GREHLAKSHMI

FREE - On Google Play
OPEN

बच्चों को बचाएं डिप्थीरिया से

डॉ. विनोद गुप्ता

14th March 2020

डिप्थीरिया बच्चों में होने वाली घातक बीमारी है, लेकिन अगर समय रहते इसके लक्षणों की पहचान कर ली जाए तो इससे निजात संभव है। वहीं अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो इसके संक्रमण से भी बचा जा सकता है।

बच्चों को बचाएं डिप्थीरिया से
डिप्थीरिया जिसे गलघोंटू अथवा रोहिणी के नाम से भी जाना जाता है, एक संक्रमण और जानलेवा रोग है। जब इस रोग का प्रभाव श्वास की वजह से हृदय और दिमाग पर पडऩे लगे तो जान भी जा सकती है। 

कैसे फैलता है डिप्थीरिया

डिप्थीरिया के कीटाणु को कोरायनी डिप्थीरी कहते हैं। संक्रमित व्यक्ति द्वारा खांसने या छींकने पर वातावरण में ये फैल जाते हैं तथा उस वातावरण के संपर्क में आने वाले बच्चे इसकी चपेट में आ जाते हैं। चूंकि बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, इसलिए उनमें इसका संक्रमण तेजी से फैलता है। संक्रमण होने से एक से चार दिनों के भीतर इसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं।बच्चे किसी भी वस्तु को उठाकर मुंह में ले जाते हैं। पेन, पेंसिल, खिलौने आदि मुंह में लेने से संक्रमण तेजी से फैलता है। जो बच्चे अंगुली या अंगूठा चूसने के आदी होते हैं, उनमें भी यह संक्रमण फैलते देर नहीं लगती। मीजल्स, कुकुरखांसी तथा इन्फ्लूएंजा आदि से ग्रसित होने पर बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में डिप्थीरिया के कीटाणु उन पर आसानी से हमला बोल देते हैं।

लक्षण

डिप्थीरिया गले से संबंधित रोग है, इसलिए गले में दर्द होना इसका शुरुआती लक्षण है। इसके बाद खांसी चलने लगती है तथा सांस लेने में कठिनाई होती है। संक्रमण से रोगी को हल्का बुखार भी आ सकता है।
  • इसके कुछ लक्षण होते हैं, जैसे- सर्दी, जुकाम, गले में दर्द, सूजन के साथ तेज बुखार। खांसी आने के साथ गला फटने लगता है। त्वचा का रंग पीला पडऩे लगता है। ग्रे रंग की मोटी झिल्ली गले और टांसिल्स को ढंक देती है।
  • गले में सूजन भी आ जाती है तथा किसी वस्तु को निगलने में परेशानी भी हो सकती है। श्वास लेने में रुकावट से आवाज में भी परिवर्तन देखा जा सकता है। शरीर में पानी की कमी महसूस होने लगती है। कमजोरी का अहसास होता है। शरीर नीला पड़ सकता है। 
  • रोग का असर गर्दन पर भी पड़ता है तथा वह कड़ी पड़ जाती है। इसके अलावा बोलने में भी तकलीफ होने लगती है। बहुतों को सिरदर्द और खून की कमी की शिकायत भी हो जाती है। त्वचा पर घाव भी हो सकते हैं।
  • बच्चों की रोग-प्रतिरोधक शक्ति बड़ों की तुलना में बहुत कम होती है। यही कारण है कि बीमारियों की चपेट में अधिक आते हैं। सही टीकाकरण से हम उन्हें कई घातक 
  • बीमारियों से बचा सकते हैं।

उपचार

डिप्थीरिया का उपचार चिकित्सा की हर पैथी में है। आयुर्वेद में इसके लिए विशिष्ट कर्म, काढ़ा तथा लेप आदि इस्तेमाल किए जाते हैं। वहीं होम्योपैथी में इसके लिए मर्क आई एफ, मर्क आई आर, आर्सेनिक फानी बिक, डिप्थीरिनस आदि औषधियों का इस्तेमाल किया जाता है। योग चिकित्सा से भी इसका उपचार संभव है, जिसमें कपाल रंद्रक्रिया, 
उज्जायी प्राणायाम, वक्रासन अर्धमत्स्येंद्रासन आदि है। किसी भी चिकित्सा पद्धति को अपनाने के लिए उसके विशेषज्ञ से सलाह करना उसकी देखरेख में दवाएं या योग 
करना चाहिए।
  • ऐलोपैथी में इसका उपचार एंटी टार्पेसीन के द्वारा किया जाता है। आमतौर पर इसके लिए एरिथ्रोमाइसिन तथा बेंजाइल पेनिसिलीन ड्रग्स दिए जाते हैं। जरूरत होने पर श्वास नली में छेद करके एंड्रो ट्रेक्यिल ट्यूब भी डाली जाती है ताकि सांस लेने में कठिनाई न हो।
  • डिप्थीरिया के उपचार में प्रयुक्त इंजेक्शन काफी महंगे आते हैं और हर जगह उपलब्ध भी नहीं होते। यहां तक कि कई सरकारी अस्पतालों में भी एंटी डिप्थीरिया इंजेक्शन 
  • समय पर उपलब्ध नहीं रहते। एलोपैथी की दवाएं डॉक्टर की सलाह पर ही लें।

