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समाधान

श्रीप्रकाश श्रीवास्तव

11th March 2020

मानवीय जीवन रिश्तों की खूबसूरत डोर से बंधा है, कई बार इन रिश्तों की डोर में कुछ ऐसी गिरहें बन जाती हैं जिन्हें सुलझाना मुश्किल हो जाता है...

रात ग्यारह बज रहे थे। लगभग मैं सोने की स्थिति में थी कि प्रतिमा मौसी का फोन आया। उनके स्वर में दर्द की कराह थी। ''अलका,मेरे घुटनों में बेतहाशा दर्द हो रहा है। आखरी शब्द कहते कहते उनका गला रूध गया। ऐसा पहली बार हुआ जब मैंने प्रतिमा मौसी को सुबकते हुए पाया। चलना फिरना उनका पहले से ही न के बराबर था। भारी बदन होने के कारण उनकी तकलीफ कुछ ज्यादा ही थी। डाक्टर का कहना था कि उनका घुटना खराब हो चुका है। ऑपरेशन ही विकल्प है। ऑपेरशन के नाम से ही उन्हे डर लगता। क्या पता ऑपरेशन के बाद भी घुटना ठीक न हो? फिर जो थोडा बहुत उठना बैठना है वह भी खत्म हो जाए तब तो वह कहीं की नहीं रहेगी।''मौसी, आप परेशान मत होइए सब ठीक हो जाएगा। श्रवण को फोन किया? ''हां कर दिया है। सुबह की फ्लाइट से आ जाएगा। सुनकर मुझे तसल्ली हुई। श्रवण प्रतिमा मौसी का इकलौता लडका था। शादी के बारह साल बाद श्रवण का जन्म हुआ। किसी ने कहा छठ मैया का व्रत करो गोद अवश्य भरेगी। उन्हे यह व्रत निराशा के बीच आशा की एक किरण सी लगी। सो एक बार जो ठाना तो पूरी निष्ठा के साथ निराजल अबतक रहती रही। पिछले साल ही उन्होने यह व्रत छोड़ा। वह भी तब जब शरीर ने जवाब दे दिया। छठ माई से मांगी ,''मां, मेरे बेटे की रक्षा करना। वे चाहती थी कि उनकी बहू अपूर्वा इस व्रत को जारी रखे। दबे स्वर में उन्हेाने अपनी इच्छा जाहिर भी की मगर अपूर्वा ने हंस कर टाल दिया। आधुनिक परिवेश में पली बढी अपूर्वा को यह सब ढकोसला लगता। 
श्रवण शुरू से ही प्रतिभाशाली था। मौसी के लाड प्यार ने उसे बिगाडा नहीं। मौसी का लाड-प्यार अनुशासित था। उन्होंने श्रवण को कभी इतनी छूट नहीं दी कि वह गलत लोगो का साथ पकड़े। स्कूल से घर, घर से स्कूल। पढ़ाई को लेकर वे इतनी सख्त थी कि पढाई की लापरवाही पर दोचार झापड़ लगाने में भी न हिचकती। प्यार दुलार एक सीमा तक। मगर पढाई से कोई समझौता नहीं। इसी का नतीजा था कि श्रवण एक नामी कंपनी में इजींनियर बन गया। उनके संस्कारों में कहां कमी रह गई जो नौकरी पाते ही मां बाप की ख्वाहिशों को कुचलते हुए वह एक पल नहीं हिचका। 
