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आम चेहरे बने खास

श्वेता राकेश

12th March 2020

पद्म पुरस्कारों जैसे अत्यंत प्रतिष्ठिïत सम्मान को लेकर यह आम धारणा है कि ये पुरस्कार आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यह अवधारणा बदली है, जो एक सकारात्मक परिवर्तन की ओर संकेत करता है। अब इनमें कुछ अनाम और गुमनाम चेहरे शामिल होने लगे हैं, जिन्होंने समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी है। इस वर्ष 141 पद्म पुरस्कार विजेताओं में कई आम चेहरे खास बनकर उभरे, जिनमें 30 से अधिक महिलाएं भी हैं।

आम चेहरे बने खास
इस सूची में कई ऐसी महिलाओं को स्थान दिया गया है जो नए भारत की परिकल्पना में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।अगर जानी-मानी हस्तियों की बात करें तो स्वर्गीय सुषमा स्वराज, कंगना रनौत, सरिता जोशी, एकता कपूर, मैरीकॉम, पी.वी. सिंधु जैसे नामी-गिरामी चेहरे हैं, जिन्होंने राजनीति, अभिनय, निर्देशन, खेल-कूद, आदि क्षेत्रों में उपलब्धि दर्ज करवाई है, तो दूसरी ओर कई ऐसी महिलाएं भी सम्मानित की गई हैं, जिनका आपने कभी नाम भी नहीं सुना होगा। इनमें भी कई महिलाओं की पृष्ठभूमि गांवों या कस्बों की है लेकिन अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर ये आम से इतनी खास बन गईं, कि पद्म पुरस्कारों की श्रेणी में आ गईं, साथ ही सबके लिए मिसाल और प्रेरणा स्रोत भी बन गईं-

कृष्णम्मा जगन्नाथन

तमिलनाडु की 94 वर्षीया कृष्णम्मा 'लैंडफॉर टिलर्स फ्रीडमनामक एन.जी.ओ. चलाती हैं, जो पिछड़ी जाति की महिलाओं एवं उनके परिवारों के लिए काम करता है। इस काम में इनके पति शंकरलिंगम् जगन्नाथन भी इनका साथ देते हैं। कृष्णम्मा का जन्म 1926 में एक भूमिहीन दलित परिवार में हुआ था। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। घरवालों ने फिर भी उन्हें ग्रेजुएशन तक पढ़ाया-लिखाया। उन्होंने हजारों भूमिहीन किसानों एवं मजदूरों को जमीन दिलवाने में अपनी सहायता दी है। 

तुलसी गौड़ा

पद्मश्री से सम्मानित 72 वर्षीया तुलसी गौड़ा को जंगल की एनसाइक्लोपीडिया कहा जाता है। वह 1 लाख से अधिक पौधे लगा चुकी हैं। कर्नाटक के अंकोल तालुका केहोन्नाली गांव में जन्मीं भारत की महिलाओं ने विश्व के हर कीर्तिमान को छुआ है। विज्ञान, सिनेमा, राजनीति आदि क्षेत्र में भारतीय महिलाओं ने मिसाल कायम की है जिसके लिए उन्हें बड़े से बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया है। इन्हीं में शामिल है केंद्र सरकार द्वारा दिए जाने वाले प्रतिष्ठिïत पद्म पुरस्कार।

सोमा पोपेरे

56 वर्षीय राहीबाई सोमा पोपेरे को 'सीड मदर के नाम से जाना जाता है। महाराष्ट के अहमद नगर की सोमा भले ही अनपढ़ आदिवासी किसान हैं, लेकिन फिर भी आदिवासी क्षेत्रों में बेहतरीन कृषि कार्यों के लिए सीड मदर की उपाधि प्राप्त कर चुकी हैं। उन्होंने खेतों में जल संरक्षण, खेती-पैदावार पर विशेष तौर पर काम किया जिसके परिणामस्वरूप फसलों की पैदावार में 30 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई। वह अपने अनुभव, ज्ञान और मेहनत के बल पर बीजों का बैंक तैयार करती हैं और पारंपरिक तरीकों को ही अपनाकर जैविक कृषि को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे अच्छी से अच्छी उपज हो सके। राही कई महिलाओं में भी खेती के ये गुर बांट रही हैं।