बचाव

डिप्थीरिया से बचाव का सबसे अच्छा उपाय टीकाकरण है। शिशु को जन्म के दो सप्ताह बाद 10 सप्ताह की आयु तक डीपीटी के टीके लगवाना चाहिए जो उसे इस बीमारी के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं। सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में ये टीके मुफ्त में लगाए जाते हैं।
सही टीकाकरण से इस गंभीर बीमारी से बच्चे को बचाया जा सकता है। नियमित टीकाकरण में डीपीटी (डिप्थीरिया, परटूटस काली खांसी, टीटनेस) का टीका लगाया जाता है। एक साल के बच्चे को डीपीटी के तीन टीके लगते हैं। इसके बाद डेढ़ साल की उम्र में चौथा और पांच साल की उम्र में पांचवा टीका लगता है। ये टीके लगने के बाद डिप्थीरिया की आशंका कम हो जाती है।
  • चूंकि यह एक संक्रामक बीमारी है, इसलिए संक्रमित बच्चे से स्वस्थ बच्चे को बचाना बहुत जरूरी है अन्यथा वह भी इसी चपेट में आ जाएगा। संक्रमित बच्चे की निजी उपयोग की वस्तुएं जैसे- तौलिया, रूमाल, कपड़े आदि स्वस्थ बच्चे को इस्तेमाल करने न दें। स्वस्थ बच्चे को संक्रमित बच्चे के साथ एक थाली में भोजन न कराएं, न संक्रमित बच्चे का जूठा खिलाएं।
  • सही टीकाकरण से इस गंभीर बीमारी से बच्चे को बचाया जा सकता है। नियमित टीकाकरण में डीपीटी (डिप्थीरिया, परटूटस काली खांसी, टीटनेस) का टीका लगाया जाता है। सरकारी अस्पतालों और क्लीनिकों में ये टीके मुफ्त में लगाए जाते हैं।

 

ये भी पढ़ें -

WHO कब करता है 'महामारी' की घोषणा, और जानें क्या है 'पैनडेमिक'

कोरोना से बचाव ही नहीं, नमस्ते करने से मिलते हैं ये स्वास्थ्य लाभ

Corona Virus: प्रियंका चोपड़ा और उर्वशी रौतेला ने शेयर की 'नमस्ते' करते हुए की तस्वीरें

आप हमें फेसबुकट्विटरगूगल प्लस और यू ट्यूब चैनल पर भी फॉलो कर सकती हैं।

 

कमेंट करें

blog comments powered by Disqus

संबंधित आलेख

default

हैल्थ एक्सपर्ट से जाने क्या है कोरोना वायरस...

default

डिटॉक्स वॉटर से कम करें वजन

default

इम्यून सिस्टम को मजबूत करते हैं ये योगासन,...

default

बच्चों के जंक फूड्स खाने ही हैबिट्स कम कर...

पोल

सबसे अछि दाल कौन सी है

गृहलक्ष्मी गपशप

कम हो गया है...

कम हो गया है अब...

‘‘मैंने सुना है कि आजकल एपिसिओटॉमी का चलन नहीं रहा...

सेक्स ना करन...

सेक्स ना करने के...

यूं तो हर इंसान अपने जीवन में सेक्स ज़रूर करता है,...

संपादक की पसंद

केविनकेयर के...

केविनकेयर के "इनोवेटिव...

भारतीय एफएफसीजी ग्रुप केविनकेयर ने अभिनेता अक्षय कुमार...

इन व्यंजनों ...

इन व्यंजनों को बनाकर,...

सभी भारतीय त्यौहारों के उपवास और अनुष्ठानों के बाद...

सदस्यता लें

Magazine-Subscription