वह श्रवण जिसने कभी अपने मां-बाप के सामने मुख तक नहीं खोला वही एक सामान्य सी दिखने वाली अपूर्वा के लिए इस कदर मुखर हो गया कि अपनी मां से जवाब सवाल तक करने लगा। वह मां जिसने नौ माह उसे पेट में रखा, जिसने न दिन देखा न ही रात, न जाड़ा देखा न बरसात, क्या वह मां उसकी नजरों में कुछ नही? क्या मां के कर्ज से कोई पुत्र उऋण हो सकता है? क्या यह भी श्रवण को समझाना पड़ेगा? सोचकर मुझे तीव्र कोध्र आया। उस सामान्य सी दिखने वाली लडकी ने उसे इस कदर मोहाछन्न कर दिया था कि मौसी का हर सकरात्मक तर्क उसके सामने बेमानी था। जैसे मौसी ने कहा, ''मुझे वह लडकी इसलिए पसंद नहीं है क्योंकि वह हैदराबाद की रहने वाली है। उसके संस्कार, रहनसहन, हमसे अलग है। हम ठहरे पूर्वांचल के। इसलिए मैं चाहती हूं कि तुम भी इसी क्षेत्र की लड़की से शादी करो और जाने सुने परिवार में करो। ताकि एक मुकम्मल 
रिश्ता कायम हो सके। लाख तर्क दी प्रतिमा मौसी ने मगर श्रवण टस से मस नहीं हुआ। उससे शादी करके ही माना। शादी धूमधाम से हुई मगर बेमन से। अब जबकि शादी हो गई तो प्रतिमा मौसी क्या कहे? जहां जाती अपनी बहू अपूर्वा की बड़ाई ही करती। वैसे भी हर मांए अपने बेटे-बहू के ऐब ढकने की कोशिश में ही रहती है। प्रतिमा मौसी का यह स्वभाव शुरू से था। वे जल्दी अपने बच्चों की खामियां दूसरों के सामने जाहिर नहीं होने देती थी। जबकि दूसरों का खोजबीन उनकी आदतों में शामिल था। एक दिन कहने लगी, अपूर्वा का स्वभाव बहुत अच्छा है। पढ़ी लिखी है। रंग भले ही थोडा दबा है तो क्या हुआ। गुणी तो है। कहकर वे क्षणांश उदास हो गई। मगर अगले ही पल खुद को संयत किया।
कहीं न कहीं दहेज न मिलने व अपूर्वा का दबा रंग उनके अंह पर चोट पहुंचाता मगर भरसक जाहिर होने न देती। आगे कही ,''औरत का गुण ही सब कुछ है। समझने वाला क्या समझता नहीं था। मगर क्यों किसी की दुखती रग पर नमक छिड़का जाए। यही सोचकर मैं भी चुप रहती। कुल एक महीना रहने के बाद अपूर्वा, श्रवण के साथ हैदराबाद चली गई। प्रतिमा मौसी जैसे तब अकेली थी वैसे आज भी अकेली रह गई। कितनी हसरत थी बहू के आने के बाद घर गृहस्थी से मुक्त होकर अपने मन की जिंदगी जीने की। अपने पोता पेाती के साथ अपने जीवन के अनुभव बांटने की। पर क्या सोचा हुआ काम कभी पूरा नहीं होता है? शायद नहीं। दिल की हसरत दिल में ही रह गई। भींगी पलकों के साथ उन्होने दोनों को विदा किया। वह रात उन्होने सुबकते हुए गुजारी। आज उनके कलेजे का टुकड़े पर किसी और का अधिकार हो गया। जितना सोचती दिल उतना ही डूबने लगता। उन्हें अपने श्रवण पर नाज था। शुरू से ही श्रवण अपने मां पिता का आज्ञाकारी बेटा था। उसने कभी भी अपने मां बाप की अवहेलना नहीं की। प्रतिमा मौसी आज के युवाओं से अब अपने बेटे की तुलना करती तो उनका सिर गर्व से तन जाता। आज उसी बेटे ने 
जमाने के सामने उनका सिर शर्म से झुका दिया।
