कोख से कब्र तक...

गीतांजली

13th March 2020

महिलाएं वह धुरी हैं जिसके इर्द-गिर्द हमारी पूरी दुनिया चलती है लेकिन सबसे दुखद यह है कि उन्हें खुद को अपनों से लड़कर ही अपनी पहचान बनानी पड़ती है।

कोख से कब्र तक...
आज इतने बदलाव के बावजूद भी उनकी राहें इतनी आसान नहीं। हर तरह की मुश्किलों का सामना आए दिन उन्हें करना ही पड़ता है। आइए जानें उनके ऐसे ही कुछ मुश्किलों भरे सफर को-

1. हक नहीं पैदा होने का-

आज के इस तेजी से बदलते समय में जहां हम शिक्षित होने का दावा करते हैं, बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। इस दकियानूसी समाज का एक काला सच कन्या भ्रूण हत्या है। आज भी समाज का एक बड़ा तबका बेटियों
को पैदा ही नहीं करना चाहता यहां तक कि उनके पैदा होते ही उन्हें मार देने में यकीन रखता है। लोगों की इस चरम महत्वाकांक्षी चाह में ना जाने कितनी ही नन्ही कलियां जन्म लेने से पहले ही गर्भ में मार दी जाती हैं।

2. शिक्षा से नहीं कोई वास्ता-

आज भी धरातल की सच्चाई यह है कि ना केवल ग्रामीण इलाके अपितु शहरी क्षेत्रों में भी बहुत सी लड़कियां केवल इस दकियानूसी सोच के कारण पढ़ने से पीछे रह जाती हैं कि वो कितना भी पढ़- लिख लें अन्त में संभालना तो उन्हें किचन ही है। ताज्जुब की बात तो यह है कि पढ़ा-लिखा परिवार भी इस दकियानूसी विचारधारा से ग्रसित है।

3. सजा खामोशी की-

घरेलू हिंसा एक ऐसा अपराध है जो ना कभी रुका है और आज की परिस्थितियों को देखते हुए तो यही लगता है कि इसमें कमी आने की दूर-दूर तक कोई गुंजाइश नहीं। रोजमर्रा की जिंदगी में बढ़ते तनाव के
कारण पति-पत्नी के बीच अक्सर होते झगड़े कब घरेलू हिंसा का रूप ले लें पता ही नहीं चलता। दहेज के लालची परिवार अपनी बहुओं को घरेलू हिंसा से प्रताड़ित करने से बाज नहीं आते और महिलाएं आज भी कहीं ना कहीं सामाजिक और पारिवारिक दबाव के कारण ये यातनाएं चुपचाप खामोशी से सहती चली जाती हैं।

4. अपने ही हैं शिकारी-

आज के समय में महिलाएं ही नहीं अपितु छोटीछोटी बच्चियां भी घृणित मानसिकता वाले लोगों का शिकार होती रहती हैं। आए दिन यौन उत्पीडऩ
के मामले हमारे सामने आते ही रहते हैं। पुरुष वर्ग इतना नीचे गिर चुका है कि छोटी बच्चियों के साथभी ऐसा करने से पहले वह एक बार नहीं सोचता। उनके लिए बस उनकी कामुक इच्छा की पूर्ति ही सबकुछ है।

5. अपने ही बेपरवाह-

महिलाओं की पूरी दुनिया इनके अपनों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। शादी के पहले पिता और भाई और शादी के बाद पति और बच्चे बस इन्हीं लोगों के बीच इनकी पूरी जिंदगी रमी होती है। लेकिन घोर विडंबना यह है कि जिन लोगों पर वह अपनी पूरी जिंदगी सर्मिपत कर देती हैं वही उनके असली त्याग और सर्मपण का एहसास तक नहीं कर पाते। उन्हें वो इज्जत नहीं दे पाते जो उनका हक है। लिहाजा महिलाएं अपनों के बीच ही गैरों सा महसूस करतीं हैं।

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