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सतरंगी समरसता का संदेश देती है होली

डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर

9th March 2020

सतरंगी समरसता का संदेश देती है होली
हमारा देश भारत त्यौहारों का देश है। यहाँ हर दिन एक त्यौहार है। होली भारत का एक प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में जाना जाने लगा है। यह एक ऐसा रंगबिरंगा त्योहार है, जिसे  हर धर्म के लोग पूरे उत्साह और मस्ती के साथ मनाते हैं। प्यार भरे रंगों से सजा यह पर्व हर धर्म, संप्रदाय, जाति के बंधन खोलकर भाई-चारे का संदेश देता है। इस दिन सारे लोग अपने पुराने गिले-शिकवे भूल कर गले लगते हैं और एक दूजे को गुलाल लगाते हैं। बच्चे और युवा रंगों से खेलते हैं। होली के साथ अनेक कथाएं जुड़ीं हैं। होली मनाने के एक रात पहले होली को जलाया जाता है। इसके पीछे एक लोकप्रिय पौराणिक कथा है। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा के माध्यम से हमें  बोध दिया जाता रहा है। मनुष्य जीवन में ही यह सम्भावना है कि हम अपने भीतर रही बुराइयों, कमियों, दोषों को देखें, समझे और उनकी व्यर्थता समझ कर उनसे मुक्त हों। अवलोकन की अग्नि में हम जैसे -जैसे प्रवेश करते हैं वैसे- वैसे हमारे भीतर के दोष उघड़ते हैं, उड़ते हैं, और अच्छाई प्रकटती है।
यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। होली का उत्सव अपने साथ सकारात्मक ऊर्जा लेकर आता है और आसमान में बिखरे गुलाल की तरह ऊर्जा को चारों ओर बिखेर देता है।यह त्यौहार बुराई की सत्ता पर अच्छाई की विजय का भी संकेत है। यह ऐसा त्यौहार है जब लोग एक दूसरे से मिलते हैं, हँसते हैं, समस्याओं को भूल जाते हैं और एक दूसरे को माफ करके रिश्तों का पुनरुत्थान करते हैं। यह बहुत सारी मस्ती और उल्लास की गतिविधियों का त्यौहार है जो लोगों को एक ही स्थान पर बाँधता है। हर किसी के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान होती है और अपनी खुशी को दिखाने के लिए वे नए कपड़े पहनते हैं।
यह भारतीय समाज में लोकजनों की भावनाओं को अभिव्यक्त करने का आईना है। परिवार को समाज से जोड़ने के लिए होली जैसे पर्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।होली के दिन सभी लोगो को अपनी बुराइयों को जला कर नष्ट कर देना चाहिए। यह आनन्द , मस्ती , उत्साह , उमंग का त्यौहार है। मंजीरा, ढोलक, मृदंग की ध्वनि से गूंजता रंगों से भरा होली का त्योहार, फाल्गुन माह के पूर्णिमा को मनाया जाता है। मार्च का महिना जैसे होली के उत्तेजना को बढ़ा देता है। इस त्योहर में सभी की ऊर्जा देखते बनती है पर होली के अवसर पर सबसे अधिक खुश होते हमने बच्चों को देखा है वह रंग-बिरंगी पिचकारी को अपने सीने से लगाए, सब पर रंग डालते और जोर-जोर से "होली है.." कहते पूरे मोहल्ले में भागते फिरते हैं। होली त्यौहार अपने साथ कई सन्देश लाता है| ये त्यौहार हमें भेद भाव और नफरत जैसी बुराईयों से दूर रहने की सलाह देती है| ये त्यौहार मिलन और दोस्ती की माहौल बना कर हर किसी के दिल में खुशियाँ भर देती है।
होली महोत्सव मनाने के पीछे लोगों की एक मजबूत सांस्कृतिक धारणा है। इस त्योहार का जश्न मनाने के पीछे विविध गाथाऍ लोगों का बुराई पर सच्चाई की शक्ति की जीत पर पूर्ण विश्वास है।असल में होली बुराइयों के विरुद्ध उठा एक प्रयत्न है। इसी से जिंदगी जीने का नया अंदाज मिलता है, औरों के दुख-दर्द को बांटा जाता है, बिखरती मानवीय संवदेनाओं को जोड़ा जाता है। होली का त्यौहार हमारे भीतर के अहंकार और अन्य बुराइयों को अग्नि में विसर्जित कर देने का प्रतीक है। अहंकार जाने के बाद ही हमारे भीतर प्रेम का उदय होता है और समाज में सतरंगी समरसता आती है व एकता मजबूत होती है।होलिकोत्सव आध्यात्मिक पर्व होने के साथ-साथ सामाजिक त्योहार भी है। इसमें वर्ण अथवा जातिभेद का कोई स्थान नहीं है। इसे समाज के सभी वर्ग मिल-जुलकर एकसाथ मनाते हैं। सही मायनों में होली सबका त्योहार है, जिसमें हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद तथा आनंद-उल्लास सभी कुछ है। इस त्योहार से सामाजिक समरसता की भावना प्रसारित होती है। इससे राष्ट्रीय एकता को भी बल मिलता है।