बुढ़ापे का शरीर, उनसे काम धाम होता नहीं था। कभी शुगर तो कभी ब्लड प्रेशर को लेकर वे अक्सर परेशान रहती। बीमारी के चलते कई बार श्रवण को बनारस आना पड़ता। श्रवण चाहता था कि मां उसके साथ हैदराबाद चलकर रहे। मगर उनका बनारस मोह छूटता नहीं था। इस बार जब घुटनों ने जवाब दे दिया तो श्रवण ने साफ साफ शब्दों में कहा कि वह बार बार बनारस नहीं आ सकता। काम का हर्ज होता है। बेहतर होगा आप मेरे साथ वही चलकर रहिए। रिश्तेदारों, पड़ोसियों का भी यही मत था। लिहाजा वे उसके साथ हैदराबाद चली गई। श्रवण ने तीन कमरों का एक फ्लैट खरीदा था। एक कमरा उसने प्रतिमा मौसी को दे दिया। कमरे में हर सुख सुविधा मौजूद था। खाना बनाने के लिए एक आया थी जो सुबह शाम खाना बनाकर देती। दवा देने के लिए एक नर्स थी। जो घुटनों के ऑपरेशन के बाद श्रवण ने उनके लिए रखी थी ताकि समय समय पर उन्हें दवाईयां वगैरह देती रहे। बहुराष्ट्रीय कंपनी में भले ही रूपया बहुत है मगर जिंदगी एक मशीन बनकर रह जाती है। श्रवण एक सुबह जाता तो रात नौ से पहले नहीं लौटता। इस बीच वह सुबह ऑफिस जाते समय और रात घर लौटने पर मां का हाल जरूर लेता। सारी सुख सुविधा थी मगर नहीं थी तो अपूर्वा का अपनापन जो प्रतिमा मौसी उससे चाहती थी। पूरे कमरे में वे अकेले पड़ी रहती मगर एक बार भी अपूर्वा उनका हाल लेने नहीं आती। श्रवण के ऑफिस जाने के बाद अपूर्वा पूरे दिन घर से गायब रहती। कार लेकर या तो अपने मां बाप के पास चली जाती या फिर किटी पार्टी 
में। अनापशनाप रूपया खर्च करना उसका प्रिय शगल था। पत्नी के मोहजाल में फंसा श्रवण कुछ भी बोलने से कतराता। ऐसा नहीं कि मां की जिम्मेदारी निभाने में उसने कोई कसर छोड़ी हो। शहर के अच्छे से अच्छे डॉक्टर को सेवाएं ली। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए पांच लाख खर्च होने की बात कही। श्रवण को कोई एतराज नहीं था। मगर अपूर्वा ने सुना तो मुंह बना लिया। पहले तो श्रवण ने टाला मगर जब अति हो गया तो पूछा, ''तुम्हारा मूड बिगड़ा क्यों है? क्यों नहीं बिगड़ेगा? पांच लाख क्या फोकट में आता है?
''आहिस्ता बोलो मम्मी सुन लेगी?श्रवण ने उसके मुख पर हाथ रखना चाहा तो उसने झटक दिया। त्यौरियां चढ़ाकर बोली, ''आए दिन उनकी बीमारी के चलते तुम रूपया पानी की तरह बहाते हो। इससे अच्छा मर क्यों नहीं जाती? सुनकर श्रवण का मन तृप्त हो गया। प्रतिमा मौसी अपूर्वा के इस स्वभाव से पहली बार अवगत हुई। उन्हें उससे इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नही थी। माना कि वह उन्हे पसंद नहीं करती पर इस कदर मुंहफट होना क्या उचित है? एक तरह से उसकी प्रतिक्रिया ने उनके दिल को छलनी कर दिया। उसी समय उन्होने मन बना लिया था कि अब 
कभी भी हैदराबाद नहीं आउंगी। फोन से उन्होने अपना दुख को बांटने हुए मुझसें कहा भी कि मैं कभी भी नहीं चाहूंगी कि मेरा कोई रिश्तेदार यंहा आए। मौसी ने महसूस किया कि अपूर्वा को सिर्फ अपने पति और मायका के ही लोग पसंद थे। उसे रिश्ते की कशिश का एहसास ही नहीं था। वह तो रिश्ते की अहमियत ही नहीं समझती थी। इस कदर खुदगर्ज थी। मेरे हिसाब से इसमें मां बाप का दोष ज्यादा था, जो तंगदिल थे। अब