मुझिक्कल पंकजाक्षी

केरल की रहने वाली 70 वर्षीय पंकजाक्षी पारंपरिक कला नोकुविद्या को संरक्षित कर इस विरासत को आगे बढ़ाने और सहेजने में जुटी हैं, जोकि अब लुप्त होने की कगार पर है। वह बेहद कम उम्र में ही हाथों के माध्यम से कठपुतलियों की कला दिखाना जानती हैं। उन्होंने यह कला अपने माता-पिता से सीखी थी। वह देश-विदेश में इस नाट्यकला का प्रदर्शन कर चुकी हैं।

त्रिनिति साईऊ 

मेद्यालय के मुल्हि गांव की आदिवासी महिला त्रिनिति साईऊ अपनी मां से विरासत में मिले कृषि आंदोलन को आगे बढ़ा रही हैं, जिसमें कई महिलाएं उनका साथ दे रही हैं।

रानी रामपाल

हरियाणा के कुरुक्षेत्र की शाहाबाद मारकंडा की रहने वाली रानी रामपाल भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान हैं। महज 13 साल की उम्र में ही वह हॉकी टीम का हिस्सा बन 
चुकी थीं। अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर आज वह पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित होने जा रही हैं। 25 वर्षीय रानी के घर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। रानी रेलवे में क्र्लक की नौकरी भी कर चुकी हैं।

उषा चौमड़

पद्म पुरस्कारों की सूची में एक ऐसा नाम भी शामिल है, जिनके परंपरागत या वंशानुगत पेशे का नाम सुन आप चौंक जाएंगे। वह पेशा था सर पर मानव मल ढोना।अलवर,राजस्थान की रहने वाली उषा चौमड़ महज 11 साल की उम्र से ही मैला ढोने का अमानवीय कार्य करने को विवश थीं और इनका तथाकथित स्कैवेंजर जाति में जन्म होना इसका कारण था। समाज इन्हें 'अछूत कहता था। केवल 30-40 रु. महीना कमाने के लिए उन्हें यह गंदा काम करना पड़ता था क्योंकि उनके समाज को कोई भी सम्मानित रोजगार करने का और शिक्षित होने का अधिकार नहीं था। लेकिन 2003 में इनके जीवन की काया पलट हुई जब एक प्रसिद्ध समाज सेवी संगठन ने इन्हें इस दलदल से बाहर निकाला, इन्हें शिक्षित किया, रोजगार के नए विकल्प दिए और समाज की मुख्यधारा में शामिल किया। आज उषा अपनी जैसी महिलाओं को जागरूक कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद करती हैं।

इन्हें भी मिला पद्म पुरस्कार

इन महिलाओं के अलावे भी मीनाक्षी जैन (साहित्य एवं शिक्षा), डॉ. शांति राय (चिकित्सा), इंदिरा पी.पी. बोरा (कला), ललिता एवं सरोजा चिदंबरम (कला), डॉ. पद्मावती बंदोपाध्याय (चिकित्सा), डॉ. दमयंती बेसरा (साहित्य एवं शिक्षा), ओइनम बेमबेमदेवी (खेल), विदूषी जयलक्ष्मी के. एस. (साहित्य एवं शिक्षा, पत्रकारिता), डॉ. लीला जोशी (चिकित्सा), लिया डिस्किन (समाजसेवा, ब्राजील), हरेकेला हजबा (समाज सेवा), शांति जैन (कला), बिनापाणि मोहंती (साहित्य एवं शिक्षा), कली शाबी महबूब (कला) आदि को भी पुरस्कृत करने की घोषणा की गई है। आम जिंदगी में खास मकसद लेकर आगे बढ़ती ये महिलाएं गरीबी-अमीरी, जात-पात से परे देश में परिवर्तन की बयार लेकर आई हैं। नवभारत के निमार्ण में योगदान और वर्षों की मेहनत के फलस्वरूप इन्हें मार्च-अप्रैल माह में पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। 

 

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