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दूरदर्शन ने एक बार फिर बनाई लोगों के दिलों में अपनी खास जगह..!

गीतांजली शर्मा

4th April 2020

जी हां यह सच है कि चाहे कितने भी प्राइवेट चैनल्स की होड़ क्यों ना आ जाए उन सारे होड़ में दूरदर्शन का हमेशा ही एक अलग स्थान रहा है और रहेगा।

दूरदर्शन ने एक बार फिर बनाई लोगों के दिलों में अपनी खास जगह..!
लॉक डाउन के इन दिनों में यह बात पूरी तरह से सिद्ध होती दिख रही है।

एक बार फिर डीडी नेशनल का चला जादू-

बाजारीकरण के इस दौड़ में वाकई यह आश्चर्य जनक बात है कि दूरदर्शन के सारे उम्दा धारावाहिकों के रिपिट टेलिकास्ट से ना सिर्फ ऑडियंस खुश है बल्कि चैनल हेड भी। बॉर्क के आये एक सर्वे से यह निश्चित आंकड़ा मिला है कि 2015 से लेकर अब तक जेनरल कैटगरी इंटरटेनमेंट में जो उछाल इस समय प्रसारित वर्षों पुराने सीरियल रामायण को मिला है इतनी जबरदस्त रेटिंग किसी और सीरियल को नहीं। पुरानी पीढ़ी के साथ- साथ नये लोग भी इसे पसंद कर रहे हैं, देख रहे हैं।

रामायण के साथ ही लौटा वो वर्षों पुराना दौर-

इसमें कोई दो राय नहीं कि दर्शकों का ऐसा रिस्पांस प्रसार भारती के सीईओ के शशि शेखर के लिए आनंद का विषय बन चुका है। वो इन दिनों भारतीय दर्शकों के दूरदर्शन के सारे सदाबहार सीरियल के रिपीट टेलिकास्ट पर किए गए ऐसे रिएक्शन्स से बहुत ही खुश हैं। और सचमुच ऐसा जान पड़ता है जैसे कि दूरदर्शन का वापस से गोल्डन एरा आ गया हो। ना सिर्फ रामायण बल्कि लोग उस दौर के हर उस सिरियल को देखना चाह रहे हैं जो उन दिनों हिट हुआ करते थे। चाहे वह धारावाहिक श्रीमान श्रीमति हो, शक्तिमान, देख भाई देख, शाहरूख की फौजी हो या सर्कस या फिर जासूसी धारावाहिक ब्योमेश बक्शी हर उस धारावाहिक को दर्शक मिल रहे हैं जो किसी जमाने में टॉप मोस्ट सीरियल्स में शुमार हुआ करता थे।

गोल्डेन एरा टेलीविजन का-

जैसे बॉलीवुड का अपना एक गोल्डेन दौर है कुछ ऐसा ही सदाबहार दौर टेलीविजन जगत का भी है। इस तरीके से दूरदर्शन के हर सीरियल के रिपीट टेलिकास्ट की इतनी प्रसिद्धि यह बता रही है कि लोग वापस से दिखावे की दौड़ को छोड़ सादगी को अपनाना चाह रहे हैं। देखना चाह रहे हैं, उसे महसूस करना चाह रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इन दिनों प्राइवेट चैनल्स ने अपने पसंदीदा सीरियल्स का रिपीट टेलिकास्ट नहीं लगा रखा पर फिर भी लोग दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिकों को ही अहमियत दे निर्देशकों को यह बताना चाह रहे हैं कि अब ऑडियंस भी बदल रही है। उन्हें सिर्फ बेमतलब के शोर-शराबे, जबरदस्ती के स्पेशल इफेक्ट्स के अतिरिक्त, सास-बहू के ड्रामों के अतिरिक्त ऐसे सीरियल्स चाहिए जो उन्हें वास्तविकता से जोड़े, सादगी से जोड़े। इन धारावाहिकों में शहरीकरण और बाजारीकरण का पुट जरूरत से ज्यादा ना भरा हो। यह कहना हरगिज गलत ना होगा कि दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक दिखावे से कोसों दूर हर उम्र के लोगों के लिए एक से बढ़कर एक बेहतरीन प्रोग्राम लाता रहा है जो हर दौर में अपनी एक अलग ही अहमियत रखता है। 

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