इसे श्रवण की शराफत कहे या कमजोरी वह अपूर्वा के खिलाफ सख्त रवैया नहीं अपना पाता। एक तरह मां का मोह तो दूसरी तरफ अपूर्वा का कृपण प्रेम। सामंजस्य के नाम पर वह अधिक से अधिक मां के लिए अच्छे से अच्छे इलाज की व्यवस्था कर सकता था। मगर काम की व्यस्तता के चलते उनकी सेवा सुश्रुषा कर पाना उसके लिए संभव नहीं था। इसके लिए वह अपूर्वा पर वह कोई दबाव भी नहीं डाल सकता था। दबाव का 
मतलब उसकी नाराजगी। जो उसे कत्तई बर्दाश्त नहीं था। अपूर्वा का एक पल का भी बिछोह उसके लिए असहनीय था। 
पूरे दो दिन छुट्टी लेकर श्रवण ने प्रतिमा मौसी के घुटनों का ऑपरेशन करवाया। अपूर्वा एक दिन भी उन्हे देखने नहीं गई। उसे तो बस रूपयों की चिंता थी। श्रवण ने इस मामले में अपूर्वा की एक न सुनी। हां, उसे यह समझाने मे सफल हो गया कि ये सारे रूपये उसे मेडीक्लेम के रूप में कंपनी से मिल जाएगी। इस लिए वह थोड़ी शांत थी। मैं सोचती आज की युवा पीढ़ी क्या हो गया है? लोग रूपयों की इतनी प्राथमिकता क्यों दे रहे है?आज का युवा पीढ़ी यह क्यों नहीं सोचता कि कल वह भी बुढ़ा और अशक्त होगा। उसे भी अपने बच्चों की सहारे की जरूरत होगी। अगर उनका भी बेटा उन्हे रूपयों की लालच में मंझधार में छोड़कर अपने पत्नी बेटे में रम जाए तब वे कहां जाएगे? क्या वे कभी बूढ़े नहीं होगे? हर सुबह की शाम होती है, हर शाम का अंधेरा। प्रकृति के मार से कोई बच पाया है? काश इस कटु सत्य का सबको एहसास हो तो ऐसी समस्या ही न पैदा हो।प्रतिमा मौसी से कुछ भी छुपा न था। जिस तरीके से अपूर्वा ने श्रवण से उसके लिए तकरार की उसने सब सुना। अपूर्वा उन्हें एक पल बर्दाश्य करने वाली नहीं थी। ताउम्र की तो बात ही छोडिय़े। वह भी समझ चुकी थी श्रवण के बस में नहीं है अपूर्वा को संभालना। जब अपने बेटे में ही कूवत नहीं है तो वह किस बलबूते पर यहां रहे।प्रतिमा मौसी को ऑपरेशन से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।
हैदराबाद रहना उनके लिए जेल से कम नहीं था। जब कोई बोलने बतियाने वाला न हो तो जेल ही था वह कमरा जहां वे रह रही थी। उसपर अपूर्वा के वक्त बेवक्त ताने जो वह श्रवण को सुनाती थी। वे समझ चुकी थी कि यहां शेष जीवन काटना आसान नहीं। मन तो उनका भी नहीं लग रहा था। उसपर अपूर्वा की बेरूखी रही सही कसर पूरी कर रहा था। वे यह सोचकर सिहर उठती कि आज तो उनके पति जिंदा है तो बनारस में रह लेगी मगर जब उनके पति नहीं रहेगे तो हार कर यही आना होगा तब कैसे रह पायेगी? सोचकर उनका दिल बैठने लगा। अनायास उन्हे मेरी याद आने लगी। जब पहली बार श्रवण की नौकरी लगी थी तब मैंने उनको एक रिश्ता बताया था। लड़की सामान्य थी मगर पढ़ी लिखी संस्कारों वाली थी। रंग थोड़ा दबा था। तो क्या प्रतिमा मौसी का रंग नहीं दबा था? क्या मौसा ने उनसे शादी नहीं की? प्रतिमा मौसी ने क्या अपनी गृहस्थी सुचारू रूप से नहीं चलाया? मुझे नहीं लगता कि मौसा जी ने उनके सुघड़ता को लेकर कभी टीका टिप्पणी की होगी? शक्ल सूरत का क्या? वह तो दोचार दिन के लिए होता है असल जिंदगी तो ऐसी ही स्त्री के साथ निभती है जो अपनी परिवारिक जिम्मेदारी को ईमानदारी से निभाये। 