होली के इस त्योहार का दूसरा पहलू भी उत्सव से भरपूर है। होलिका दहन में अच्छाई की जब बुराई पर जीत हो जाती है तो अग्नि के सन्मुख और अग्नि की साक्षी में साधक यह प्रतिज्ञा लेता है कि अच्छाई के इस रंग में अब हम सभी को रंगने की समग्र कोशिश करेंगें। मनुष्य जीवन का यही सर्वशास्त्रमान्य उद्देश्य है कि पहले स्वयं अपने भीतर शुद्धता प्रकटाना और फिर उस शुद्धि के रंग में सभी को रंगना। इसलिए होली के दिन हम सभी को रंग में रंगते हैं।होली को कई राज्यो में अलग अलग नामो से जाना जाता हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में इसे वसन्तोत्सव कहते है। पंजाब में इसे होला मोहल्ला कहा जाता हैं।रीति-रिवाज़ों और परम्पराओं के अनुसार होली उत्तर प्रदेश में 'लट्ठमार होली' के रूप में, असम में 'फगवाह' या 'देओल', बंगाल में 'ढोलपूर्णिमा' और नेपाल आदि में 'फागु' नामों से लोकप्रिय है। ब्रज की होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाने की होली, काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है। जैन परंपरा में आध्यात्मिक रूप से होली का महत्व है।
इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहना चाहिए। बच्चों को भी सावधानी रखनी चाहिए। बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही होली खेलना चाहिए। दूर से गुब्बारे फेंकने से आंखों में घाव भी हो सकता है। रंगों को भी आंखों और अन्य अंदरूनी अंगों में जाने से रोकना चाहिए। पहले होली के मोहक रंगों की फुहार से जहां प्यार, स्नेह और अपनत्व बिखरता था, आज वहीं खतरनाक केमिकल, गुलाल और नकली रंगों से अनेक बीमारियां बढ़ रही हैं और मनों की दूरियां भी। हम होली कैसे खेलें? किसके साथ खेंले और होली को कैसे अध्यात्म संस्कृतिपरक बनाएं? 
यह  त्यौहार मिलजुल कर मनाना चाहिए।यह भी देखा जाता है कि लोग होली के रंग में रंगकर शत्रुता त्याग देते हैं और वर्षो पुराने दुश्मन दोस्त बन जाते हैं। होलिका की अग्नि में शत्रुता का भाव भस्म हो जाता है और नफरत खत्म हो जाती है। होली का आनंद मन को प्रेम के रंग में डुबो देता है और मित्रता की इच्छा को जाग्रत कर देता है। वस्तुत: होली मित्रता और एकता का पर्व है। इस दिन द्वेषभाव भूलकर सबसे प्रेम से मिलना चाहिए। तभी इस त्योहार को मनाना सार्थक सिद्ध होगा। होली के आनंद को सब में बांटना चाहिए।
होली यह संदेश लेकर आती है कि जीवन में आनंद, प्रेम, संतोष एवं दिव्यता होनी चाहिए। जब मनुष्य इन सबका अनुभव करता है, तो उसके अंतःकरण में उत्सव का भाव पैदा होता है, जिससे जीवन स्वाभाविक रूप से रंगमय हो जाता हैं। 
यह संसार रंगभरा है। प्रकृति की तरह ही रंगों का प्रभाव हमारी भावनाओं और संवेदनाओं पर पडता है। जैसे क्रोध का लाल, ईर्ष्या का हरा, आनंद और जीवंतता का पीला, प्रेम का गुलाबी, विस्तार के लिए नीला, शांति के लिए सफेद, त्याग के लिए केसरिया और ज्ञान के लिए जामुनी। प्रत्येक मनुष्य रंगों का एक फव्वारा है। रंगों का पर्व यह भी सिखाता है कि काम, क्रोध, मद, मोह एवं लोभ रुपी दोषों को त्यागकर ईश्वर भक्ति में मन लगाना चाहिए।
सौहार्दपूर्ण ढंग से होली खेलने से आस-पास की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, वहीं सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
रंगों के होते कई नाम 
कोई कहे लाल कोई कहे पीला
हम तो जाने बस खुशियों की होली 
राग द्वेष मिटाओं और मनाओ होली।।

 

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