त निकलने के इंतजार में रखी, बड़ी बहू की अस्थियों को विसर्जन के लिए हरिद्वार गए। घर में कई और सदस्य थे वे लाड़ो की देख-भाल का जिम्मा उन्हें सोंप कर और बच्चू को खेत-क्वार, ढ़ोर-डांगर के ढेर सारे काम बता कर मुंह अंधेरे हरिद्वार को निकल गए। उनके जाने के चार-पांच घंटे बाद ही लाड़ो को प्रसूति के दर्द होने शुरू हो गए। लाड़ो ने तड़पते हुए ननद से कहा। ननद ने कहा- ‘‘धीरज धरो भाभी मैं कुछ करती हूं।'' वह भागी-भागी हवेली के बाहर पशुशाला की ओर निकली-‘‘बच्चू जल्दी आ तुम्हें, लाड़ो भाभी ने याद किया है।''‘याद किया है।' वाक्य उसके कानों में शरबत की तरह घुल गया। पर अगले ही क्षण उसने सुना-‘‘भाभी की तबियत खराब है,'' वे ‘कह रही है'। ‘क्या कह रही हैं? बच्चू ने उतावला होकर पूछा। ‘यही कि बच्चू कहां मर गया? वैसे तो बड़ा मालकिन-मालकिन करता फिरता था, अब मालकिन की जान पर बन आई है तो अस्पताल भी नहीं ले जा सकता?
‘‘तो मैं देखने चलूं?''बच्चू के चलने के इरादे से लक्ष्मी को याद आया।कहीं भाभी घूंघट नहीं रख पाई तो? अतः वह सोच कर बोली ‘नहीं, तुझे उनके पास चलते की जरूरत नहीं है, तू ऐसा कर बस में बैठ और अभी तुरंत हरिद्वार चला जा और भैया को जल्दी घर वापस बुला कर ले आ।
‘‘मैं हरिद्वार में उन्हें कहां ढूंढूगाँ?'' बच्चू ने सवाल किया। ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है, वे हमारे पुश्तैनी आश्रम पर ही जाते हैं। मैंने इस पर्चे में पता लिख दिया है। इतना तो तू पढ़ा-लिखा है ही। जा हरिद्वार पहुंच कर किसी से पूछ लेना। तू नहीं जाएगा तो हो सकता है आश्रम में शान्ति पाने के लिए वे दो-चार दिन वहीं रूक जाएं।''
‘‘तो मैं एक नजर मालकिन से मिल तो लूं।''यह वाक्य उसने जुबान से बाहर नहीं निकलने दिया और बोला-‘‘हवेली में चलूं क्या, मालकिन कुछ और कहें तो?'' ‘‘नहीं, वे कुछ नहीं कहेंगी, कुछ कहने-सुनने की स्थिति नहीं है उनकी। तू देर मत कर जल्दी जा । ले, सुपर फास्ट से जाना।'' पांच सौ का नोट हाथ पर रखते हुए लक्ष्मी ने कहा। बच्चू पहली बस से हरिद्वार को बैठ गया और लक्ष्मी लाड़ो के पास लौट आई। उसे देखते ही लाड़ो ने दर्द भरे स्वर में प्रश्न किया?‘‘बच्चू आया नहीं क्या?''
‘‘भाभी, मैंने उसे भैया को बुला लाने के लिए हरिद्वार भेज दिया है। लक्ष्मी से कहा ‘‘अरे! बच्चू मेरे लिए डाक्टर लाता या मुझे अस्पताल ले जाता अब कब वह हरिद्वार पहुंचेगा और वे कब आएंगे?' कराहते हुए कहा। इधर यह स्त्री घर में तड़प रही थी। घीसू-माधव की बुधिया की भांति, और बच्चू पहुंचने वाला था हरिद्वार। वह यात्रा भर लाड़ो की याद करता जा रहा था। कैसी रही होगी वह कभी घूंघट से बाहर नहीं देखा उनका मुखड़ा।
‘अब हम हरिद्वार पहुंच रहे हैं' परिचालक ने प्रसन्नता के स्वर में समाचार दिया।उतर कर बच्चू नियत स्थान पर पहुँचा तो आश्रम वालों ने बताया ‘चैधरी तो रात ही निकल गए थे ,अब तक तो वे घर भी पहुंच चुके होंगे। खासा दान-पुण्य करके गए हैं, अगले जन्म में उन्हें जरूर फल मिलेगा।''
बच्चू सुनकर पहले तो निराश हुआ, कि वह रात भर सफर करके आया और मालिक से नहीं मिल पाया । तो दूसरे ही क्षण उसे इस बात का संतोष हुआ कि चलो वे मालकिन के पास पहुंच गए होंगे। तो मालकिन की हिफाजत कर लेंगे, वे स्वस्थ हो जाएंगी तो शायद किसी दिन घूंघट से बाहर भी आएंगी। मुझे भी जल्दी लौटना चाहिए। सोचता हुआ वह ‘बस स्टाप' की ओर भाग छूटा और वापस आ रही उसी बस में जा बैठा। रास्ते भर सोचता जा रहा था कि अब तो वे माँ बन जायेंगी। बच्चा खिलाने बुलायेंगी। तब तो घूंघट हटायेंगी। 
उधर चौधरी बलाधीन वापस घर पहुंच गए। गाँव की सीमा में घुसते ही उन्हें अपनी पत्नी की हालत का पता चल गया। कोई इसे अस्पताल नहीं ले गया है। औरतें बतियाती जा रही थीं। बहुएं बेमौत ना मरेगी तो क्या अमर होंगी। बच्चियाँ बच्चे पैदा करेंगी तो कच्ची की काया का क्या होगा? घड़े की तरह फूट ही जाएंगी । हाथी चैधरी चुहिया पै चढ़ेगो तो, उन्हें मौत के मुह में धकेलेगो या जिंदगी की ओर? अरी मौत तो बाकी वाही दिन तय हो गई हती जब वह फूल सी बच्ची जा पत्थर से अधेड़ के संग बांध दई। आस-पास कोई डाक्टर नहीं था।  राजनीति को शिक्षा, चिकित्सा में उन्नति करना अभी प्राथमिक नहीं लग रहा था। सो उसका खामयाजा तो उठाना ही था। एक तो प्रसव प्रक्रिया में काफी रक्तस्राव हो गया था। दूसरे शहर जाने वाली लिंक रोड मे हाल की वरसात सें गहरे गढ्ढ़े हो गए थे । सो हिचकोलों से खून और अधिक निकल गया सो शहर पहुंचने से पहले ही लाड़ो दुनिया से दूर चल बसी। यहां तक कि बच्चा भी नहीं बच सका।  अगली सुबह बच्चू गांव लौटा तो वह श्मशान के रास्ते ही आ रहा था। वहां उसे पता चला कि मालकिन नहीं रहीं, बल्कि धू-धू जलती चिता  देख कर उसकी आंखे भर आईं। घर अन्य नौकर-चाकरों से पूछा- ‘तुमने किसी ने उनका मुखड़ा देखा था क्या? घूंघट हटा था क्या?          

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