प्रतिमा मौसी से किसी को शिकायत नहीं रही। घर परिवार रिश्ते-नातों के साथ इस कदर सामंजस्य बिठाया। मगर पता नहीं अब मौसी को एकाएक क्या हो गया जो श्रवण की नौकरी लगती ही ऐसी बहू की आस लगा बैठी जो जन्नत की हूर से कम न हो। कहने लगी, ''मेरे लड़के का रंग दबा है अब अगर लड़की का रंग भी दबा होगा तो आने वाली संताने भी वैसी ही सांवली पैदा होगी। मैं नहीं चाहती कि मेरे बेटे को अपनी बेटी के लिए रिश्ता ढूढंने में परेशानी हो। मौसी भविष्य को लेकर बैठ गई। मानो वह उनकी मुठ्ठी में है। हम योजना बनते है मगर कुछ चीजें सिर्फ प्रकृति के हाथ में होती है। क्या उन्हें मालूम था कि उनका बेटा प्रतिभाशाली हेागा? या फिर उनके घर ऐसी बहू आएगी जो सेवा करना तो दूर उन्हे देखना तक पसंद नहीं करेगी। बहरहाल गुजरा वक्त वापस नहीं आता। सिवाय झनकने के उनके पास कुछ नहीं था। स्टेशन पर उन्हे छोडऩे सिर्फ श्रवण आया। 
अपूर्वा ने बहाना बनाया कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए वह नहीं चल सकती। प्रतिमा मौसी क्या नहीं जानती थी कि अपूर्वा की कितनी तबीयत खराब है? मगर चुप रही। डिब्बे में बिठाने के बाद जब चरण धूलि ले कर श्रवण लौटने के लिए उद्यत हुआ तो उनकी आंखे भर आई। श्रवण भी अपने जज्बातो पर नियंत्रण न रख सका। भरे कंठ से बोला, मम्मी, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी सेवा नहीं कर पाया। नाक सुघड़ते हुए प्रतिमा मौसी बोली,'' तू अपने को क्यों गुनहगार मानता है। सब समय-समय का फेर है।
मैं अतीत से वर्तमान में आई। अगले दिन मैंने भी मौसी जी को देखने का मन बनाया। श्रवण और उसकी बड़ी बहन पूनम, जो अपने परिवार के साथ दिल्ली में रहती थी वह भी आ चुकी थी। चर्चा शुरू हुई तो मुझसे रहा न गया। ''मौसी जी, आज मौसा जी जिंदा है तो आप दोनो रह ले रही है कल अगर वह नहीं रहे तो एक न एक दिन आपको श्रवण के पास ही जाना होगा तब क्या करेगी? मेरे सवाल पर उन्होंने चुप्पी साध ली। वही पास बैठे मौसा जी से रहा न गया तो सारोष बोले, ''पूनम के यहां रहेंगे। मैंने पूनम का मुंह देखा तो लगा वह मौसा जी के इस फैसले से संतुष्ट नहीं थी। जाहिर है उसके पति की मंजूरी होगी तब तो वह वहां रहेगे। पति सोचेगा जब बेटा है तो मैं क्यों जहमत उठाउं। एकपल पूनम को मां-बाप से मोह हो सकता है मगर उसके पति को क्यो होगा? शायद इसी उधेड़बुन के चलते वह कुछ बोलने से परहेज की? कुछ सोचकर मैंने श्रवण 
