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अभिभावकों की आकांक्षाओं के बोझ तले दम तोड़ते बच्चे

डॉ. विनोद गुप्ता

14th March 2020

यदि आपका बच्चा पढ़ाई में कमजोर है, तो उसकी कमियां दूर करने का प्रयास कीजिए।

अभिभावकों की आकांक्षाओं के बोझ तले दम तोड़ते बच्चे
किशोरवय बच्चों की आत्महत्या करने में सबसे बड़ा कारण पढ़ाई का बोझ है। माता-पिता को फस्र्ट क्लास से कम पर तो संतोष होता ही नहीं। वे और अधिक पढऩे तथा और अधिक अंक लाने के लिए दबाव बनाते हैं। अब यदि बच्चे उस कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं तो वे किस मुंह से अपना परीक्षा परिणाम अभिभावकों को बताएं? कई अभिभावक तो चेतावनी देकर रखते हैं कि यदि फेल हो गया तो अपना मुंह मत दिखाना। ऐसे में फेल होने वाले बच्चे के पास आत्महत्या करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता।

पढ़ाई का बढ़ता दबाव

आजकल अपनी संतानों के प्रति माता-पिताओं की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई है। हर माता-पिता चाहे स्वयं अंगूठाछाप हों, अपने बच्चे को आईएएस, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर बनने पर तुले हुए हैं। 'हम दो हमारा एक का नारा चल रहा है। माता-पिता दोनों नौकरी कर रहे हैं। वे अपने बच्चे की पढ़ाई पर चाहे जितना खर्च करने को तैयार हैं और उसकी एवज में वे बच्चे से 90 प्रतिशत से अधिक अंक की आशा रखते हैं। यही अपेक्षा दबाव का रूप ले लेती है। जब बच्चा किशोरावस्था में आता है और जब सही मायने में उसे अन्य बच्चों के साथ प्रति-स्पर्धा करनी पड़ती है, तब उसे उस स्थिति से पार पाना नहीं आता और वह आशाभरी दृष्टि से माता-पिता की ओर देखता है। पर माता-पिता पहले ही उसे अपनी शर्तों की बोझ से लाद चुके हैं। ऐसे में बच्चा ऐसा सहारा ढूंढ़ता है, जहां उसे उस बोझ से छुटकारा मिले। ऐसे में या तो वह बुरी संगत में पड़ता है या फिर आत्महत्या की राह पर चल पड़ता है।

फेल होना जि़ंदगी की हार नहीं

माता-पिता बच्चों के अनुतीर्ण हो जाने पर उन्हें प्रताडि़त करते हैं, लेकिन अनुतीर्ण होने के लिए क्या सिर्फ बच्चे दोषी हैं। शिक्षक और अभिभावक नहीं? तो फिर बच्चों को इसके लिए प्रताडि़त क्यों किया जाता है?एक ही कक्षा में पढऩे वाले सभी बच्चों का बौद्धिक स्तर समान नहीं होता और न ही उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि एक समान होती 
है। यही कारण है कि एक ही शिक्षक से समान शिक्षा पाने वाले कुछ छात्र जहां श्रेणी में उत्तीर्ण होकर मेरिट लिस्ट में स्थान पाते हैं, वहीं कुछ को पास होने के भी लाले पड़ जाते हैं और वे असफल हो जाते हैं।बहुत से माता-पिता अपने बच्चे की असफलता को बर्दाश्त नहीं कर पाते और बेरहमी से उसकी पिटाई करते हैं।

मानसिक अवसाद में न जाने दें

अभिभावकों एवं शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को मानसिक अवसाद की स्थिति से उबारें और उन में एक नई चेतना का संचार करें ताकि वे पिछला परिणाम भूल कर आगे अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने की दिशा में सोच सकें।बच्चों की पढ़ाई लिखाई और गतिविधियों के प्रति उदासीन रहने वाले माता-पिता समय निकल जाने के बाद लाठी भी पीटें तो उससे क्या होगा? बेहतर होता कि वे सालभर बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक रहते और उन्हें पढऩे लिखने संबंधी साधन सुविधाएं उपलब्ध कराते, तो शायद उन्हें यह दिन देखना न पड़ता। लेकिन माता-पिता तभी जागते हैं, जब उनका बच्चा फेल हो कर घर लौटता है।

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