से पूछा, तुम्हे इन्हें रखने में दिक्कत है? श्रवण ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर एकाएक क्या सूझा लगा फट पड़ा। ''मुझे कुछ समझ में नही आ रहा है कि क्या करूं। एक तरह अपूर्वा दूसरी तरह ये लोग। न अर्पूवा अपने रवैये में बदलाव लाना चाहती है न इनमें कोई सुधार की गुंजाइश है। अब आपही बताइये दीदी मैं क्ंया करूं?ÓÓ ऐसा लगा मानो रो देगा। क्षणांश यह सब देखकर मेरा मन भींग गया। अब तक तो मैं श्रवण को ही दोषी मानती थी मगर पहली बार लगा श्रवण का उतना दोष नही है जितना मैंने सोचा था। उसका दोष इतना था कि उसने अपनी पसंद की लड़की से शादी की थी जिसे मौसी जी ने कभी नहीं स्वीकारा? बहू को लेकर जो नकारात्मक भाव उनके मन में पड़ गये तो कभी गये नही। उसी नजरिये से वह उसे देखती रही। इसलिए उसकी हर गतिविधि उन्हे नागवर लगती रही। अगर वह अपने पसंद की लडकी से शादी करती तो क्या वह अपूर्वा की तरह नहीं होती? इसकी क्या गारंटी थी। अभी इन सब बातों पर चर्चा चल रही थी कि एकाएक फोन आया। श्रवण उठकर बारामदे में आया। 
मेरा अनुमान था कि अपूर्वा का हेागा। दो मिनट बाद श्रवण हमलोगो के पास आया। वह घबराया हुआ था।''अपूर्वा का एक्सीडेंट हो गया है। वह अस्पताल में है। मुझे अभी जाना होगा। जानकर सभी घबरा गये। तत्काल श्रवण ने अपने सामान पैक किये। अब सिर्फ फ्लाइट की बुकिंग करनी थी। मैंने महसूस किया कि वह मुझसे कुछ कहना चाह रहा था। मगर संकोचवश कह नहीं पा रहा था। मैंने उसके संकोच को तोड़ा। 'परेशान होना स्वभाविक है। पर हिम्मत मत हारना सब ठीक हो जाएगा। मेरे अपनेपन की तपीश पाकर वह द्रवित हो गया। ''दीदी, क्या आप मेरे साथ कुछ दिनों के लिए हैदराबाद चलेगी।इस अप्रत्याशित सवाल के लिए मैं तैयार नही थी। उधेड़बुन में पड गई। न हां कहते बन रहा था नही ही ना। पति की रजामंदी मिलेगी तभी तो जाने के लिए हामी भरूंगी। हैदराबाद जाने के मतलब अपने घर को डिस्टर्ब करना। कौन पति चाहेगा? कुछ सोचकर बोली। ''एक बार तुम्हारे जीजा जी से पूछ लूं। इस बीच मेरे मन में यह ख्याल आया कि वह अपनी सगी बहन पूनम से क्यों नही कह रहा है। आखिर हक तो उसी का बनता है? मैंने श्रवण का ध्यान इस ओर खींचा। ''यहां मम्मी का देखभाल कौन करेगा।मुझे उसका जबाब उचित लगा। पति ने स्वीकृति तो दे दी मगर जल्द लौटने को भी कहा। मेरे पास थोड़े से कपड़े थे। ''दीदी, आप उसकी चिंता मत करे। मैं वहां आपके लिए खरीद दूंगा। श्रवण बोला।एक हफ्ते बाद जब मैं हैदराबाद से वापस आने लगी तो मैंने महसूस किया कि अपूर्वा मुझसे कुछ कहना चाहती थी। मैंनें उसकी 
मदद की ।
''दीदी, मैं आपका यह उपकार जिंदगी भर नहीं भूलूंगी।''यह तो मेरा फर्ज था। अब हम अपने लोगों के लिए बुरे वक्त में नहीं खड़े होंगे तो कौन होगा। आखिर रिश्ते नाते इसी दिनों के लिए ही तो निभाए जाते हैं। उसके आंखे पनीली हो गईं। भरे कंठ से बोली, ''आप ने मेरी आंखे खोल दी।'वह कैसे? मैं मुस्कुरायी।''मैंने अपने सासससुर को हमेशा गैर समझा। सेाचती थी जो है सो मेरा पति और मेरे मां-बाप। कभी यह ख्याल नहीं आया कि मेरे ससुराल वाले भी मेरे अपने है। वह कहती रही। 'उस वक्त मेंरा मन और भी तृप्त हो गया जब मेरी सास ने मेरी आलेाचना की। अगर वह एक बार मेरे प्रति अपनापन दिखाती तो निश्चय ही मेरे मन पर दूसरा असर पड़ता। मैं उसके कथन का आशय समझ न सकी। पूछी, ऐसा क्या कर दिया तुम्हारी सास ने? 'आपको क्या समझाना। आप सब जानती हैं दीदी। आप बताइये क्या उन्होंने मुझे कभी मन से स्वीकारा? क्या वह मुझे ताना नहीं मारती थी कि मैंने श्रवण को बरगलाकर शादी कर ली। अपूर्वा के कथन में सच्चाई थी। मौसी जी ने कभी भी उसे दिल से नहीं स्वीकारा। जब दिल ही नहीं मिला तो प्रेम कहां से मिलेगा। कहते है हर समस्या का निदान है। बशर्ते हम उसपर ईमानदारी से विचार करें। मौसी ने अपूर्वा में हजार खोट देख लिए मगर खुद में एक भी नहीं देखा। बस एक ही रट लगाई रही कि श्रवण मेरा खून है जिसे अपूर्वा ने छीन लिया। अपूर्वा चल पाने में असमर्थ थी जिसपर उठकर मुझे दरवाजे तक छोडऩा चाहा जो मैंने मना कर दिया। इसबीच कुछ सोचने का मौका मिला, बोली, ''आज तुम्हारे सास ससुर को तुम्हारी बेहद जरूरत है। क्या उन्हें अपने पास रखना चाहोगी? ''दीदी, हो सकता है कि मैंने कुछ नादानी की। मगर आज आपको देखकर लगता है कि काश आप पहले आई होती तो निश्चय ही मेरी नादानी पर अंकुश लगता। आप सगी ननद न होते हुए भी मेरी देखभाल के लिए उतनी दूर से भागीभागी चली आई। क्या अब भी इस सवाल का जवाब देने के लिए कुछ रह गया है। जाहिर है अपूर्वा को अपनी गलती पर अफसोस था। मैं खुशी से आह्लादित थी। सोचने लगी काश पंख होते तो तुरंत उड़कर मौसी जी के पास पहुंचकर यह खबर देती कि अब अपूर्वा पहले जैसी नहीं रही। जब वह बदल गई है तो उन्हें भी बदलना होगा। अपूर्वा चल पाने में असमर्थ थी जिसपर उठकर मुझे दरवाजे तक छोडऩा चाहा जो मैंने मना कर दिया। इसबीच कुछ सोचने का मौका मिला, बोली, 'आज तुम्हारे सास ससुर को तुम्हारी बेहद जरूरत है। क्या उन्हें अपने पास रखना चाहोगी?
''दीदी, हो सकता है कि मैंने कुछ नादानी की। मगर आज आपको देखकर लगता है कि काश आप पहले आई होती तो निश्चय ही मेरी नादानी पर अंकुश लगता। आप सगी ननद न होते हुए भी मेरी देखभाल के लिए उतनी दूर से भागीभागी चली आई। क्या अब भी इस सवाल का जवाब देने के लिए कुछ रह गया है।जाहिर है अपूर्वा को अपनी गलती पर अफसोस था। मैं खुशी से आह्लादित थी। सोचने लगी काश पंख होते तो तुरंत उड़कर मौसी जी के पास पहुंचकर यह खबर देती कि अब अपूर्वा पहले जैसी नहीं रही। जब वह बदल गई है तो उन्हें भी बदलना होगा।

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